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“सुहागरात की रात उसने कहा: मुझे मत छुओ… और तभी मैंने उसके शरीर पर सच्चाई देख ली
एक दोपहर, जब मैं घर में कुछ ज़रूरी काग़ज़ात सहेज रहा था, तभी अनन्या के हैंडबैग से एक मेडिकल लिफ़ाफ़ा गिर पड़ा। उस पर हाल की तारीख़ें थीं और एक ऐसा नाम लिखा था जिसे मैं नहीं पहचानता था। लिफ़ाफ़े पर दिल्ली की एक निजी क्लिनिक की मुहर लगी थी। मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।
उस रात मैंने तय किया—अब चुप नहीं रहूँगा।
हमारी शादी की रात मेरी ज़िंदगी की सबसे उजली शुरुआत होनी चाहिए थी। होटल के कमरे में अब भी चमेली और गुलाब की ख़ुशबू तैर रही थी, और हवन में जले धूप-अगरबत्ती की महक हवा में बसी हुई थी। शादी के मंत्रों की गूंज जैसे अब भी मेरे कानों में अटकी हुई थी, जब मैंने कमरे का दरवाज़ा बंद किया।
मैं, अर्जुन मेहरा, घबराया हुआ था… लेकिन खुश भी।
मैंने उस दिन को किसी वरदान की तरह इंतज़ार किया था।
अनन्या शर्मा, मेरी पत्नी, अभी भी अपने लाल साड़ी के आभूषण पहने हुए, बिस्तर के किनारे बैठी थी। उसने मेरी ओर देखा तक नहीं। उसकी उंगलियाँ चूड़ियों से खेल रही थीं।
जब मैं उसका हाथ पकड़ने आगे बढ़ा, तो वह झटके से पीछे हट गई और टूटी हुई आवाज़ में बोली—
—कृपया… मुझे मत छुओ।
मेरे अंदर कुछ टूट गया।
मैंने सोचा शायद वह घबराई हुई है। अरेंज मैरिज, रस्में, परिवार का दबाव—सब कुछ एक साथ बहुत ज़्यादा हो गया होगा।
लेकिन जब पास की लैम्प की हल्की रोशनी उसकी त्वचा पर पड़ी… तो मैंने देख लिया।
उसकी बाहों पर, पीठ पर, यहाँ तक कि गर्दन पर भी गहरे नीले-काले निशान थे।
वे पुराने नहीं थे।
वे ताज़ा थे।
—ये किसने किया? —मैंने कांपती आवाज़ में पूछा— क्या तुम्हारे सौतेले पिता ने?
अनन्या का शरीर काँपने लगा। कुछ पल वह कुछ नहीं बोली, फिर आँसू बिना रुके बहने लगे।
—हाँ… —उसने फुसफुसाकर कहा— बचपन से।
मैं उसके सामने बैठ गया। बहुत सावधानी से उसके हाथ थामे, जैसे ज़रा-सा दबाव भी उसे तोड़ सकता हो।
—अब सब ख़त्म —मैंने दृढ़ स्वर में कहा— तुम अब उस घर में नहीं हो। तुम मेरी पत्नी हो। तुम सुरक्षित हो। मैं वादा करता हूँ—कोई तुम्हें फिर कभी हाथ नहीं लगाएगा।
उसने सिर हिलाया, लेकिन उसकी आँखों में सिर्फ़ डर नहीं था।
वहाँ शर्म थी… अपराध-बोध था… और एक भारी चुप्पी।

उस रात कोई जश्न नहीं हुआ।
कोई निकटता नहीं हुई।
बस हम दोनों एक-दूसरे को पकड़े रहे, जबकि बाहर शहर सो रहा था—इस बात से बेख़बर कि हमारे कमरे में एक जंग शुरू हो चुकी थी।
अगले कुछ हफ्तों में मैंने उसे समझाने की कोशिश की।
पुलिस।
वकील।
महिला सहायता संगठन।
यहाँ तक कि परिवार के किसी बुज़ुर्ग से बात करने की भी।
लेकिन अनन्या हर बार बात बदल देती।
—अर्जुन, ये इतना आसान नहीं है —वह कहती— मेरी माँ यक़ीन नहीं करेगी। हमारे परिवार में… ऐसी बातें दबा दी जाती हैं।
लेकिन कुछ ग़लत था।
चोटें फिर भी आती रहीं।
यहाँ तक कि हमारे साथ रहने के बाद भी।
मैं काम में व्यस्त रहता, यह सोचकर कि अब वह सुरक्षित है।
एक रात मैं और नहीं सह पाया।
—अनन्या… तुम मुझसे और क्या छुपा रही हो? —मैंने पूछा।
वह पीली पड़ गई। धीरे-धीरे ज़मीन पर बैठ गई और फूट-फूटकर रोने लगी।
जो वह बताने वाली थी, उसने मेरी पूरी दुनिया हिला दी।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
उसकी उंगलियाँ साड़ी को इतनी ज़ोर से पकड़ रही थीं कि उनके पोर सफ़ेद पड़ गए।
—अर्जुन… —वह बोली— अगर मैंने सच बता दिया… तो तुम मुझे बचा नहीं पाओगे।
मेरी रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।
—मुझे देखो —मैं उसके सामने घुटनों के बल बैठ गया— जो भी है, हम साथ मिलकर सामना करेंगे। हमने अग्नि के सामने यही वचन लिया था।
उसने सिर हिला दिया।
—इतना सरल नहीं है।
कुछ पल चुप रहकर उसने कहा—
—मेरे सौतेले पिता… अकेले नहीं हैं।
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
—क्या मतलब?
अनन्या ने आँखें बंद कर लीं। एक आँसू गाल पर लुढ़क गया।
—सारी चोटें… हमेशा उनसे नहीं आतीं —उसकी आवाज़ टूट गई— कुछ… कुछ मैं खुद करती हूँ।
मैं स्तब्ध रह गया।
—नहीं… ऐसा नहीं हो सकता।
—क्योंकि वह सच में है —वह बोली— उसने सालों तक मेरा शोषण किया। मुझे अंदर से तोड़ दिया। जब मैं उस घर से निकली… तो आज़ाद नहीं हुई।
उसने अपनी बाँह ऊपर की और एक पुराना निशान दिखाया।
—उसने मुझे यक़ीन दिलाया कि मैं बेकार हूँ। कि दर्द ही मेरी क़िस्मत है। कभी-कभी… जब सब कुछ तुम्हारे साथ अच्छा लगता है… मेरा दिमाग़ फिर वहीं लौट जाता है।
मेरे भीतर ग़ुस्सा, बेबसी और समाज के प्रति नफ़रत उमड़ आई।
—और वह मेडिकल लिफ़ाफ़ा? —मैंने पूछा— वह नाम कौन है?
अनन्या चौंक गई।
—वह मनोचिकित्सक है —उसने कहा— दिल्ली में। मैंने नहीं बताया क्योंकि मुझे डर था… डर था कि तुम मुझे टूटी हुई समझोगे। हमारे समाज में, यह एक सज़ा है।
मैंने उसे कसकर गले लगाया।
—तुम टूटी नहीं हो —मैंने कहा— तुम घायल हो। और घाव भरे जा सकते हैं।
कुछ देर वह जड़ रही… फिर धीरे-धीरे मुझे थाम लिया, लेकिन उसका शरीर अब भी काँप रहा था।
उस रात, जब अनन्या पहली बार बिना डरे सोई, मैंने उसका फ़ोन उठाया—बस अलार्म लगाने के लिए।
तभी मैंने देखा।
एक नया संदेश।
अनजान नंबर।
“क्या तुम्हें लगा शादी तुम्हें बचा लेगी?
जल्द मिलेंगे।”
मेरी रगों में ख़ून जम गया।
मैंने अनन्या की ओर देखा।
वह सो रही थी।
नाज़ुक।
मुझ पर भरोसा किए हुए।
मैंने फ़ोन कसकर पकड़ लिया।
मुझे नहीं पता था यह संदेश किसने भेजा।
मुझे नहीं पता था उसका अतीत कितनी दूर तक फैला है।
लेकिन एक बात साफ़ थी—
हमारी कहानी शादी से शुरू नहीं हुई थी।
वह एक युद्ध से शुरू हुई थी।
और मुझे अब भी नहीं पता था कि दुश्मन बाहर है…
या उस स्त्री के भीतर, जिससे मैंने अग्नि के सामने प्रेम और रक्षा की क़सम खाई थी।
