कभी-कभी इंसान उस चीज के पीछे भागता है जो उसकी नहीं होती और जो उसकी होती है उसे ठुकरा देता है। यही गलती की एक पत्नी ने और अंजाम ऐसा मिला जिसने सब कुछ छीन लिया क्योंकि इस कहानी में आप जो देखने वाले हैं दिल को झकझोर देने वाली है। पूरी कहानी जानने के लिए वीडियो को अंत तक जरूर देखिए और अगर आप भी रिश्तों की कद्र करते हैं तो वीडियो को लाइक करें। चैनल को सब्सक्राइब करें। और कमेंट में अपना और अपने शहर का नाम जरूर लिखें। दोस्तों, यह सच्ची कहानी उत्तर प्रदेश के रहने वाली लावण्या की है। लावण्या श्यामनगर के एक आम मिडिल क्लास परिवार में जन्मी थी। लेकिन

उसके ख्वाब, उसके शौक, वो बिल्कुल भी आम नहीं थे। उसे सस्ते कपड़े पसंद नहीं आते थे। उसे महंगे मोबाइल, ब्रांडेड पर्स और खास बनारसी साड़ियां चाहिए थी। और उसकी शादी हुई एक साधारण लड़के आरव से। आरव एक प्राइवेट कंपनी में काम करता था। उसकी सैलरी उतनी नहीं थी कि वो लावण्या की हर ख्वाहिश पूरी कर सके। लेकिन फिर भी वो पूरी कोशिश करता था कि लावण्या खुश रहे। एक दिन लावण्या ने गुस्से में कहा। मैंने तुमसे कितनी बार कहा है आरव? मुझे एक अच्छी सी बनारसी साड़ी चाहिए। हर बार तुम बहाना बना देते हो। क्या तुम सच में मेरे लिए कुछ करना चाहते भी हो या नहीं? आरव ने
थोड़ा उदास होकर जवाब दिया। घर के राशन में ही पैसे खत्म हो गए। लावण्या महीने का आखिरी चल रहा है। अगले महीने पक्का दिला दूंगा। लावण्या ने फिर ताना मारा। सिर्फ मेरे लिए ही पैसे नहीं बचते। तुम्हें मुझसे ज्यादा अपने घर वालों की फिक्र रहती है। आरव ने धीरे से कहा, “तुम जानती हो लावण्या। मैं एक छोटी कंपनी में काम करता हूं। बहुत ज्यादा कमाता नहीं। जितना आता है उसी में घर चलाना पड़ता है। अभी आरती की शादी करनी है। अगर हम बचत नहीं करेंगे तो उसका क्या होगा? लावण्या ने आंखें तरेरी। मुझे नहीं पता। पहले मेरी जरूरतें पूरी करो।
फिर जो करना है करो। आरव के पापा अब इस दुनिया में नहीं थे। उसके घर में बस मां सरस्वती देवी, छोटी बहन आरती और अब लावण्या ही थे। आरती की पढ़ाई खत्म हो चुकी थी। लेकिन पैसों की तंगी ने उसके सपनों को रोक रखा था। कुछ दिनों से लावण्या हर बात में झगड़ने लगी थी। एक दिन उसने कहा कितने दिन हो गए हैं कहीं बाहर घुमाने नहीं ले गए। अब तो घर की चार दीवारों से घुटन होने लगी है। कुछ भी करो। इस बार मुझे बाहर ले चलो। और हां, मम्मी और आरती को बोल देना। सिर्फ हम लोग ही घूमने जाएंगे। आरव ने शांत होकर कहा, तुम्हें मेरे मां और बहन के साथ जाने में
दिक्कत है क्या? तुम तो बाजार जाती रहती हो। लेकिन मम्मी और आरती कहीं नहीं जाती। इसी बहाने सब लोग थोड़ा घूम लेंगे। और हां, खाना घर से पैक कर लेते हैं। लावण्या ने बात काट दी। घर का खाना पैक करने का काम मुझसे मत कहो। मैं नहीं बनाऊंगी। उनके लिए खाना बनाना मेरे बस की बात नहीं। आरव ने थक कर कहा, ठीक है मैं खुद कर लूंगा लेकिन याद रखना इस बार तुम्हारी बनारसी साड़ी जरूर लाकर दूंगा। अगले ही दिन पूरा परिवार तैयार होकर पार्क के लिए निकल पड़ा। रास्ते से आरव कुछ खाना पैक करवाता है और फिर सब लोग श्याम घर के मिलन पार्क पहुंचते हैं। पार्क में बहुत भीड़ थी।
बच्चे खेल रहे थे। बूढ़े लोग हंसते हुए गप्पे मार रहे थे और उसी भीड़ में लावण्या की नजर एक अजनबी पर टिक गई। वह लड़का बेहद स्मार्ट और अमीर दिख रहा था। महंगी घड़ी, स्टाइलिश कपड़े और उस चेहरे पर एक अलग ही चमक थी। लावण्या की नजरें उसी पर अटक गई। वो उसे देर तक देखती रही। शायद वही जिंदगी थी जो उसने चाही थी। आरव ने जब देखा कि लावण्या कहीं खोई हुई है तो उसने पूछा क्या हुआ लावण्या तुम ठीक तो हो लावण्या ने झटका खाकर कहा हां हां मैं ठीक हूं आरव ने मुस्कुरा कर कहा चलो तुम्हारी साड़ी भी दिला दूंगा पहले सब खाना खत्म कर लें फिर
मॉल चलते हैं लावण्या ने रूखा सा जवाब दिया कब मना किया मैंने चलो खाना खत्म हुआ सब लोग शहर के सबसे बड़े मॉल सिटी सेंटर की ओर निकल पड़े। चारों तरफ चमक, ब्रांडेड शॉप्स और सजी धजी दुनिया थी और तभी लावण्या की नजर फिर उसी लड़के पर पड़ी जो कुछ देर पहले पार्क में बैठा था। लेकिन इस बार वह अकेली थी और उसके मन में एक ख्याल उठा। लावण्या की नजर जैसे ही उस लड़के पर पड़ी, उसके दिल की धड़कने थोड़ी तेज हो गई। उसे खुद समझ नहीं आया कि ऐसा क्यों हो रहा है। लेकिन कुछ तो था उस अजनबी में जो उसे खींच रहा था। वो लड़का मॉल में अकेला घूम रहा था। उसके हाथ में शॉपिंग बैग्स थे
और वह किसी स्टोर की ओर बढ़ रहा था। लावण्या की नजरें उसके पीछे-पीछे चल रही थी। लावण्या के साथ आरव, आरती और मां भी थे। लेकिन उसका ध्यान अब कहीं और था। वह चाहकर भी उस लड़के से बात नहीं कर पा रही थी। परिवार साथ था और वह कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। शॉपिंग खत्म हुई। सब लोग घर लौट आए। घर पहुंचते ही लावण्या ने ताना मारा। मुझे समझ नहीं आता हर बार मेरी पसंद की चीजें क्यों नहीं मिलती। मुझसे पूछा तक नहीं कि और कुछ चाहिए या नहीं। सारे पैसे तो आरती की शादी और घर के राशन में उड़ जाते हैं। आरव ने थक कर कहा। लावण्या तुमने जो बोला वह दिलाया। अब
कितना सामान और लाते? आरती की शादी करनी है। सब कुछ धीरे-धीरे ही तो होगा। लावण्या ने रूखी आवाज में कहा, ठीक है, कल खुद ही बाजार चली जाऊंगी। जो रह गया है, वो ले आऊंगी। अगले ही दिन लावण्या अकेली मॉल के लिए निकल पड़ी। वह जानती थी कि उसका परिवार अब उसे ज्यादा कुछ कहने वाला नहीं है। जैसे ही वह मॉल के भीतर पहुंची सामने से वही लड़का फिर दिखा। इस बार लावण्या ने खुद को नहीं रोका। वो उसके पास गई और मुस्कुरा कर बोली आप आप ही थे ना कल पार्क में? पिकनिक मना रहे थे दोस्तों के साथ। लड़की ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया। हां। और आप भी वही है जो मुझे कल पार्क में देख
रही थी। और कल मॉल में भी लावण्या थोड़ा चौकी फिर धीरे से हंसती वो बोली जी दरअसल मैं अपने परिवार के साथ आई थी आज अकेली आई हूं मेरे पति को ऑफिस से छुट्टी नहीं मिली तो लड़के ने थोड़ी हैरानी दिखाते हुए कहा ओ तो आप शादीशुदा है मुझे लगा आप शायद खैर कोई बात नहीं वैसे आप बहुत खूबसूरत है कोई भी पहली नजर में धोखा खा सकता है। लावण्या ने थोड़ी शर्म से मुस्कुराते हुए पूछा, “आपका नाम क्या है?” लड़का बोला, मैं अभिषेक और आप? लावण्या ने जवाब दिया, लावण्या। अभिषेक ने कहा, “अगर आपको कोई दिक्कत ना हो, तो मैं आपके साथ शॉपिंग कर सकता हूं।” वैसे भी मुझे यहां ज्यादा कुछ
नहीं आता और आप भी अकेली हैं। तो थोड़ा साथ हो जाएगा। लावण्या के चेहरे पर पहली बार एक अलग सी रोशनी थी। वह बोली, “क्यों नहीं? वैसे भी मुझे भी शॉपिंग करनी थी।” उस दिन लावण्या और अभिषेक ने पूरा दिन साथ बिताया। कभी कपड़ों की दुकान, कभी ज्वेलरी, कभी कॉफी। अभिषेक ने लावण्या को खुले दिल से महंगे-महंगे गिफ्ट दिलाए। लावण्या जब घर लौटी तो उसके हाथों में ढेर सारी शॉपिंग थी। और चेहरे पर एक अलग ही चमक। आरव ने पूछा इतना सारा सामान यह सब कहां से आया? लावण्या ने रूखा जवाब दिया। गिफ्ट है मुझे किसी ने दिया है। यह सब मेरा है। तुम्हें चिंता करने की जरूरत
नहीं। धीरे-धीरे लावण्या की जिंदगी बदलने लगी। जब भी आरव ऑफिस जाता, लावण्या अभिषेक से मिलने निकल जाती। कभी मॉल में, कभी पार्क में तो कभी किसी कैफे में। फोन पर घंटों बातें होती और हर मुलाकात के बाद लावण्या की आंखों में एक अलग ही ख्वाब पलने लगते। उसे अब आरव से चिर होने लगी थी। वो हर बात पर झगड़ने का बहाना ढूंढती। कभी खाने में कमी निकालती। कभी कपड़ों को लेकर। आरव की मां ने एक दिन परेशान होकर कहा। बेटा जब तू ऑफिस चला जाता है तो बहू रोज कहीं बाहर जाती है। शाम तक घर नहीं लौटती। उसके लक्षण कुछ ठीक नहीं लगते। अब आरव भी सोच में पड़ गया। उसने लावण्या से
पूछा, लावण्या, तुम रोज कहां जाते हो? यह सब गिफ्ट कहां से आ रहे हैं? लावण्या ने आंखों में आग लेकर कहा, “अगर तुम्हें मेरे साथ नहीं रहना, तो साफ-साफ कह दो। यह सब मेरा है। मुझे गिफ्ट में मिला है। तुमसे कोई लेना देना नहीं।” आरव कुछ बोल नहीं पाया। लेकिन उसके दिल में दर्द साफ था। आरव और लावण्या के बीच अब रोज की तकरार होने लगी थी। घर में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया था। आरती और मां सरस्वती देवी भी सब कुछ देख रही थी। लेकिन कुछ कह नहीं पा रही थी। एक रात जब आरव थक कर घर लौटा तो लावण्या ने साफ-साफ कह दिया। मैं तुम्हारे साथ और नहीं रह सकती। मुझे तुमसे तलाक
चाहिए। आरव जैसे सुन हो गया था। उसने धीरे से कहा तुम्हें समझ में भी आ रहा है कि तुम क्या कह रही हो तलाक किस लिए लावण्या ने बिना कोई भाव दिखाए कहा मुझे तुम्हारे साथ अब कोई खुशी नहीं मिलती तुम मेरी जरूरतें पूरी नहीं कर सकते मैं थक गई हूं इस जिंदगी से आरव ने गुस्सा दबाकर कहा अभी आरती की शादी भी नहीं हुई है अगर हमारा तलाक हो गया तो लोग क्या कहेंगे उसकी शादी में कितनी दिक्कतें आएंगी लावण्य ने ताना मारा। मुझे परवाह नहीं है तुम्हारी बहन की। मुझे अपनी जिंदगी चाहिए। तुम्हारे साथ मैं और नहीं जी सकती। आरव उस रात चुपचाप
बैठा रहा। नींद उसकी आंखों से कोसों दूर थी। अगली सुबह उसने मां सरस्वती देवी से सारी बात कही। मां ने एक गहरी सांस ली और कहा बेटा एक बात हमेशा याद रखना। अगर एक लड़की किसी रिश्ते को बचाने की कोशिश करे तो शायद वो रिश्ता बच जाए। लेकिन अगर वह खुद ही जाने को तैयार हो जाए तो कोई उसे रोक नहीं सकता। अब उसे जाने दे बेटा। जितना तुम खींचोगे उतना तुम खुद टूटोगे। आरव की आंखें भीग चुकी थी। लेकिन उसने खुद को संभाला और तलाक देने के लिए तैयार हो गया। कुछ ही दिनों में कागजी कारवाई पूरी हुई। और जिस दिन दस्तखत करने का वक्त आया आरव ने लावण्या की आंखों में
देखकर बस इतना कहा तुम्हारा नाम लावण्या था लेकिन तुम मेरे घर की कभी भी लावण्या नहीं बन पाई। जाओ अब आजाद हो। लावण्या ने बेफिक्री से तलाक के कागज लिए और उसी रात सीधा अभिषेक के पास पहुंच गई। वो मुस्कुराई और बोली। अब सब कुछ खत्म हो गया है। मैं अब तुम्हारे साथ एक नई जिंदगी शुरू करना चाहती हूं। क्या तुम मुझसे शादी करोगे? अभिषेक थोड़ा चौंका। फिर हंसते हुए बोला, मैंने तो उस दिन यूं ही कह दिया था। तुमने सच में अपने पति को छोड़ दिया। लावण्या के चेहरे से जैसे सारी रंगत उड़ गई। उसने कांपती आवाज में कहा, “अभिषेक, ऐसा मत कहो। मैंने तुम्हारे लिए सब कुछ
छोड़ दिया है। अब मैं कहां जाऊंगी? अभिषेक ने नजरें फेर ली और कहा जब तुम अपने पति की नहीं हो सकी तो मेरी कैसे बनोगी और वह वहां से चला गया लावण्या को अकेला छोड़कर अब ना उसके पास परिवार था ना अभिषेक ना कोई सहारा वो वहीं मॉल के बाहर फुटपाथ पर बैठी रही फूट-फूट कर रोती रही उसे आज समझ में आया था कि जो चमक उसने देखी थी वह सिर्फ धोखा था जिंदगी में कुछ ख्वाब पूरे पूरे करने के लिए नहीं होते। उन्हें समझने के लिए होते हैं। लावण्या ने सब कुछ खो दिया। सिर्फ उस दुनिया के लिए जो कभी उसकी थी ही नहीं। अब लावण्या के पास पछतावे और
अकेलेपन के सिवा कुछ नहीं बचा था। वो लौटना चाहती थी। उसी घर जहां कभी उसे सच्चा प्यार मिला था। वो आरव जिसने हर हाल में उसका साथ निभाया। जिसने उसकी हर छोटीछोटी ख्वाहिशों को पूरा करने की कोशिश की। जिसे उसने बेवजह ठुकरा दिया था। वो वापस गई। आंसू भरी आंखों से कांपते हाथों से दरवाजा खटखटाया। बार-बार विनती की। गिड़गिड़ाई। बस एक आखिरी मौका मांगा। लेकिन इस बार आरव की आंखों में वो इंतजार नहीं था। वो मोह नहीं था। उसने सिर्फ इतना कहा उस वक्त अपनाओ जब वह टूटने से पहले तुम्हारे पास हो। क्योंकि जब कोई पूरी तरह टूट जाए तो वह दोबारा वही नहीं बन पाता और
आरव ने दरवाजा बंद कर दिया। लावण्या वही दरवाजे पर बैठकर फूट-फूट कर रोती रही। लेकिन अब उसकी चीखों को सुनने वाला कोई नहीं था। उसके आंसू अब सिर्फ जमीन पर गिर रहे थे और दिल में सन्नाटा छोड़ रहे थे। वो जान चुकी थी कि उसने जो खोया है वो कभी वापस नहीं आएगा। अब बस एक खामोश जिंदगी, अधूरे सपने और गहरा पछतावा ही उसका साथी था। इस कहानी से हमें यह सीखने को मिलता है कि जिंदगी में हर चमकती चीज सोना नहीं होती। कभी-कभी जो हमारे पास है वही सबसे कीमती होता है। बस हमें उसकी अहमियत समझने में देर हो जाती है। रिश्तों की बुनियाद सिर्फ पैसा नहीं होता बल्कि प्यार, भरोसा
और साथ होता है। जो इंसान हर हाल में हमारे साथ खड़ा रहता है वही हमारा अपना होता है। लेकिन अगर हम सिर्फ लालच और दिखावे के पीछे भागते हैं तो ना केवल हम किसी को खो देते हैं। बल्कि खुद को भी कहीं खो बैठते हैं। कभी भी किसी के सच्चे प्यार को ठुकरा कर झूठी चमकधमक की तरफ मत भागो क्योंकि एक दिन वही चमक आंखों से आंसू बनकर वह जाएगी और तब कोई साथ नहीं होगा। अब आप बताइए अगर आप आरव की जगह होते तो क्या लावण्या को माफ कर पाते या फिर लावण्या को वह सजा मिली जो उसे मिलनी चाहिए थी? कमेंट में जरूर बताइए। आपकी राय इस कहानी को और गहराई दे सकती है। और अगर
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