लेकिन अजय की प्रतिक्रिया बिल्कुल अलग थी। वह अपने मोबाइल में व्यस्त था। सादे कपड़ों और पुराने चप्पलों में अपने ससुर को देखकर उसके माथे पर शिकन आ गई। उसने ठंडेपन से नमस्ते की और मुँह फेर लिया।

शादी के दिन राधा के पिता, श्री माधव, जो एक दुबले-पतले किसान थे और जिनकी त्वचा धूप में तपकर काली पड़ चुकी थी, गाँव से आए। उन्होंने अपनी बेटी की शादी पर अपनी सारी जमा-पूंजी खर्च कर दी। लेकिन अजय की नज़र में वह केवल “एक गरीब और पिछड़े इंसान” थे।

शादी के बाद कई बार राधा ने सुझाव दिया कि वे उसके पिता से मिलने गाँव चलें, लेकिन अजय हर बार कोई न कोई बहाना बना देता—“वहाँ जाकर क्या करेंगे? बस खेत, धूल और बात करने लायक कुछ भी नहीं।”

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राधा को बुरा लगता, लेकिन वह चुप रहती।

एक दिन अचानक श्री माधव शहर आ गए। वे पुरानी बस से आए थे और अपने खेत से कुछ आलू और संतरे लाए थे। राधा ने जैसे ही उन्हें देखा, उसकी आँखें खुशी से चमक उठीं—
“पापा! आप कब आए? आपने बताया क्यों नहीं? हम आपको स्टेशन से लेने आ जाते।”

श्री माधव मुस्कराए—
“बेटी, मैं तुम्हें परेशान नहीं करना चाहता था। खेत से कुछ चीज़ें ले आया हूँ, ताकि तुम्हें घर की याद रहे।”

राधा भावुक हो गई, उसकी आँखों में आँसू आ गए।

खाने के दौरान श्री माधव ने बातचीत शुरू करने की कोशिश की—
“अजय, काम कैसा चल रहा है? बहुत थकान तो नहीं होती?”

अजय ने जल्दी-जल्दी खाना खाया और संक्षेप में जवाब दिया—
“ठीक है।”

माहौल अजीब हो गया। फिर भी श्री माधव मुस्कराते रहे और गाँव की खेती-बाड़ी और वहाँ के जीवन के बारे में बात करते रहे। अजय मुश्किल से सुन रहा था, बस कभी-कभार सिर हिला देता। उसके मन में चल रहा था—
“एक गरीब किसान को शहर की आधुनिक ज़िंदगी के बारे में क्या पता होगा?”

राधा अपने पति के इस व्यवहार से अंदर ही अंदर बहुत आहत थी।

उसी शाम अजय की एक बड़े उद्योगपति के साथ अहम मीटिंग थी, जिससे वह अपने डूबते हुए कारोबार को बचाना चाहता था। वह जल्दी-जल्दी तैयार हुआ और अपने ससुर को पिछवाड़े में अकेला छोड़कर चला गया।

कुछ देर बाद दरवाज़े की घंटी बजी। एक शानदार कार घर के सामने आकर रुकी। एक सलीकेदार कपड़ों में सजा हुआ अधेड़ उम्र का आदमी बाहर उतरा। अजय खुशी-खुशी दौड़ पड़ा—
“सर! आपका स्वागत है, कृपया अंदर आइए।”

लेकिन जैसे ही वह आदमी अंदर आया, अजय स्तब्ध रह गया। वह आदमी सीधे श्री माधव के पास गया, जो चुपचाप बैठे थे, और बड़े सम्मान से बोला—
“नमस्ते, श्री माधव। मैं अमित शाह हूँ, एबीसी कंपनी का डायरेक्टर। मैं आपसे हमारे समझौते के बारे में बात करने आया हूँ।”

अजय के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। जिस डायरेक्टर के साथ साझेदारी का वह सपना देख रहा था, वह उसी “गरीब किसान” को पूरे सम्मान के साथ संबोधित कर रहा था।

श्री माधव ने शांत स्वर में मुस्कराकर कहा—
“मैं कभी दिखावा नहीं करना चाहता था। लेकिन सालों पहले मैंने अपनी कुछ बचत और कुछ परिचितों के साथ मिलकर इस कंपनी में निवेश किया था। अमित यहाँ इसके डायरेक्टर हैं। आज मैं सिर्फ़ अपनी बेटी से मिलने नहीं आया हूँ, बल्कि शहर में एक नई शाखा खोलने के बारे में चर्चा करने भी आया था। सोचा था तुम्हें इनसे मिलवा दूँ—शायद कोई सहयोग हो सके…”

अजय का सब कुछ टूट गया। उसे अपने तिरस्कार, अपने व्यवहार और अपने शब्दों पर गहरा पछतावा हुआ। वह हकलाते हुए बोला—
“मुझे माफ़ कर दीजिए, श्री माधव… मुझे पता नहीं था…”

उसके ससुर ने शांत और कोमल स्वर में कहा—
“मुझे अपने पैसे के लिए सम्मान नहीं चाहिए। मैं बस चाहता हूँ कि तुम मेरी बेटी से प्यार करो और परिवार का सम्मान करो। लेकिन आज मैंने साफ़ देख लिया कि तुम्हारे दिल में सबसे ज़्यादा अहमियत किस चीज़ की है।”

वे उठे, अपना पुराना बैग उठाया और चले गए। राधा रोते हुए अपने पिता को रोकने की कोशिश करती रही। अजय पीला पड़ गया था, शर्म और पछतावे से भरा हुआ। उसका सुनहरा मौका उसके घमंड और तिरस्कार की वजह से हाथ से निकल चुका था।

उस रात घर में सन्नाटा छाया रहा। अजय को एहसास हुआ कि असली दौलत महंगे कपड़ों, भरे हुए बटुए या आलीशान कारों में नहीं होती, बल्कि इंसान की इज़्ज़त और मानवीय गरिमा में होती है। और उसे यह भी समझ आ गया कि उसने सिर्फ़ एक कारोबारी मौका ही नहीं खोया, बल्कि अपनी पत्नी का भरोसा और अपने ससुर का सम्मान भी—वही “गरीब किसान” जो असल में उस कंपनी का मुख्य साझेदार था, जिसके साथ काम करने का सपना अजय हमेशा देखता रहा था।

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