जोक़िन हर्नांदेज़ मोबाइल की स्क्रीन को ऐसे घूर रहा था, जैसे वह कोई अलार्म हो जो बंद होने का नाम न ले।
300 डॉलर।
वही तारीख। वही रकम। वही बैंक खाता।
पाँच साल। साठ ट्रांसफ़र।
साठ बार “भेजें” बटन दबाना—हर बार गले में वही गाँठ।
यह वादा उसने मारिसोल से अस्पताल में किया था।
कीमोथेरेपी से उसकी आवाज़ भारी थी, हाथ काँपते हुए जोक़िन के हाथ पर रखा था।

—“अगर मैं न रहूँ… तो मेरी माँ को अकेला मत छोड़ना।
थोड़ा ही सही, उसे भेजते रहना।
वह सख़्त है, लेकिन… वह मेरी माँ है।”
जोक़िन रोते हुए सिर हिलाया था।
एंटीसेप्टिक की गंध वाले उस कमरे में किया गया वादा पवित्र लगता था।
और वह अपने वचन का पक्का आदमी था।
लेकिन उस गुरुवार की दोपहर, बैंक की एक और सूचना दिल में सुई की तरह चुभ गई।
ट्रांसफ़र की नहीं—उसके बाद आई दूसरी चेतावनी की।
बिजली बिल: ₹2,950 बकाया।
सोमवार को कनेक्शन काटा जाएगा।
जोक़िन ने सूखा हुआ गला निगला।
रसोई की काउंटर पर टिक गया और फ्रिज की ओर देखने लगा—पुराने मैग्नेट, स्कूल की ड्रॉइंग्स।
वह दिल्ली के बाहरी इलाके में इलेक्ट्रिशियन था।
कमाई “ठीक-ठाक” थी,
लेकिन आठ साल की बेटी को अकेले पालना ऐसा था जैसे तार को उसकी क्षमता से ज़्यादा खींचना—
देर-सबेर वह गरम होकर जल ही जाता है।
—“पापा, आज पिज़्ज़ा मँगवा सकते हैं?”
कामिला ने पूछा, बैग कंधे पर लटकाए हुए,
और चेहरे पर वही मुस्कान—जो बिल्कुल मारिसोल जैसी थी।
वह मुस्कान हमेशा उसे तोड़ देती थी।
लेकिन उस दिन… और ज़्यादा चुभी।
जोक़िन झुका, उसकी चोटी ठीक की और ज़बरदस्ती मुस्कुराया।
—“आज नहीं।
चलो वो पराठे बना लेते हैं जो तुम्हें पसंद हैं, ठीक है?”
कामिला ने एक पल होंठ सिकोड़े,
फिर ऐसी समझदारी से सिर हिलाया जो किसी बच्चे की नहीं होनी चाहिए थी।
—“ठीक है…”
कहकर वह हाथ धोने चली गई—जैसे और सवाल नहीं पूछना चाहती हो।
जोक़िन फिर से मोबाइल देखने लगा।
“भेजें” बटन वहीं था—चमकता हुआ, आसान।
लेकिन उँगली हिली नहीं।
तभी फ़ोन काँपा।
लेटिसिया रंगेल:
“पेमेंट के तरीके के बारे में बात करनी है।
आज ही फ़ोन करो।”
जोक़िन चौंका।
उसकी सास, डोना लेटिसिया, कभी “बात करने की ज़रूरत” नहीं कहती थी।
पाँच सालों से वह पैसे लेती रही—
बिना कामिला के बारे में पूछे,
बिना स्कूल का हाल जाने,
बिना एक बार भी “तुम लोग कैसे हो?” कहे।
जब भी जोक़िन बात बढ़ाने की कोशिश करता,
वह ऐसे जवाब देती जैसे बेटी की मौत का दोष उसी का हो।
उस रात, जब कामिला सो गई,
जोक़िन ने अलमारी खोली और वह डिब्बा निकाला
जिसे वह शायद ही कभी छूता था—
“मारिसोल की चीज़ें।”
उसे ऊपर रखा गया था,
जैसे दर्द को भी कहीं सुरक्षित रख दिया गया हो।
ढक्कन उठाया।
शादी की अंगूठी।
दो तस्वीरें।
अस्पताल की एक कलाई-पट्टी।
और नीचे—
श्मशान की एक रसीद,
पीछे हाथ से लिखा नोट:
“दाह-संस्कार प्रमाणपत्र लेना है — L.R.”
और नीचे हस्ताक्षर: लेटिसिया।
जोक़िन जम गया।
क्योंकि वह लिखावट…
वह लिखावट अलग थी।
उस लिखावट से बिल्कुल अलग
जो अंतिम संस्कार के दिन
लेटिसिया ने बैंक खाते की जानकारी लिखते समय की थी।
पूरी तरह अलग।
उसकी गर्दन में सिहरन दौड़ गई—
जैसे बिजली की वायरिंग में शॉर्ट हो
और समझ न आ रहा हो कि गड़बड़ कहाँ है।
—“नहीं…”
जोक़िन ने फुसफुसाया।
“ऐसा नहीं हो सकता।”
लेकिन शरीर समझ चुका था
जिसे दिमाग़ अभी नकार रहा था—
कुछ बहुत ग़लत है।
अगली सुबह
साढ़े सात बजे दरवाज़े पर दस्तक हुई।
बाहर था ऑस्कर सालास,
कॉलेज के दिनों से उसका जिगरी दोस्त,
हाथ में दो चाय के कप
और चेहरे पर ऐसी गंभीरता
जो उस पर कभी नहीं दिखती थी।
—“घबराना मत,”
अंदर आते ही ऑस्कर बोला,
“लेकिन मुझे तुमसे बात करनी है…
उस खाते के बारे में
जिसमें तुम पैसे भेजते हो।”
जोक़िन का पेट सिकुड़ गया।
—“क्या हुआ?”
ऑस्कर बैंक के कस्टमर सर्विस विभाग में काम करता था।
वह कोई “जाँच अधिकारी” नहीं था,
लेकिन उसे पैटर्न पढ़ना आता था—
जैसे जोक़िन सिर्फ़ हवा की गंध से
जला हुआ तार पहचान लेता था।
ऑस्कर ने कुछ प्रिंट की हुई शीट्स उसकी ओर बढ़ाईं।
—“कल रात, जब तुमने मुझे अपनी सास के मैसेज के बारे में बताया,
तो मैंने जितना हो सका उतना देखा…
बिना किसी झंझट में पड़े।
मैं सब कुछ नहीं देख सकता,
लेकिन ट्रांज़ैक्शन दिखते हैं और…
जोक़िन, यह खाता किसी बुज़ुर्ग औरत जैसा नहीं चलता।”
जोक़िन ने नज़रें नीचे कर लीं।
₹800, ₹1,200, ₹2,000 के जमा—
हर हफ़्ते।
और जो बात उसकी रगों में बर्फ़ घोल गई:
हर बार जब वह $300 भेजता था,
अगले ही दिन वही पैसा
किसी दूसरी खाते में निकल जाता था—
ऐसे खाते में, जिसे वह पहचानता ही नहीं था।
—“यह बिजली या किराए के लिए नहीं है,”
ऑस्कर ने आवाज़ धीमी की।
“यह पैसा घुमाना है…
जैसे सिर्फ़ रास्ते में रखा गया हो।”
जोक़िन ने काग़ज़ों को मुट्ठी में दबा लिया,
इतना कि वे सिकुड़ गए।
—“और खाते का पता?”
ऑस्कर ने लार निगली।
—“वह वैसा नहीं है जैसा तुम सोचते हो।
यह संजय नगर की एक अपार्टमेंट बिल्डिंग में रजिस्टर है।
यह किसी बूढ़ी औरत का घर नहीं है, जोक़िन।
यह उन जगहों में से है
जहाँ कोई ज़्यादा सवाल नहीं पूछता।”
जोक़िन को लगा जैसे ज़मीन उसके पैरों के नीचे से खिसक गई हो।
उसने गर्दन के पीछे हाथ रख लिया।
—“और मेरी सास का फ़ोन नंबर?”
ऑस्कर ने अपना मोबाइल निकाला।
—“मैंने चेक किया।
वह किसी और नाम पर रजिस्टर है।
लेटिसिया रंगेल नाम से तो है ही नहीं।”
दोनों के बीच
एक भारी, दमघोंटू ख़ामोशी छा गई।
ऑस्कर ने एक कार्ड उसकी ओर बढ़ाया।
—“मैं तुम्हें डराना नहीं चाहता, लेकिन…
किसी प्रोफ़ेशनल को रखो।
वलेरिया क्रूज़, प्राइवेट इन्वेस्टिगेटर।
फ़ाइनेंशियल फ्रॉड देखती है।
और एक बात और—
इस खाते में दूसरे लोगों से भी पैसे आते हैं।
तुम अकेले नहीं हो।”
जोक़िन कुछ नहीं बोल पाया।
बस सिर हिलाया—
जैसे किसी ने कह दिया हो
कि उसकी दीवार के पीछे आग लगी है।
सोमवार को,
जोक़िन अपनी गाड़ी लेकर
संजय नगर के उन अपार्टमेंट्स के सामने रुका।
डर और दृढ़ता—
दोनों एक साथ थे।
वह न किसी पर चिल्लाने आया था,
न तमाशा करने।
वह अपनी आँखों से देखना चाहता था।
मैनेजर,
थका-सा आदमी—पेपे बाबू,
किराए की रजिस्टर पलटने लगा।
—“फ़्लैट 214…
हाँ, वही किराए पर है पिछले तीन साल से।
समय पर भुगतान।
कोई शिकायत नहीं।
मेरी जानकारी में… अकेली रहती है।”
जोक़िन ने गला साफ़ किया।
—“नाम?”
पेपे बाबू ने बिना ऊपर देखे कहा—
—“मारिसोल हर्नांदेज़।”
एक पल के लिए
जोक़िन की दुनिया बुझ गई—
जैसे अचानक बिजली चली जाए
और सन्नाटा तैरने लगे।
—“क्या… कहा आपने?”
वह किसी तरह बोल पाया।
—“मारिसोल हर्नांदेज़,”
पेपे बाबू ने अब उसे देखकर दोहराया।
“कोई रिश्तेदार हैं आपकी?”
जोक़िन को लगा वह गिर पड़ेगा।
उसने काउंटर पकड़ लिया।
—“क्या यहाँ…
सीसीटीवी हैं?
सिक्योरिटी कैमरे?”
पेपे बाबू झिझका।
लेकिन जोक़िन का चेहरा
गपशप करने वाले आदमी का नहीं था।
वह टूटने के कगार पर खड़ा आदमी था।
ऑफ़िस में
उसने मॉनिटर ऑन किया।
और जोक़िन ने उसे देख लिया।
न वह भूत थी।
न कोई हमशक्ल।
वह वही थी।
बाल छोटे थे।
शरीर और पतला।
लेकिन सिर झुकाने का वही अंदाज़,
सोचते समय होंठ दबाने की वही आदत—
मारिसोल।
ज़िंदा।
किराने की थैलियाँ लेकर चलती हुई।
फ़ोन पर किसी से हँसते हुए बात करती हुई।
और एक वीडियो में—
एक आदमी उसके साथ था,
जिसने उसके कंधे पर हाथ ऐसे रखा
जैसे उसे पूरा हक़ हो।
जोक़िन को मिचली आ गई।
वह लड़खड़ाते क़दमों से बाहर निकला।
गाड़ी में बैठकर
वहीं रह गया—
ऐसे साँस लेता हुआ
जैसे मीलों दौड़कर आया हो।
पाँच साल का मातम।
पाँच साल की दोहरी मेहनत।
पाँच साल कामिला को समझाना
कि “माँ स्वर्ग में है।”
और वह…
सिर्फ़ बीस मिनट दूर थी।
पहली भावना—
एक ऐसी ग़ुस्सा,
जो सीने को जला दे।
दूसरी—
और भी गहरी—
इतनी ठंडी कि
वह शर्म जैसी लगी।
उसी रात
उसने वलेरिया क्रूज़ को फ़ोन किया।
—“मुझे लगता है…
मेरी पत्नी ने अपनी मौत का नाटक किया,”
उसने कहा—
शब्द मुँह में अजीब लगे।
“और मेरे सास के नाम पर
मुझसे पैसे निकाले जा रहे हैं।”
वलेरिया हँसी नहीं।
न ही चौंकी।
बस उसी पेशेवर शांति से बोली
जिसने जोक़िन को
डूबने से बचाए रखा—
—“अगर यह सच है,
तो यह अपराध है।
और अगर और लोग भी भुगतान कर रहे हैं,
तो यह एक नेटवर्क हो सकता है।
मुझे सबूत चाहिए।
और मुझे चाहिए कि आप
शांत रहें, मिस्टर हर्नांदेज़—
ख़ासकर अपनी बेटी के लिए।”
जोक़िन ने आँखें बंद कर लीं।
—“मेरी बेटी के लिए… हाँ।”
मासिक ट्रांसफ़र का दिन आ गया।
जोक़िन ने बैंक की ऐप खोली।
“भेजें” का बटन हमेशा की तरह चमक रहा था।
लेकिन इस बार वह किसी वादे जैसा नहीं लगा।
वह ज़ंजीर जैसा लगा।
उसने कैंसिल कर दिया।
दो घंटे बाद फ़ोन बजा।
—“जोक़िन!” —लेटिसिया की आवाज़ अब किसी “दुखी बूढ़ी औरत” की नहीं थी।
वह तेज़ और काटने वाली थी—
“पैसे का क्या हुआ? अभी तक आए नहीं हैं।”
जोक़िन ने मेज़ पर छुपे माइक्रोफ़ोन की ओर देखा—
वही, जो वलेरिया ने रिकॉर्डिंग के लिए लगाया था।
—“इस महीने थोड़ा मुश्किल हो गया है, डोना लेटिसिया।”
—“मुझे परवाह नहीं!” —वह लगभग थूकती हुई बोली—
“मारिसोल ने तुमसे वादा करवाया था।
अगर तुम चूके…
तो मैं तुम्हारे बारे में बातें बता सकती हूँ।
ऐसी बातें जो तुम्हें बर्बाद कर देंगी।”
जोक़िन के भीतर चीख़ने की इच्छा उठी।
लेकिन उसने साँस ली।
जैसे ख़तरनाक करंट को कंट्रोल करते हो—
ज़रा तेज़ हुए, तो जल जाओगे।
—“कैसी बातें?”
उसने नक़ली शांति से पूछा।
लेटिसिया एक पल चुप रही,
फिर उसने वही उछाला
जिसे वह ताक़त समझ रही थी।
—“कि तुम अच्छे पति नहीं थे।
कि तुम उसके साथ बुरा बर्ताव करते थे।
कि… ” —वह हिचकी—
“कि तुम्हारी वजह से ही वह बीमार पड़ी।”
जोक़िन ने दाँत भींच लिए।
—“अजीब है…”
उसने कहा—
“क्योंकि मेरे भी कुछ सवाल हैं, डोना लेटिसिया।
जैसे—
आपके खाते में और लोगों के पैसे क्यों आते हैं?
मेरे भेजे पैसे अगले दिन किसी और खाते में क्यों चले जाते हैं?
और संजय नगर में
मारिसोल हर्नांदेज़ के नाम पर
एक फ़्लैट क्यों है?”
लेटिसिया की साँस तेज़ सुनाई दी।
और उसने फ़ोन काट दिया।
वलेरिया सोफ़े से उसे देख रही थी।
—“बस।
वह टूट गई है।”
उसी रात एक और मैसेज आया:
“कल 12 बजे।
लोधी गार्डन।
अकेले आना।”
वलेरिया ने बिना मुस्कान के मुस्कराया।
—“वह अकेली नहीं आएगी।”
अगले दिन,
जोक़िन पार्क की एक बेंच पर बैठा था।
दिल पसलियों पर हथौड़े की तरह मार रहा था।
वलेरिया और दो अंडरकवर पुलिसकर्मी
पास ही थे—
परिवारों और जॉगिंग करने वालों में
घुले-मिले।
लेटिसिया ठीक समय पर पहुँची।
चेहरे पर कोई कमज़ोर नानी वाली झुर्रियाँ नहीं।
लेदर जैकेट,
मज़बूत क़दम।
—“क्या चाहिए?”
बैठते ही बोली—
“पैसा?
या ड्रामा करना है?”
जोक़िन ने उसकी आँखों में सीधे देखा।
—“मुझे सच चाहिए।
मारिसोल कहाँ है?”
लेटिसिया हँसी—
लेकिन वह हँसी घबराई हुई थी।
—“मारिसोल वहीं है
जहाँ उसके लिए सही है।
तुम…
तुमने अपना हिस्सा निभा दिया है, जोक़िन।
इसे मत बिगाड़ो।”
—“‘इसे’?”
जोक़िन ने पूछा—
“क्या है यह?
एक धंधा?
विधुरों से ‘वादों’ के नाम पर पैसे वसूलना?”
लेटिसिया का जबड़ा सख़्त हो गया।
और उसी लम्हे
जोक़िन ने समझ लिया—
राक्षस सच में मौजूद है।
—“लोग शांति के लिए पैसे देते हैं,”
वह बोली।
“और तुम आसान हो।
क्योंकि तुम अच्छे हो।
क्योंकि जब कोई मरता है,
तो तुम्हें ज़िंदा रहने में भी अपराधबोध होता है।”
जोक़िन की आँखें भर आईं—
कमज़ोरी से नहीं,
दबी हुई ग़ुस्से से।
—“और कामिला…”
बेटी का नाम लेते ही
उसकी आवाज़ टूट गई—
“क्या वह भी इस प्लान का हिस्सा थी?
उसे माँ के बिना छोड़ देना?”
लेटिसिया ने कंधे उचका दिए,
जैसे मौसम की बात कर रही हो।
—“मारिसोल को नई शुरुआत चाहिए थी।
किसी ऐसे के साथ
जो उसे सच में ज़िंदगी दे।
तुम… ठीक थे।
लेकिन ‘ठीक’ रोमांच नहीं देता।”
वह वाक्य
जोक़िन के आर-पार चला गया।
और तभी
उसने मारिसोल को दूर देखा।
वह उसी आदमी के साथ चल रही थी
जो वीडियो में था।
वह रुकी,
इधर-उधर देखा…
और जब उसकी नज़र
जोक़िन से मिली—
वक़्त मुड़ गया।
मारिसोल जड़ हो गई।
एक पल के लिए
जोक़िन को लगा
वह उसकी ओर दौड़ेगी,
रोएगी,
कहेगी—
“माफ़ कर दो।”
लेकिन उसके चेहरे पर
पछतावा नहीं था।
वहाँ हिसाब था।
वलेरिया ने इशारा किया।
पुलिसकर्मी आगे बढ़े।
लेटिसिया उठकर भागना चाही,
लेकिन देर हो चुकी थी।
मारिसोल पीछे हटी,
आदमी उसे ढकने आया—
पर उन्हें भी घेर लिया गया।
जोक़िन वहीं बैठा रहा।
शरीर काँप रहा था
जैसे अभी-अभी
करंट लगा हो।
मारिसोल ने एक बार उसे देखा—
होंठ भींचे हुए।
और पाँच साल बाद
पहली बार
जोक़िन ने अपनी पत्नी को नहीं देखा।
उसने
एक अजनबी को देखा।
—“जोक़िन…”
वह बस इतना कह पाई—
“मैं…”
जोक़िन ने हाथ उठाया।
उसे चुप कराने के लिए नहीं—
बल्कि इसलिए कि
अगर वह बोली,
तो वह टूट जाएगा।
—“यहाँ नहीं,”
उसने धीमे से कहा—
“तुमसे नहीं।
अब नहीं।”
अगले महीने
वकीलों, बयानों
और थेरेपी का भँवर बन गए।
जाँच में सामने आया
कि लेटिसिया और मारिसोल
एक गिरोह का हिस्सा थीं—
झूठी “मौतें”,
छोटे बीमे,
और फिर
मासिक भुगतान के ज़रिए
कई लोगों से पैसे निकालना।
जिन “राखों” को
जोक़िन सालों तक संभाले रहा—
वे किसी और की थीं।
उसे घिन आई।
लेकिन साथ ही
एक अजीब-सी मुक्ति भी—
दोष उसका नहीं था।
कभी था ही नहीं।
सबसे मुश्किल था—
कामिला।
कोई सुंदर तरीका नहीं था
यह कहने का।
बच्चों की मनोवैज्ञानिक ने
उसे सरल,
मज़बूत,
बिना ज़हर वाले शब्द सिखाए।
—“मेरी जान…
तुम्हारी माँ ने
गलत फैसले लिए।
वह ज़िंदा है,
लेकिन हमारे साथ नहीं है।
और यह तुम्हारी वजह से नहीं।
कभी नहीं।”
कामिला रोई।
ग़ुस्सा हुई।
पूछा—
“क्या वह मुझसे प्यार करती थी?”
पूछा—
“क्या आप भी चले जाएँगे, पापा?”
और जोक़िन ने उसे ऐसे गले लगाया
जैसे अपनी बाँहों से
दुनिया जोड़ सकता हो।
—“मैं कहीं नहीं जा रहा।
यह वादा है—
अपने पूरे अस्तित्व के साथ।”
धीरे-धीरे
कामिला फिर से
बिना अपराधबोध के हँसने लगी।
जोक़िन ने
खुद को “मूर्ख आदमी” समझना छोड़ा
और खुद को
जीवित बचे इंसान की तरह देखना शुरू किया।
मुआवज़ा देर से आया—
लेकिन आया।
कुछ पैसे वापस मिले।
तरक़्क़ी मिली।
और सबसे क़ीमती चीज़—
उसकी अपनी आवाज़।
एक साल बाद,
एक रविवार को,
जोक़िन और कामिला
घर के आँगन में
एक छोटी-सी श्रद्धांजलि सजा रहे थे—
“झूठी मारिसोल” के लिए नहीं,
बल्कि उस प्यार के लिए
जो कामिला ने सच में महसूस किया था—
बिना हक़ीक़त से भागे।
कामिला ने
एक तस्वीर रखी—
अपनी और पापा की।
फिर बचपन की एक फोटो।
और अंत में
टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा
एक छोटा काग़ज़:
“मेरी आवाज़ मायने रखती है।”
जोक़िन ने पढ़ा,
और गला भर आया।
—“यह थेरेपी में सीखा?”
कामिला मुस्कराई।
—“नहीं, पापा।
आपसे सीखा।
क्योंकि आपने मेरी सुनी…
जब आपको दर्द हो रहा था।”
उस रात,
जोक़िन ने
मासिक ट्रांसफ़र की रसीद संभाली—
लेकिन अब
किसी अजनबी खाते में नहीं।
अब वे $300
कामिला के नाम
एक सेविंग अकाउंट में जाते थे:
“यूनिवर्सिटी।”
—“और कल पिज़्ज़ा?”
कामिला ने चमकती आँखों से पूछा।
जोक़िन हँस पड़ा—
एक साफ़, हल्की हँसी।
—“कल पिज़्ज़ा।
आइसक्रीम भी।
और अगर चाहो…
उस पिल्ले को भी गोद ले लेंगे
जो हमने देखा था।”
कामिला की चीख़ इतनी तेज़ थी
कि पड़ोसी झाँकने लगे।
जोक़िन ने उसे गले लगाया।
और बहुत समय बाद
उसने कुछ ऐसा महसूस किया
जो डर या मजबूरी नहीं था।
