दस साल तक गाँव ने मुझे कलंक कहा — लेकिन लग्ज़री कारों का काफ़िला आया, एक बूढ़ा आदमी कीचड़ में घुटनों पर गिरा, और वह सच बताया जिसने पूरे गाँव को रुला दिया।

लोग धीरे-धीरे फुसफुसाने लगे:

“किसके लिए आई हैं ये गाड़ियाँ?”
“कहीं कोई बड़ा अधिकारी तो नहीं?”
“सावित्री के घर? अरे नहीं… ये कैसे हो सकता है?”

मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। मैंने अपने बेटे को अपने पास खींच लिया। उसकी उंगलियाँ मेरी साड़ी को कसकर पकड़े थीं।

कारों के दरवाज़े खुले। काले सूट पहने लोग बाहर आए। फिर बीच वाली कार से एक अधेड़ उम्र का आदमी उतरा—सफेद बाल, कांपते हाथ, लेकिन चेहरे पर गहरी बेचैनी।

वह इधर-उधर देखने लगा… और जैसे ही उसकी नज़र मुझ पर पड़ी, उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

अचानक—
वह आदमी कीचड़ में घुटनों के बल गिर पड़ा।

पूरा गाँव सन्न रह गया।

“बेटी… मुझे माफ़ कर दो”

वह आदमी रो रहा था। सचमुच रो रहा था।

“बेटी सावित्री… मैं अपराधी हूँ… बहुत बड़ा अपराधी…”

मैं हक्की-बक्की खड़ी थी।
“आप… आप कौन हैं?” मेरे मुँह से बस इतना ही निकल पाया।

उसने कांपती आवाज़ में कहा,
“मैं… मैं रमेश का पिता हूँ।”

नाम सुनते ही मेरा शरीर सुन्न पड़ गया।
दस साल पुराना नाम—वही नाम जिसने मेरी ज़िंदगी तोड़ दी थी।

गाँव वालों में खुसुर-पुसुर तेज़ हो गई।

“क्या?”
“उसका पिता?”
“तो फिर ये लड़का…?”

मेरा बेटा डर के मारे मेरे पीछे छिप गया।

दस साल पहले का सच

उस बूढ़े आदमी ने मिट्टी में सिर झुका लिया।

“जब मेरे बेटे ने बताया कि वह तुमसे शादी करना चाहता है… और तुम गर्भवती हो… मैंने उसे धमकाया।
मैंने कहा—अगर उसने उस लड़की से शादी की, तो मैं उसे अपनी संपत्ति से बेदखल कर दूँगा।”

मेरी आँखों से आँसू बहने लगे।

“वह तुमसे मिलने आ रहा था… लेकिन उसी रात… उसका एक्सीडेंट हो गया।”

पूरा गाँव स्तब्ध था।

“हमें लगा वह ज़िंदा है… हमें कभी पता ही नहीं चला…” मैंने काँपती आवाज़ में कहा।

बूढ़ा आदमी फूट-फूटकर रो पड़ा।

“मैंने झूठ बोला।
मैंने कहा कि वह विदेश चला गया है।
मैंने तुम्हें बदनाम होने दिया… तुम्हारे बच्चे को बिना पिता के बड़ा होने दिया…”

वह मेरे पैरों को छूने लगा।

“भगवान ने मुझे सज़ा दी, बेटी।
मेरे बेटे के जाने के बाद… मेरा दिल कभी शांत नहीं हुआ।
कल अस्पताल में एक डॉक्टर ने तुम्हारे बेटे का नाम लिया—और उसकी आँखें… बिल्कुल रमेश जैसी…”

सच जो सबको रुला गया

मैं अपने बेटे की ओर देख रही थी।
वही आँखें… वही मासूमियत।

गाँव के वही लोग—जो सालों से मुझे ताने देते थे—आज सिर झुकाए खड़े थे।

एक बूढ़ी औरत रोते हुए बोली,
“हमने कितना बड़ा पाप किया, भगवान…”

वह आदमी उठा और बोला,
“ये बच्चा मेरे बेटे की आख़िरी निशानी है।
और आज से… यह मेरा पोता है।”

वह पल जिसने सब बदल दिया

मेरे बेटे ने धीरे से पूछा,
“तो… क्या मेरे पापा अच्छे थे?”

बूढ़ा आदमी घुटनों पर बैठ गया।

“बहुत अच्छे, बेटा।
वह तुम पर जान छिड़क देता।”

मैंने अपने बेटे को पहली बार मुस्कुराते देखा—एक ऐसी मुस्कान जो मैंने कभी नहीं देखी थी।

न्याय का दिन

अगले दिन गाँव में पंचायत बुलाई गई।

वही लोग जो मुझे “कलंक” कहते थे, आज मुझसे माफ़ी माँग रहे थे।

उस बूढ़े आदमी ने सबके सामने कहा,
“अगर किसी ने सावित्री या उसके बेटे को कभी नीचा दिखाया… तो वह मुझसे दुश्मनी करेगा।”

उसने मेरे बेटे के नाम ज़मीन के काग़ज़ रखे।
उसकी पढ़ाई, उसका भविष्य—सब सुरक्षित।

लेकिन मैंने कहा,
“मुझे दौलत नहीं चाहिए।
मुझे सिर्फ़ मेरे बेटे का सम्मान चाहिए।”

आख़िरी दृश्य

शाम को, जब लग्ज़री कारें वापस जा रही थीं, पूरा गाँव सड़क के किनारे खड़ा था।

कुछ औरतें रो रही थीं।
कुछ मर्द शर्म से सिर झुकाए थे।

मैंने पीछे मुड़कर अपने मिट्टी के घर को देखा—वही घर जिसने मेरी तकलीफ़ें देखी थीं।

मेरा बेटा मेरा हाथ थामे बोला,
“माँ… अब लोग हमें बुरा नहीं कहेंगे, ना?”

मैं झुकी, उसे गले लगाया और कहा,
“नहीं बेटा।
अब वे सच जानते हैं।”

और उस सच ने
—पूरे गाँव को रुला दिया।

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