हवाई जहाज़ में, अरबपति का बच्चा ज़ोर-ज़ोर से रो रहा था… तभी एक अकेली माँ ने धीरे से कहा,
“मेरे पास माँ का दूध है।”
अनन्या ने सस्ते धातु के छोटे से लॉकेट को अपने सीने से कसकर पकड़ लिया, जैसे वह उसके दिल को टूटने से जोड़ सकता हो। लॉकेट के भीतर भूरे रंग के बालों की एक छोटी-सी लट थी—आरव। तीन महीने का जीवन, तीन महीने का गुनगुना दूध, उसकी साँसों की गर्माहट, वे भोर की घड़ियाँ जिनमें बेबी पाउडर और थकान की मिली-जुली खुशबू रहती थी। अब वह लट ही एकमात्र चीज़ थी जिसे वह छू सकती थी बिना पूरी तरह बिखर जाए।

इकोनॉमी क्लास की संकरी सीट उसे किसी अपराध-स्वीकार जैसी लग रही थी। बाहर जहाज़ ऊँचाई पकड़ रहा था, और हर मीटर के साथ अनन्या को महसूस हो रहा था कि वह अपने बेटे से और दूर जा रही है—मुंबई के धारावी की उस नमी भरी एक-कमरे की झोपड़ी से, टपकती छत से जिसे मकान-मालिक “अगले हफ़्ते ठीक करवा देगा” कहता था, उस पुरानी प्लास्टिक की मेज़ से जिस पर बकाया बिलों का ढेर लगा रहता था। उसने खुद को सामने देखने के लिए मजबूर किया। उसे आराम का हक़ नहीं था। खासकर तब, जब उसके स्तन दर्द से भरे थे—भारी, तनावपूर्ण—जैसे उसका शरीर उस फ़ैसले को मानने से इनकार कर रहा हो जो उसके दिमाग़ ने लिया था।
“ये छोड़ना नहीं है, ये बलिदान है,” उसकी बहन प्रिया ने दरवाज़े पर खड़े-खड़े कहा था, आँखें लाल थीं।
बलिदान। एक खूबसूरत शब्द, किसी ऐसी चीज़ के लिए जो भीतर से काट देती है।
अनन्या ने पीछे मुड़कर नहीं देखा, क्योंकि उसे पता था—अगर देखा, तो टैक्सी में नहीं बैठेगी। उसने फ़्रिज में काँच की बोतलें छोड़ दी थीं, ध्यान से नाम और तारीख़ लिखकर, हाथ से निकाला हुआ दूध। जैसे वह खुद का एक हिस्सा वहीं छोड़ रही हो, ताकि आरव उसे भूल न जाए। उसने खुद से वादा किया था—वह पैसे लेकर लौटेगी। एक पक्का घर लेकर। ऐसा भविष्य जिसमें उसका बेटा खाने और सपने देखने के बीच चुनाव न करे।
राहुल—बच्चे का पिता—ने उसे नफ़रत करने का मौक़ा भी ढंग से नहीं दिया। प्रेग्नेंसी टेस्ट देखा और ठंडे स्वर में कहा,
“ये मेरा नहीं है। किसी और का होगा।”
आठ महीनों के वादे ज़मीन पर गिर पड़े। उसके बाद वह ऐसे ग़ायब हुआ जैसे अनन्या और बच्चा किसी और की गलती हों।
अनन्या ने रोने से बचने के लिए आँखें बंद कर लीं, लेकिन शरीर झूठ नहीं बोलता। दूध रिसने लगा, उसकी ब्लाउज़ भीग गई। वह शर्म से बाँहें मोड़कर बैठ गई, और तभी उसने वह आवाज़ सुनी।
वह हल्की किलकारी नहीं थी। वह चीख़ थी—भूख या डर की—ऐसी रोने की आवाज़ जो पूरे केबिन को चीर देती है। वह आवाज़ सीधे उसके सीने में लगी, जैसे किसी ने कोई छुपी हुई तार छेड़ दी हो।
बिज़नेस क्लास की ओर चिड़चिड़ी नज़रें उठने लगीं। गलियारे में खड़ा एक लंबा आदमी एक छोटे से बच्चे को गोद में लिए हुए था, जो बुरी तरह मचल रहा था। उसका सूट बेदाग़ था, घड़ी चमकदार, चाल-ढाल से साफ़ था कि वह हमेशा नियंत्रण में रहने वाला आदमी है—लेकिन चेहरे पर उसका उल्टा दिख रहा था। गहरी आँखों के नीचे स्याही, जबड़ा कसा हुआ, हाथ अनाड़ी—जैसे उसने पहली बार इतनी नाज़ुक चीज़ पकड़ी हो और समझ न पा रहा हो कि उँगलियाँ कहाँ रखें।
उसने बोतल दी। बच्ची ने मुँह मोड़ लिया। दूसरी बोतल निकाली—नए ब्रांड की, बेहद सलीके से रखी हुई। बेकार। रोना और तेज़ हो गया।
“प्लीज़… बेटा… थोड़ा सा…” आदमी बुदबुदाया, मानो गिड़गिड़ा रहा हो।
अनन्या बिना सोचे खड़ी हो गई। यह दिमाग़ नहीं था—शरीर था। समझ नहीं—मातृत्व था। वह गलियारे में ऐसे चली जैसे कोई अदृश्य हाथ उसे आगे बढ़ा रहा हो।
“माफ़ कीजिए…” उसने धीमी आवाज़ में कहा, “क्या मैं मदद कर सकती हूँ?”
आदमी ने ऊपर देखा। उसकी आँखें लाल थीं—गुस्से से नहीं, थकान से। पास से वह उतना बड़ा नहीं लग रहा था जितना उसका सूट बताता था—शायद पैंतीस-छत्तीस का। उसकी नज़र में पुरानी उदासी थी, जैसे यह रोना किसी लंबे तूफ़ान की आख़िरी बूँद हो।
“अगर आप इसे खिला सकती हैं, तो शायद,” उसने लंबी साँस ली। “ये दो दिन से फ़ॉर्मूला नहीं ले रही। डॉक्टर कहते हैं एलर्जी नहीं, ‘एडजस्टमेंट’ है।”
अनन्या ने बच्ची का चेहरा देखा—एक नन्ही लड़की, लगभग आरव की उम्र की, हल्के सुनहरे बाल, गाल आँसुओं से भीगे हुए। यह ज़िद नहीं थी। यह ज़रूरत थी।
और तभी, जैसे शब्द खुद-ब-खुद निकल आए हों—
“मेरे पास… माँ का दूध है।”
आदमी एक पल को जड़ हो गया। जैसे आसमान के बीचों-बीच किसी ने चमत्कार की बात कर दी हो। उसने उसे ऐसे देखा—अविश्वास और उम्मीद के बीच।
“क्या आप… इसे दूध पिला सकती हैं?”
अनन्या को अचानक शर्म महसूस हुई। वह कौन थी, जो इतनी निजी चीज़ किसी अजनबी को—वो भी इतना अमीर—ऑफ़र कर रही थी? उसने एक क़दम पीछे हटाया।
“माफ़ कीजिए… ये ठीक नहीं था। बस… रोने की आवाज़…”
“नहीं,” आदमी ने उसे बीच में ही रोक दिया, उसकी आवाज़ में ग़ज़ब की गंभीरता थी।
“कृपया। अगर आप कर सकती हैं… तो कृपया।”
अनन्या के हाथ काँप रहे थे, लेकिन उसने खुद को स्थिर रखा। विमान के पिछले हिस्से में एक फ्लाइट अटेंडेंट ने परदे को थोड़ा सा खींच दिया था, जैसे इस पल की नाज़ुकता को समझती हो। अनन्या ने ब्लाउज़ का बटन खोला, साँस गहरी ली और बच्ची को धीरे से अपने सीने से लगाया।
रोना… अचानक थम गया।
जैसे किसी ने आसमान में चल रही आँधी को एक पल में शांत कर दिया हो।
बच्ची ने हिचकिचाते हुए मुँह लगाया, फिर भूखेपन से चूसने लगी। उसकी छोटी उँगलियाँ अनन्या की उँगली में कसकर लिपट गईं। वह स्पर्श—इतना परिचित, इतना दर्दनाक—कि अनन्या की आँखों से आँसू बिना अनुमति बह निकले।
“श्श्श… धीरे… सब ठीक है…”
वह फुसफुसाई, जैसे आरव से बात कर रही हो।
वह आदमी—अर्जुन मल्होत्रा—जैसा कि बाद में उसने खुद बताया—कुछ सेकंड तक बोल ही नहीं पाया। उसकी आँखें उस दृश्य पर टिकी थीं, जैसे उसने अपनी ज़िंदगी में पहली बार किसी चमत्कार को बिना पैसे के घटते देखा हो।
“वो… रो नहीं रही,” वह बुदबुदाया।
“तीन दिन से… पहली बार।”
अनन्या ने सिर नहीं उठाया। अगर उठाती, तो शायद टूट जाती।
“भूख लगी थी,” उसने बस इतना कहा।
“बच्चे रोते नहीं हैं… जब तक बहुत ज़रूरत न हो।”
अर्जुन ने जैसे यह बात अपने सीने में कहीं गहरे उतार ली।
कुछ देर बाद बच्ची गहरी नींद में चली गई, दूध के कोने से एक बूंद ठोड़ी पर चमक रही थी। अनन्या ने कपड़ा ठीक किया, उसे सावधानी से अर्जुन की गोद में वापस रखा।
“धन्यवाद,” उसने कहा।
एक शब्द। लेकिन आवाज़ में कुछ टूटा हुआ था।
अनन्या ने हल्की मुस्कान दी, उठने ही वाली थी कि अर्जुन ने धीमे से पूछा—
“आप… कहाँ जा रही हैं?”
वह रुक गई।
“दिल्ली।”
“काम के लिए?”
एक पल की चुप्पी।
“हाँ,” उसने झूठ बोला।
काम… अगर माँ होना भी काम माना जाए।
अर्जुन ने कुछ सोचा, फिर बोला—
“मैं भी वहीं जा रहा हूँ।”
वह अपने सीट की ओर लौट आई, लेकिन दिल वहाँ नहीं था। सीने में अब भी भारीपन था—दूध का नहीं, खालीपन का। जैसे उसने किसी और के बच्चे को खिलाकर अपने ही बच्चे से चोरी की हो।
विमान के उतरते ही, अर्जुन ने फिर उसे ढूँढा।
“मुझे आपसे बात करनी है,” उसने कहा।
स्वर में आदेश नहीं था—विनती थी।
एयरपोर्ट के कोने में, काँच की दीवार के पास, अर्जुन ने गहरी साँस ली।
“मेरी पत्नी की डिलीवरी के दौरान मौत हो गई,” उसने अचानक कहा।
कोई भूमिका नहीं। कोई तैयारी नहीं।
अनन्या का दिल धक से रह गया।
“डॉक्टरों ने कहा सब ठीक है। आख़िरी मिनट तक… और फिर…”
उसकी आवाज़ लड़खड़ा गई।
“मेरी बेटी—मीरा—माँ का चेहरा भी नहीं देख पाई।”
अनन्या ने कुछ कहना चाहा, लेकिन शब्द नहीं मिले।
“मेरे पास सब कुछ है,” अर्जुन ने कड़वाहट से हँसते हुए कहा।
“पैसा, घर, लोग… लेकिन उसे माँ की ज़रूरत है। और मुझे…”
उसने खुद की ओर इशारा किया।
“मुझे नहीं पता कि मैं उसे कैसे पालूँ।”
कुछ सेकंड की चुप्पी के बाद उसने वह सवाल पूछा, जिसने कहानी की दिशा बदल दी—
“क्या आप मेरे साथ काम करेंगी?”
अनन्या चौंक गई।
“काम?”
“मीरा की देखभाल। कुछ महीनों के लिए। आप उसके साथ रहेंगी, उसे दूध पिलाएँगी। बदले में…”
उसने कार्ड निकाला।
“जितना आप माँगें।”
अनन्या का चेहरा सख़्त हो गया।
“आप मुझे खरीदना चाहते हैं?”
आवाज़ काँप रही थी, लेकिन आँखें नहीं।
“नहीं,” अर्जुन ने तुरंत कहा।
“मैं… मदद माँग रहा हूँ।”
वह उठ खड़ी हुई।
“मैं कोई सौदा नहीं हूँ।”
वह जाने ही वाली थी कि अर्जुन ने आख़िरी बात कही—
“आपके कपड़े… दूध से भीगे हैं।”
“आपका बच्चा आपसे दूर है।”
अनन्या रुक गई।
“आप भी किसी को छोड़कर आई हैं, है ना?”
उसकी आवाज़ अब नरम थी।
“बलिदान करके।”
उस रात, होटल के कमरे में, अनन्या ने वीडियो कॉल पर आरव को देखा। उसकी बहन ने फोन घुमाया। बच्चा सो रहा था, होंठ हिल रहे थे, जैसे सपना देख रहा हो।
अनन्या ने फोन से बात की।
“माँ यहाँ है… बस थोड़ी दूर…”
फोन कटते ही वह फूट-फूटकर रो पड़ी।
अगली सुबह, उसने अर्जुन को फोन किया।
“मैं शर्तों पर बात करना चाहती हूँ,” उसने कहा।
“पैसे पर नहीं।”
और यहीं से कहानी ने असली मोड़ लिया।
क्योंकि अनन्या को अभी यह नहीं पता था कि—
अनन्या ने कभी नहीं सोचा था कि एक फोन कॉल उसकी ज़िंदगी की दिशा बदल देगा। वह दिल्ली के एक साधारण से गेस्टहाउस के कमरे में बैठी थी, खिड़की के बाहर ट्रैफिक का शोर लगातार गूँज रहा था, लेकिन उसके भीतर एक अजीब-सी शांति और डर एक साथ मौजूद थे। अर्जुन मल्होत्रा की आवाज़ फोन के उस पार शांत थी, जैसे वह पहले से जानता हो कि अनन्या “हाँ” कहेगी।
“मैं आपसे किसी समझौते की तरह बात नहीं करूँगा,” उसने कहा था।
“आप मेरी कर्मचारी नहीं होंगी। आप… बस मीरा के साथ रहेंगी। जैसे एक माँ रहती है।”
अनन्या हँस पड़ी थी—कड़वी, थकी हुई हँसी।
“माँ?”
“जिस माँ ने अपने बच्चे को पीछे छोड़ दिया हो, वो किसी और की माँ कैसे बन सकती है?”
अर्जुन चुप रहा। फिर बोला—
“शायद वही माँ सबसे ज़्यादा समझ सकती है।”
तीन दिन बाद अनन्या अर्जुन के घर पहुँची। दिल्ली का वह बंगला किसी होटल से कम नहीं था—सफेद संगमरमर, ऊँची छतें, दीवारों पर चुप्पी। लेकिन उस आलीशान जगह में भी कुछ टूटा हुआ था। जैसे किसी ने हँसी निकाल ली हो और भूल गया हो वापस रखना।
मीरा उसे देखते ही रो पड़ी।
वह रोना…
अनन्या के सीने में चाकू की तरह घुसा।
उसने बच्ची को गोद में उठाया।
“श्श्श… मैं हूँ…”
मीरा ने तुरंत चुप होकर उसका चेहरा देखा। वही पकड़, वही भरोसा।
उस रात, जब अनन्या मीरा को दूध पिला रही थी, कमरे के कोने में खड़ा अर्जुन यह दृश्य देख रहा था। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन वह पोंछ नहीं रहा था।
“आपको पता है,” उसने धीमे से कहा,
“मेरी पत्नी—काव्या—अंतिम दिनों में अजीब बातें करती थी।”
अनन्या ने सिर उठाया।
“कैसी बातें?”
“वह कहती थी—‘अगर कभी सच्चाई सामने आए, तो मीरा को छोड़ना मत।’
मैं समझ नहीं पाया। अब… डर लगता है।”
डर।
वह शब्द उस घर में गूँजता रहा।
कुछ हफ्तों बाद, अनन्या को घर के एक पुराने कमरे में एक फाइल मिली। मेडिकल रिपोर्ट्स। काव्या की प्रेग्नेंसी से जुड़ी। तारीखें… मेल नहीं खा रही थीं।
उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा।
उसी शाम, अर्जुन ने बताया—
“काव्या छह महीने तक विदेश में थी। अकेली।”
अनन्या का गला सूख गया।
“और उसी समय…”
उसने हिम्मत जुटाकर कहा,
“क्या आपने कभी… डीएनए टेस्ट करवाया?”
अर्जुन जैसे पत्थर हो गया।
“आप ऐसा क्यों पूछ रही हैं?”
अनन्या ने फाइल आगे बढ़ा दी।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
दो हफ्ते बाद रिपोर्ट आई।
मीरा… अर्जुन की जैविक बेटी नहीं थी।
अर्जुन की दुनिया उसी पल टूट गई।
“तो वो… मेरी नहीं है?”
उसकी आवाज़ खाली थी।
अनन्या ने मीरा को सीने से कस लिया।
“वो बच्ची है,” उसने कहा।
“बस यही सच्चाई है।”
लेकिन सबसे बड़ा झटका अभी बाकी था।
अर्जुन ने अगला टेस्ट करवाया—
मीरा और आरव का।
रिपोर्ट पढ़ते ही अनन्या के हाथ काँपने लगे।
दोनों बच्चों का जैविक रिश्ता था।
वे… सौतेले नहीं थे।
वे… जुड़वाँ थे।
एक ही माँ से जन्मे।
अनन्या को साँस लेना भूल गया।
“ये… ये कैसे हो सकता है?”
अर्जुन फुसफुसाया।
सच धीरे-धीरे सामने आया—
काव्या और अनन्या… एक ही अस्पताल में भर्ती थीं।
डिलीवरी की रात… बिजली चली गई थी।
एक बच्चा बदल गया था।
गलती नहीं थी।
यह अपराध था।
अनन्या ज़मीन पर बैठ गई।
“मीरा… मेरी बेटी है?”
उसका शरीर काँप रहा था।
उसका दिल चीख रहा था।
अर्जुन ने पहली बार सिर झुकाया।
“और आरव… शायद मेरा बेटा।”
उस रात कोई नहीं सोया।
सुबह होते ही अस्पताल, पुलिस, वकील—सब कुछ शुरू हुआ।
लेकिन अनन्या के लिए असली लड़ाई अलग थी।
“मैं मीरा को नहीं छोड़ सकती,” उसने अर्जुन से कहा।
“और मैं आरव को वापस लाऊँगी।”
अर्जुन की आँखें लाल थीं।
“अगर सच्चाई सामने आई… मीडिया हमें खा जाएगी।”
अनन्या ने सीधे उसकी आँखों में देखा।
“तो खा जाने दीजिए।
माँ सच्चाई से भागती नहीं।”
और उसी पल, अर्जुन ने एक फैसला लिया—
ऐसा फैसला जो उसकी कंपनी, नाम और ताकत सब दाँव पर लगा देगा।
क्योंकि अब यह सिर्फ बच्चों की कहानी नहीं थी।
यह इंसानियत की परीक्षा थी।
और अभी… अंतिम तूफ़ान आना बाकी था।
अस्पताल की इमारत बाहर से जितनी चमकदार थी, भीतर उतना ही अँधेरा छुपाए बैठी थी।
अनन्या को जब पहली बार मेडिकल रिकॉर्ड की फ़ाइल हाथ में मिली, तो उसे समझ नहीं आया कि उसके हाथ क्यों ठंडे पड़ रहे हैं। काग़ज़ साधारण थे—रिपोर्ट, साइन, तारीख़ें—लेकिन उनमें एक चीज़ बार-बार ग़लत थी। अर्जुन की पत्नी, काव्या मल्होत्रा, की डिलीवरी “कम्प्लिकेशन” से हुई बताई गई थी, पर दवाइयों की लिस्ट में वह इंजेक्शन दर्ज था जो प्रसव के दौरान बिल्कुल नहीं दिया जाता।
“ये दवा…?”
अनन्या ने डॉक्टर की ओर देखा।
डॉक्टर ने एक पल के लिए नज़रें चुरा लीं।
“मैडम, ये सब बहुत पुरानी फ़ाइलें हैं। बेहतर होगा आप सवाल न पूछें।”
उसी पल अनन्या को समझ आ गया—
सच यहाँ दफ़न नहीं हुआ है, दबाया गया है।
उस रात, अस्पताल के एक जूनियर नर्स ने उसे चुपके से फोन किया।
“मैडम… मैं ज़्यादा देर नहीं बोल सकती,” आवाज़ काँप रही थी।
“उस दिन… ऑपरेशन थिएटर में… एक कॉल आया था। ऊपर से। कहा गया था—
‘माँ को बचाने में समय मत बर्बाद करो।’”
अनन्या की साँस रुक गई।
“किसने कहा?”
“मैं नाम नहीं ले सकती,” नर्स रोने लगी।
“लेकिन वो लोग… बहुत ताक़तवर हैं।”
अगले ही दिन, जैसे किसी ने पहले से इंतज़ार कर रखा हो—
मीडिया फट पड़ा।
“अरबपति की बेटी को दूध पिलाने वाली महिला—असल माँ कौन?”
“क्या गरीब महिला ने पैसे के लिए माँ बनने का सौदा किया?”
टीवी चैनलों पर अनन्या की धुंधली तस्वीरें, उसके पुराने घर की फुटेज, धारावी की गलियाँ—
हर जगह बस एक ही सवाल—
“क्या माँ बनना अब बिकाऊ है?”
अर्जुन ने टीवी तोड़ दिया।
“मैं ये सब रोक दूँगा,” उसने गुस्से में कहा।
“मेरे वकील—”
“नहीं,” अनन्या ने पहली बार उसे रोका।
“अगर सच बाहर आना है, तो उसे रोका नहीं जा सकता।”
उसी शाम पुलिस आई।
“अनन्या शर्मा,” अफ़सर ने कहा,
“आप पर आरोप है—किडनैपिंग, अवैध स्तनपान, और पहचान छुपाने का।”
मीरा रोने लगी। आरव वीडियो कॉल पर था, जैसे सब महसूस कर रहा हो।
अदालत का दिन आया।
कोर्टरूम खचाखच भरा था—मीडिया, वकील, भीड़।
जज ने हथौड़ा बजाया।
“शांत रहें।”
अभियोजन पक्ष खड़ा हुआ।
“माई लॉर्ड, यह महिला गरीब है। इसने अमीर आदमी की मजबूरी का फ़ायदा उठाया। माँ बनने का नाटक किया। कानूनन अपराध है।”
अनन्या खड़ी हुई।
हाथ काँप रहे थे, लेकिन आवाज़ साफ़ थी।
“माई लॉर्ड,”
“अगर भूखे बच्चे को दूध पिलाना अपराध है…
तो हाँ, मैं अपराधी हूँ।”
कोर्ट में सन्नाटा छा गया।
तभी अर्जुन आगे आया।
“मैं गवाही देना चाहता हूँ।”
उसने गहरी साँस ली।
“मेरी पत्नी की मौत एक हादसा नहीं थी।
मैं… उस दिन अस्पताल में मौजूद था।
मुझसे कहा गया—अगर माँ को बचाया गया, तो बच्ची को खतरा है।
और मैंने… चुप्पी चुन ली।”
भीड़ में हलचल मच गई।
“मैं कायर था,” अर्जुन की आवाज़ टूट गई।
“और इस चुप्पी की कीमत मेरी पत्नी ने चुकाई।”
तभी अनन्या ने सबसे बड़ा क़दम उठाया।
“माई लॉर्ड,” उसने कहा,
“मेरे पास एक और सच है।”
उसने DNA रिपोर्ट कोर्ट में रख दी।
“मीरा और मेरा बेटा आरव…
सौतेले नहीं, सगे भाई-बहन हैं।”
पूरा कोर्ट स्तब्ध।
अर्जुन जैसे ज़मीन में धँस गया।
“क्या… क्या मतलब?”
अनन्या की आँखों में आँसू थे।
“काव्या… आपकी पत्नी…
वो मेरी कॉलेज दोस्त थी।
जब मैं प्रेग्नेंट थी, उसी डॉक्टर ने मुझे कहा था—
‘बच्चा नहीं बचेगा।’
और उसी अस्पताल में…
मेरे बच्चे को मृत घोषित किया गया।”
सच बिजली बनकर गिरा।
“आरव को चुपचाप गोद दे दिया गया था,”
अनन्या बोली।
“लेकिन किस्मत ने…
मुझे वापस उससे मिला दिया।”
जज ने फ़ाइल बंद की।
“यह मामला सिर्फ़ क़ानून का नहीं,”
उन्होंने कहा।
“यह कर्म का है।”
फैसला सुनाया गया—
अस्पताल प्रबंधन दोषी
अर्जुन पर अपराध स्वीकार करने पर सज़ा, लेकिन सच्चाई उजागर करने के कारण रियायत
अनन्या निर्दोष
अंतिम दिन, कोर्ट के बाहर—
अर्जुन अनन्या के सामने घुटनों पर बैठ गया।
“मुझे माफ़ कर दो,”
“मैं सब कुछ खो चुका हूँ।”
अनन्या ने मीरा को गोद में लिया, आरव का हाथ पकड़ा।
“नहीं,” वह मुस्कुराई।
“तुमने सब कुछ नहीं खोया।
तुमने सच पाया है।”
कुछ साल बाद—
एक साधारण सा घर।
दो बच्चे खेल रहे हैं।
अनन्या पढ़ा रही है।
अर्जुन एक चला रहा है—माताओं और बच्चों के लिए।
कोई अरबपति नहीं।
कोई नौकर नहीं।
बस परिवार।
अनन्या ने लॉकेट खोला।
अब उसमें दो लटें थीं।
क्योंकि—
कर्म देर करता है, अंधेर नहीं।
जो दूध बनकर बहता है, वह रिश्ता बन जाता है।
और बलिदान… कभी खाली नहीं जाता।
