शादी के तीन साल बाद…

शादी के तीन साल हो चुके थे,
लेकिन मैं हर रात अपने पति को अपनी माँ के कमरे में जाकर सोते हुए देखती थी।
एक रात मैंने चुपके से उसका पीछा किया…
और जो सच्चाई मैंने जानी, उसने मुझे गहरे पश्चाताप से भर दिया।

अपनी शादी के दिन से ही सोनिया खुद को दुनिया की सबसे खुशकिस्मत औरत मानती थी।
उसका पति राघव एक भला इंसान था—समय पर दफ्तर जाने वाला, कम बोलने वाला, लेकिन बेहद समझदार।

लोग कहते थे:
“सोनिया कितनी किस्मतवाली है, उसे राघव जैसा पति मिला है।”

लेकिन शादी के कुछ ही हफ्तों बाद, एक अजीब बात ने उसका ध्यान खींचा।

हर रात, जैसे ही सोनिया गहरी नींद में जाती,
राघव चुपचाप बिस्तर से उठता,
दरवाज़ा खोलता
और अपनी माँ कमला देवी के कमरे में चला जाता—
जो कई साल पहले विधवा हो चुकी थीं।

शुरुआत में सोनिया ने खुद को समझाया कि
शायद राघव अपनी बूढ़ी माँ को अकेला नहीं छोड़ना चाहता।

लेकिन रात दर रात—
चाहे बारिश हो, आँधी हो या दिल्ली की ठंडी रातें—
राघव वही करता रहा।

एक दिन सोनिया ने उससे पूछा।

राघव हल्के से मुस्कराया:
“माँ को रात में अकेले डर लगता है, चिंता मत करो।”

तीन साल बीत गए।
लेकिन वह आदत नहीं बदली।

धीरे-धीरे सोनिया को अपने ही घर में खुद को अजनबी महसूस होने लगा।

कई बार उसकी सास ने कहा:
“जो आदमी अपनी माँ से प्यार करता है, वही अपनी पत्नी के लिए भी वरदान होता है।”

सोनिया बस अजीब-सी मुस्कान दे पाती थी।

बाहर की दुनिया में राघव एक आदर्श बेटा था,
लेकिन भीतर ही भीतर सोनिया बेचैन थी।

उस रात…

एक रात, जब सोनिया सो नहीं पाई,
उसने घड़ी देखी—रात के दो बज रहे थे।

फिर वही परिचित कदमों की आवाज़।

राघव कमरे से बाहर निकला।

सोनिया ने चुपचाप दरवाज़ा खोला,
लाइट बंद की
और गलियारे में आगे बढ़ी।

सास के कमरे से हल्की रोशनी बाहर आ रही थी।
दरवाज़ा बंद हुआ।

सोनिया ने कान लगा दिया।
उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।

अंदर से कमला देवी की काँपती हुई आवाज़ आई—

“राघव… क्या उसने सो लिया है?”

सोनिया का दिल बैठ गया।

“हाँ माँ,” राघव ने धीमे स्वर में कहा,
“हमेशा की तरह।”

हमेशा की तरह।

उस शब्द ने सोनिया को अंदर तक हिला दिया।

कमला देवी बोलीं:
“मैं नहीं चाहती कि उसे तकलीफ़ हो…
वह यह सब सहने की हक़दार नहीं है।”

सोनिया के पैर काँपने लगे।

“मैं जानता हूँ,” राघव ने थकी हुई साँस के साथ कहा,
“लेकिन कोई और रास्ता नहीं है।”

“वादा करो,” सास ने कहा,
“कि जब सब खत्म हो जाए…
तुम उसे सच बता दोगे।”

“तीन साल पहले वादा किया था,”
राघव ने कहा,
“और मैं अब भी यहीं हूँ।”

तीन साल।

सोनिया पीछे हट गई।
उस घर में, जिसे वह अपना समझती थी,
अब सब कुछ अजनबी लग रहा था।

वह पूरी रात नहीं सो पाई।

अगली सुबह…

राघव ने हमेशा की तरह कॉफी बनाई,
उसके माथे पर किस किया
और पूछा:
“अच्छी नींद आई?”

“हाँ,” सोनिया ने झूठ कहा।

नाश्ते के समय कमला देवी आईं—
चेहरा पीला, लेकिन मुस्कान वही।

“बेटी, ठीक से सोई?”

सोनिया ने पहली बार उनकी आँखों में
गिल्ट देखा।

उसी दिन,
जब दोनों बाहर थे,
सोनिया ने सास का कमरा देखा।

एक दराज़ में
उसे एक मेडिकल फाइल मिली।

नाम लिखा था: राघव शर्मा

📄 निदान: उन्नत क्रॉनिक किडनी फेल्योर
📄 उपचार: घर पर रात की डायलिसिस
📄 शुरुआत: तीन साल पहले

सोनिया की साँस रुक गई।

सच्चाई

राघव माँ के कमरे में सोने नहीं जाता था।

माँ उसकी देखभाल करती थी।

उस रात, सोनिया सोने का नाटक नहीं किया।

राघव उठा,
तो उसने कहा:

“मुझे सब पता है।”

राघव जम गया।

“तुम्हारी बीमारी…
डायलिसिस…
सब कुछ।”

“मैं तुम्हें बोझ नहीं बनाना चाहता था,”
राघव रो पड़ा।

“तुमने मेरे लिए फैसला किया,”
सोनिया ने कहा।
“मुझसे चुनने का हक़ छीन लिया।”

कमला देवी आईं:
“गलती मेरी है।
मैंने ही उसे रोका।”

अस्पताल

कुछ हफ्तों बाद,
राघव बेहोश हो गया।

अस्पताल की बदबू,
मशीनों की आवाज़
और डर…

डॉक्टर ने कहा:
“ट्रांसप्लांट अब टाला नहीं जा सकता।”

डोनर मिला—

माँ।

फिर सोनिया ने टेस्ट कराए।

डॉक्टर बोले:
“आप मैच करती हैं।”

ऑपरेशन सफल रहा।

अंत

अब कोई रहस्य नहीं था।
कोई बंद दरवाज़ा नहीं।

पहली बार,
सोनिया और राघव
पूरी रात साथ सोए।

सोनिया बोली:
“मैंने एक प्यार को
गलत समझ लिया था।”

राघव ने उसका हाथ पकड़ा:
“और मैंने तुम्हारी ताकत को।”

सुबह एक नोट मिला—

“धन्यवाद,
रुकने के लिए।
चुनने के लिए।
प्यार करने के लिए।”

सोनिया मुस्कराई।

क्योंकि उसने सीख लिया था—

प्यार खामोश बलिदान से नहीं,
साझा सच्चाइयों से बचता है।

अब,
उनके बीच
कोई बंद दरवाज़ा नहीं था।

समाप्त

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