एक छोटे से गाँव में, जो एक शांत नदी के किनारे बसा था, मोहन नाम का एक विधुर व्यक्ति सीता की ज़िंदगी में आया—एक सुंदर लेकिन बदक़िस्मत महिला, जिनके पति का देहांत बहुत पहले हो चुका था और जो अपनी चार छोटी बेटियों के साथ अकेली रह गई थीं। ये चारों बेटियाँ—पूजा, कविता, नेहा और रीमा—अपनी माँ की कोमल सुंदरता की वारिस थीं; चमकती आँखें और बसंत की धूप जैसी मुस्कान। जब मोहन ने सीता से विवाह किया, तो वह केवल पति ही नहीं, बल्कि उन चारों लड़कियों का सौतेला पिता भी बन गया।

शुरुआती दिनों में नए परिवार की ज़िंदगी काफ़ी कठिन थी। मोहन बढ़ई का काम करता था; आमदनी सीमित थी, जबकि सीता घर पर बच्चों की देखभाल करती थीं। फिर भी मोहन ने उन चारों को अपनी सगी बेटियों की तरह चाहा। उसने पूजा को लकड़ी तराशना सिखाया, कविता को परियों की कहानियाँ सुनाईं, नेहा की पुरानी साइकिल ठीक की, और छोटी रीमा के रोने पर हर रात लोरी गाई। खून का रिश्ता न होते हुए भी, मोहन ने उन बच्चियों के नुकसान की भरपाई पूरे दिल से की।
फिर एक दिन, सीता एक गंभीर बीमारी के कारण चल बसीं और मोहन के साथ रह गईं चार बेटियाँ—जो अब बड़ी हो रही थीं। लोगों ने मोहन से दोबारा शादी करने को कहा; अकेले चार बच्चों की परवरिश आसान नहीं थी। मगर वह बस मुस्कराया और सिर हिलाकर बोला,
“ये मेरी बेटियाँ हैं, मैं इन्हें छोड़ नहीं सकता।”
और उसने अपना वादा निभाया। वह सुबह से देर रात तक मेहनत करता, ताकि बेटियों को खाना-कपड़ा मिले और अच्छी शिक्षा भी। ठंडी सर्द रातों में वह अंगीठी के पास बैठकर बेटियों के फटे कपड़े सीता, मेहनत से खुरदुरे हो चुके हाथों के बावजूद उसकी आँखों में अजीब-सी गर्माहट रहती।
पूजा—सबसे बड़ी—मेहनती और होशियार थी; डॉक्टर बनने का सपना देखती थी। कविता—दूसरी—चित्रकला की दीवानी थी; अक्सर मोहन का मुस्कुराता हुआ पोर्ट्रेट बनाती। नेहा—तीसरी—मज़बूत और जुझारू; दौड़ना-भागना पसंद करती और बढ़ईखाने में मोहन की मदद करती। और सबसे छोटी रीमा—संवेदनशील और सौम्य—साधारण लेकिन स्नेहभरे भोजन से पूरे घर को जोड़े रखती। मोहन की देखभाल में चारों बेटियाँ स्वस्थ, सुंदर और बड़े सपनों के साथ बड़ी हुईं।
समय बीतता गया और बेटियाँ अपने सपनों के पीछे गाँव छोड़कर निकल पड़ीं। पूजा को एक प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज में दाख़िला मिला, कविता ने शहर में एक छोटी-सी आर्ट गैलरी खोली, नेहा निर्माण इंजीनियर बनी, और रीमा प्री-स्कूल शिक्षिका। मोहन गाँव में ही रहा—पुराने लकड़ी के घर में, जहाँ कभी पाँच लोगों की हँसी गूँजती थी। बेटियाँ नियमित रूप से पैसे भेजती रहीं, मगर मोहन बढ़ई का काम करता रहा—जैसे वही उसे अतीत से जोड़े रखता हो।
बीस साल बाद, जब मोहन सत्तर के पार हो चुका था—बाल पूरी तरह सफ़ेद, हाथ काँपते हुए और छेनी पकड़ने में असमर्थ—चारों बेटियाँ अचानक लौट आईं। बिना बताए, एक ठंडी शरद सुबह वे घर के दरवाज़े पर खड़ी थीं। पूजा—अब एक विभागाध्यक्ष डॉक्टर—सफ़ेद एप्रन में थी। कविता—कलात्मक रंगों में रंगे बालों के साथ—कपड़े में ढकी एक बड़ी पेंटिंग लाई थी। नेहा—ऑफ़िस सूट में—औज़ारों से भरा एक सूटकेस खींच रही थी। और रीमा—लंबे सादे परिधान में—एक छोटा-सा तोहफ़ा थामे थी।
मोहन स्तब्ध रह गया; झुर्रियों भरे गालों पर आँसू बह निकले।
“तुम सब… अचानक ऐसे क्यों?” उसने भर्राई आवाज़ में पूछा।
पूजा ने मुस्कराकर उसका हाथ थामा, “पापा, आज आपका जन्मदिन है। हम कुछ ख़ास करना चाहते थे।”
वे उसे आँगन में ले गए, जहाँ कब से गाँव वाले इकट्ठा थे। मोहन के सामने एक नया, सुंदर घर था—जिसे नेहा ने कई महीनों तक चुपचाप डिज़ाइन और बनवाया था। भीतर, कविता ने अपनी पेंटिंग टाँगी—पुराने दिनों का एक पारिवारिक चित्र: बीच में मोहन, चारों छोटी बेटियों को बाँहों में लिए, और पीछे मुस्कराती सीता। पूजा ने एक और चौंकाने वाली बात बताई—उसने अपने साथियों के साथ मिलकर मोहन के नाम से एक चैरिटी ट्रस्ट शुरू किया था, जो इलाके के अनाथ बच्चों की मदद करेगा। और रीमा ने तोहफ़ा खोला—एक छोटी डायरी, जिसे उसने बीस सालों तक लिखा था; सौतेले पिता के साथ बिताई हर खूबसूरत याद उसमें दर्ज थी।
मोहन अवाक् रह गया। उसने सोचा था कि वह बस एक साधारण बढ़ई है, जिसने जीवन भर बच्चों को पालने के सिवा कुछ नहीं किया। मगर उस दिन उसने समझा—उसने खून के रिश्तों से परे एक परिवार गढ़ दिया था।
अप्रत्याशित अंत यहीं नहीं रुका। जन्मदिन की दावत के बीच एक अजनबी आया—ख़ुद को वकील बताते हुए। उसके पास बीस साल पुराना एक पत्र था—सीता का, जो उसने अपने निधन से पहले मोहन के लिए छोड़ा था। पत्र में लिखा था:
“मोहन, मुझे भरोसा है तुम बेटियों की अच्छी परवरिश करोगे। अगर कभी थक जाओ, तो पलंग के नीचे रखे लकड़ी के बक्से को खोलना। यह तुम्हारे लिए मेरा तोहफ़ा है।”
काँपते हाथों से मोहन ने वह पुराना बक्सा निकाला—जिस पर उसने कभी ध्यान नहीं दिया था। भीतर सीता की बचत की रकम थी और एक छोटा-सा काग़ज़:
“मेरी बेटियों को प्यार देने के लिए धन्यवाद। इस पैसे से बुढ़ापे में ख़ुश रहना।”
राशि बहुत बड़ी नहीं थी, लेकिन वह सीता के मौन प्रेम की अमिट निशानी थी।
पूरा परिवार एक-दूसरे से लिपटकर रो पड़ा—आँसुओं और ख़ुशी के बीच। गाँव वालों की तालियों में, एक परीकथा-सी सच्ची कहानी दर्ज हो गई।
मोहन—वह साधारण सौतेला पिता—न केवल चार खूबसूरत बेटियों को बड़ा कर पाया, बल्कि प्रेम के बीज बोकर, बीस साल बाद उससे भी ज़्यादा पूर्ण और सुंदर अंत पाया, जितना उसने कभी सपना देखा था।
