वह बस जन्म देने ही वाली थी… और डॉक्टर उसका पूर्व पति था, उसने कुछ अविश्वसनीय किया…

वह बस जन्म देने ही वाली थी… और डॉक्टर उसका पूर्व पति था, उसने कुछ अविश्वसनीय किया…

वह बस जन्म देने ही वाली थी… और डॉक्टर उसका पूर्व पति था, उसने कुछ अविश्वसनीय किया… जब नर्स ने उससे कहा, तो डॉक्टर निखिल आहूजा ने तिरस्कार के साथ मुस्कुराया:
“डॉक्टर, एक प्रसव पीड़ा वाली मरीज़ को जटिलताएँ हैं। उन्हें तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है।”

प्रिया शर्मा, वह महिला जिसे उसने 9 महीने पहले अपने घर से निकाल दिया था, ने दर्द भरी आँखों से स्ट्रेचर से उसकी ओर देखा।
उसने आगे जो खोजा वह हमेशा के लिए उसका जीवन बदल देगा।

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निखिल आहूजा ने अपनी ₹30 लाख की रोलेक्स घड़ी को समायोजित किया, जबकि वह आकाशदीप अस्पताल की क्रोम लिफ्ट के दरवाज़ों में अपनी त्रुटिहीन आकृति के प्रतिबिंब को पूर्ण संतुष्टि के साथ देख रहा था। 35 साल की उम्र में, उसने पूरे शहर में सबसे सफल और निर्दयी प्रसूति सर्जन के रूप में प्रतिष्ठा बनाई थी, जिसकी व्यक्तिगत दौलत ₹65 करोड़ थी, लेकिन वह देश का सबसे ठंडा और अहंकारी दिल भी रखता था।
12वीं मंजिल पर उसका निजी कार्यालय उसके अत्यधिक अहंकार का एक अश्लील स्मारक था। इटली से आयातित सफेद संगमरमर की दीवारें, सोने से जड़े डिप्लोमा जिनकी कीमत एक नर्स के सालाना वेतन से भी अधिक थी, और एक विहंगम दृश्य जिसने उसे लगातार याद दिलाया कि वह सचमुच उन सभी नश्वर लोगों से ऊपर था जो आपातकालीन कमरों में तुच्छ चींटियों की तरह पीड़ित थे।
लेकिन निखिल को अपनी खगोलीय संपत्ति से ज़्यादा खुशी नहीं मिलती थी, बल्कि वह दुखद शक्ति जो उसे यह तय करने के लिए देती थी कि कौन उसकी चिकित्सा देखभाल का हकदार है और कौन नहीं।
“डॉक्टर आहूजा।”
नर्स अंजलि की कांपती हुई आवाज़ ने सुनहरे इंटरकॉम के माध्यम से उसकी श्रेष्ठता के विचारों को बाधित किया।
“प्रसव कक्ष में एक आपातकाल है, प्रसव पीड़ा के दौरान गंभीर जटिलताओं वाली मरीज़।”

निखिल आहूजा ने इंटरकॉम बंद किया और अपनी कुर्सी से धीरे-धीरे उठा। उसके चेहरे पर वही तिरस्कार भरी मुस्कान थी—वही मुस्कान, जिससे वह नौ महीने पहले प्रिया को घर से निकालते समय मुस्कुराया था। “आपातकाल?” उसने अपने आप से बुदबुदाया, “अस्पताल में हर दिन कोई न कोई आपातकाल होता है।” उसने कोट पहना, कफ़लिंक ठीक किए और लिफ्ट की ओर बढ़ गया, मानो यह बस एक और केस हो—जबकि उसके भीतर कहीं एक हल्की-सी बेचैनी उभरी, जिसे उसने अहंकार के मोटे पर्दे से ढक दिया।

प्रसव कक्ष के बाहर की रोशनी तेज़ थी। नर्सें फुसफुसा रही थीं। जैसे ही निखिल अंदर पहुँचा, उसकी नज़र स्ट्रेचर पर पड़ी—और समय जैसे रुक गया। प्रिया शर्मा। पसीने से भीगी, आँखों में असहनीय दर्द, और फिर भी उनमें एक अजीब-सी दृढ़ता। उसने निखिल को देखा, और उसकी पलकों में पल भर के लिए नफरत, दर्द और किसी टूटे हुए भरोसे का मिश्रण चमका।
“डॉक्टर…,” नर्स अंजलि ने धीरे से कहा, “ब्लड प्रेशर गिर रहा है। फेटल डिस्टेस है। हमें तुरंत निर्णय लेना होगा।”

निखिल ने ठंडी आवाज़ में पूछा, “नाम?”
“प्रिया शर्मा,” अंजलि बोली।
निखिल की भौंह हल्की-सी उठी। “उम्र?”
“तीस।”
“पति?”
प्रिया ने दर्द में कराहते हुए कहा, “मेरा… कोई पति नहीं।”
उस वाक्य ने हवा को काट दिया। निखिल की उँगलियाँ पल भर के लिए थमीं—फिर उसने मास्क ठीक किया। “ऑपरेशन की तैयारी करो।”

“निखिल,” प्रिया ने धीमे पर दृढ़ स्वर में कहा, “तुम्हें याद है… तुमने मुझे क्या कहा था?”
उसने उसकी ओर देखा नहीं। “यहाँ निजी बातें नहीं होंगी।”
“तुमने कहा था,” प्रिया की आवाज़ काँप गई, “कि मैं बेकार हूँ। कि मैं तुम्हारे नाम के लायक नहीं। कि… अगर कभी मेरी ज़िंदगी में कुछ गलत हुआ, तो तुम मेरी तरफ़ देखोगे भी नहीं।”

ऑपरेशन थिएटर में मशीनों की बीप तेज़ हो गई। एनेस्थेटिस्ट ने कहा, “हमें जल्दी करना होगा।”
निखिल ने आदेश दिए—सटीक, निर्मम, जैसे हमेशा। लेकिन जैसे ही उसने स्केल्पेल उठाया, उसकी नज़र अल्ट्रासाउंड स्क्रीन पर अटक गई। पैटर्न… असामान्य। वह झुका, फिर और पास।
“यह…,” उसने फुसफुसाया।
“क्या हुआ, डॉक्टर?” अंजलि ने पूछा।
“यह प्लेसेंटा का स्ट्रक्चर,” निखिल ने निगलते हुए कहा, “मैंने यह पहले देखा है।”

उसके दिमाग़ में एक स्मृति कौंधी—वर्षों पहले, मेडिकल कॉलेज में एक रिसर्च केस। एक दुर्लभ जेनेटिक मार्कर, जो केवल एक सीमित वंश में पाया जाता था। वही मार्कर… जो उसके परिवार में था।
“निखिल,” एनेस्थेटिस्ट ने चेताया, “मदर की सैचुरेशन गिर रही है।”
“सी-सेक्शन अभी,” निखिल ने कहा। “और… सैंपल सुरक्षित रखो।”

ऑपरेशन आगे बढ़ा। समय सुई की तरह चुभता रहा। जैसे ही बच्चे की पहली चीख गूँजी, कमरे में राहत की लहर दौड़ गई—लेकिन निखिल का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। बच्चे के कंधे पर एक छोटा-सा जन्मचिह्न था—ठीक वैसा ही, जैसा उसके अपने कंधे पर था।
“यह… संयोग नहीं हो सकता,” उसने खुद से कहा।

प्रिया की आँखें खुलीं। उसने बच्चे की ओर देखा, फिर निखिल की ओर। “वह… ठीक है?”
निखिल ने जवाब नहीं दिया। उसके भीतर वर्षों से जमी ठंडक पिघल रही थी—और नीचे से कुछ और उभर रहा था: डर।
“डॉक्टर?” नर्स ने दोहराया।
“डीएनए टेस्ट,” निखिल ने अचानक कहा।
“क्या?”
“तुरंत।”

प्रिया ने उसे घूरा। “तुम्हें क्या साबित करना है?”
निखिल ने पहली बार उसकी आँखों में देखा। “सच।”

घंटे बाद, रिपोर्ट आई। निखिल के हाथ काँप रहे थे।
99.99% मैच।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
“यह… मेरा बेटा है,” निखिल ने बुदबुदाया।
प्रिया ने आँखें बंद कर लीं। “अब तुम्हें याद आया?” उसकी आवाज़ में थकान थी, जीत नहीं। “जब मैंने तुम्हें बताया था कि मैं गर्भवती हूँ, तुमने कहा था—‘यह मेरा नहीं हो सकता।’ और मुझे घर से निकाल दिया।”

निखिल की आवाज़ टूट गई। “मैं… मैं गलत था।”
“गलत?” प्रिया हँसी—कड़वी हँसी। “तुमने मेरी ज़िंदगी तोड़ दी। मैंने सड़क पर रातें बिताईं। मैंने अकेले यह दर्द झेला। और आज…,” उसने बच्चे को देखा, “आज भी तुम बस ‘सच’ ढूँढ रहे हो।”

अस्पताल के बाहर खबर फैल गई। मीडिया आ पहुँचा। “डॉक्टर आहूजा, क्या यह सच है कि आपकी मरीज़ आपकी पूर्व पत्नी हैं?”
निखिल ने पहली बार कैमरों से मुँह मोड़ा।
अंदर, प्रिया ने काग़ज़ बढ़ाया। “मैं इस बच्चे के लिए कुछ नहीं माँगती,” उसने कहा। “न पैसा, न नाम। बस… आज के बाद मेरी ज़िंदगी से दूर रहो।”

निखिल ने काग़ज़ पढ़ा—कस्टडी, गोपनीयता, और एक अंतिम शर्त: वह अस्पताल छोड़ दे जहाँ वह शक्ति का दुरुपयोग करता था।
“यह…,” उसने हिचकिचाते हुए कहा।
“यह मेरी शर्त है,” प्रिया ने शांत स्वर में कहा। “अगर तुम सच में पिता हो।”

उस रात निखिल ने इस्तीफ़ा दे दिया। अगले हफ्ते उसने अपने फंड से एक सार्वजनिक मातृत्व क्लिनिक खोला—जहाँ कोई मरीज़ ‘योग्य’ या ‘अयोग्य’ नहीं थी। उसने मीडिया के सामने स्वीकार किया—अपनी क्रूरता, अपना अहंकार, अपनी गलती।
प्रिया ने उसे माफ़ नहीं किया—लेकिन उसने बच्चे के लिए रास्ता खुला छोड़ा।

समय बीता। निखिल हर रविवार क्लिनिक के बाहर खड़ा रहता—बिना अंदर घुसे—बस दूर से देखता। एक दिन प्रिया आई। उसने बच्चे को उसकी ओर बढ़ाया।
“नाम?” निखिल ने पूछा।
“आरव,” प्रिया ने कहा। “मतलब—नई शुरुआत।”
निखिल की आँखें भर आईं। उसने बच्चे का माथा चूमा—और पहली बार, उसके हाथ काँपे नहीं।

उस दिन निखिल ने सीखा कि शक्ति का मूल्य दया से मापा जाता है; और सच्चा सम्मान वह है जो आप तब भी निभाएँ, जब कोई आपको माफ़ न करे।
और प्रिया ने सीखा—कि न्याय हमेशा बदले में नहीं, बल्कि सही शर्तों पर आगे बढ़ने में होता है।

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