एक वेट्रेस ने दो अनाथ बच्चों को खाना दिया… 17 साल बाद उसके घर के सामने एक लग्ज़री कार आकर रुकी
मुंबई की धारावी झुग्गी बस्ती की एक संकरी गली में
एक काली Mercedes-Benz आकर रुकती है।
घरों की दीवारों से पेंट उखड़ा हुआ है,
खिड़कियों पर जंग लगी लोहे की ग्रिल है
और सामने लगा छोटा-सा पौधा मुश्किल से ज़िंदा है।

लग्ज़री कार से करीब 25 साल का एक सलीकेदार युवक उतरता है।
उसका महँगा सूट इस माहौल से बिल्कुल मेल नहीं खाता।
एक हाथ में चमड़े की फाइल,
दूसरे में पैसों से भरा मोटा लिफ़ाफ़ा।
फटी हुई सड़क पर उसके कदमों की आवाज़ गूँजती है।
उसके हाथ हल्के-से काँप रहे हैं।
वह दरवाज़े की घंटी बजाता है।
अंदर से थके हुए, धीमे क़दमों की आवाज़ आती है।
दरवाज़ा खुलता है।
सामने खड़ी है सीता देवी शर्मा,
52 साल की एक महिला,
सफ़ेद बाल पीछे बँधे हुए।
उसके खुरदरे हाथ
और दाग़ लगा हुआ वेट्रेस का यूनिफ़ॉर्म
सालों की मेहनत की कहानी कहते हैं।
— “क्या आप सीता देवी शर्मा हैं?”
युवक काँपती आवाज़ में पूछता है।
वह उलझन में सिर हिलाती है।
वह इस अजनबी को नहीं पहचानती
जो किसी और ही दुनिया से आया लगता है।
— “मैं 17 साल पुराना एक कर्ज़ चुकाने आया हूँ,”
युवक लिफ़ाफ़ा आगे बढ़ाते हुए कहता है।
वह घबरा कर एक क़दम पीछे हट जाती है।
— “बेटा, शायद आप किसी और को ढूँढ रहे हैं।
मैं ऐसे लोगों को नहीं जानती जो ऐसी गाड़ी चलाते हों।”
— “नहीं माँजी…
आप ही हैं।
जब मैं सिर्फ़ 8 साल का था,
आपने मेरी जान बचाई थी।”
सीता देवी भौंहें सिकोड़ती हैं।
ज़िंदगी में इतने चेहरे…
इतनी रातें…
इतनी यादें…
— “क्या हम अंदर बात कर सकते हैं?”
युवक पूछता है,
पड़ोसियों की ओर देखते हुए
जो खिड़कियों से झाँकने लगे हैं।
अंदर का दृश्य
कमरा सादा है।
पुराने लेकिन साफ़ फर्नीचर।
दीवारों पर परिवार की तस्वीरें।
और ताज़ी बनी चाय की खुशबू।
— “सीता देवी,”
युवक सोफ़े के किनारे बैठते हुए कहता है,
“दिसंबर की एक बारिश भरी रात…
आप शहर के एक छोटे ढाबे में काम कर रही थीं।
तभी दो बच्चे खिड़की पर आए थे…”
सीता देवी की आँखें फैल जाती हैं।
एक धुँधली-सी तस्वीर
उसके दिमाग़ में बनने लगती है।
— “वे भूखे थे…
बारिश में भीगे हुए…”
युवक बोलता रहता है।
— “हे भगवान…”
सीता देवी फुसफुसाती है,
छाती पर हाथ रखकर।
— “मैं ही हूँ, माँजी…
अमित,”
युवक रोते हुए कहता है।
“और मैं आपको धन्यवाद देने आया हूँ
कि आपने मेरी और मेरी बहन की ज़िंदगी बदल दी।”
17 साल पहले – मुंबई, सेंट्रल इलाक़ा
15 दिसंबर, शुक्रवार की रात।
क्रिसमस का मौसम।
छोटा-सा ढाबा ग्राहकों से भरा हुआ।
सीता देवी, तब 35 साल की,
पिछले 5 साल से वहाँ काम कर रही थीं।
हर ग्राहक की पसंद जानती थीं।
रात 9 बजे
भयानक तूफ़ानी बारिश शुरू होती है।
सड़कें नदियों में बदल जाती हैं।
तभी
ढाबे की बड़ी शीशे वाली खिड़की पर
दो छोटे बच्चे दिखाई देते हैं।
बड़ा बच्चा—
फटी हुई टी-शर्ट पहने,
बहुत दुबला।
छोटी बच्ची—
उसे कसकर पकड़े हुए।
दोनों पूरी तरह भीगे हुए।
वे अंदर बैठे लोगों को
गरम खाना खाते हुए देखते हैं।
कुछ ग्राहक नज़रें फेर लेते हैं।
सीता देवी रसोई से यह सब देखती हैं।
उनकी आँखें बच्चों पर टिक जाती हैं।
बड़ा बच्चा
काँच पर उँगलियों से इशारा करता है—
खाने का।
ढाबे का मालिक
रघु सेठ,
55 साल का गुस्सैल आदमी,
यह देख लेता है।
— “सीता!
उन्हें यहाँ से भगाओ!
ये भिखारी मेरे ग्राहकों को डरा रहे हैं!”
— “सेठ जी…
ये सिर्फ़ बच्चे हैं,
बारिश से बच रहे हैं…”
— “मुझे कुछ नहीं सुनना!
या तो वे जाएँगे
या तुम!”
सीता देवी का दिल काँप उठता है।
उन्हें यह नौकरी चाहिए।
उनकी बेटी पूजा घर पर बीमार है।
लेकिन बच्चों की हालत…
उनकी आत्मा को झकझोर देती है।
एक पल में
वह फ़ैसला कर लेती हैं।
वह आदेश तोड़कर
सीधे बाहर जाती हैं।
— “आओ बेटा,”
वह झुककर कहती हैं।
“तुम्हारा नाम?”
— “अमित,”
लड़का फुसफुसाता है।
“और ये मेरी बहन…
सिया।”
वही एक फ़ैसला… जिसने सब बदल दिया
सीता देवी उन्हें रसोई में ले जाती हैं।
जल्दी-जल्दी
गरम खाना परोसती हैं।
अमित पहले
अपनी बहन को खिलाता है।
खुद बाद में।
— “माँ-पापा?”
सीता देवी पूछती हैं।
— “तीन महीने पहले…
स्वर्ग चले गए,”
अमित कहता है।
तभी
रघु सेठ आ धमकता है।
— “तुम बर्ख़ास्त हो!”
सीता देवी
शांतिपूर्वक एप्रन उतारती हैं।
— “अगर हज़ार बार चुनना पड़े,
तो भी
मैं इन बच्चों को ही चुनूँगी।”
बाक़ी कर्मचारी भी
नौकरी छोड़ देते हैं।
वर्तमान में लौटते हुए
अमित की आँखों से आँसू बह रहे हैं।
— “माँजी…
आपके साथ बिताए वो तीन साल
हमारी ज़िंदगी के सबसे ख़ुश साल थे।”
वह मोबाइल पर तस्वीरें दिखाता है।
सिया — अब डॉक्टर।
अमित — अब उद्योगपति।
— “आज मैं यहाँ
सिर्फ़ धन्यवाद देने नहीं आया।
मैं वादा निभाने आया हूँ।”
उन्होंने
“सीता देवी फाउंडेशन” बनाई।
महिलाओं और अनाथ बच्चों के लिए।
— “और हम चाहते हैं
कि आप इसकी डायरेक्टर बनें।”
सीता देवी
काँपते हाथों से बैठ जाती हैं।
— “ये सब…
उस एक प्लेट खाने की वजह से?”
अमित घुटनों पर बैठ जाता है।
— “नहीं माँजी…
इसलिए क्योंकि आपने
हमें सिखाया
कि अँधेरे में भी
रोशनी बनना चुना जा सकता है।”
छह महीने बाद,
सीता देवी केंद्र
धारावी के बीचों-बीच
एक जीवंत सच्चाई बन चुका था।
सुबह-सुबह
मज़दूर माँएँ
अपने बच्चों को
केंद्र की मुफ़्त डे-केयर में छोड़कर
काम पर जाती थीं।
दोपहर में
सामाजिक रेस्टोरेंट
गरम और पौष्टिक भोजन से भर जाता था—
ऐसे लोग खाना खा रहे थे
जो कभी सिर्फ़ खिड़की के बाहर से
झाँककर देखा करते थे।
और ऊपर के हिस्से में,
ऐसे बच्चे
जो कभी अमित और सिया जैसे थे,
अस्थायी घर पाते थे—
जहाँ उन्हें डर नहीं,
सिर्फ़ सुरक्षा मिलती थी।
सीता देवी,
अब केंद्र की निदेशक,
गलियारों में चलते हुए
हर चेहरे को पहचानती थीं।
वह जानती थीं—
कौन बच्चा रात को डरकर उठता है,
किस माँ को काम से निकाल दिया गया है,
किसे बस किसी से बात करने की ज़रूरत है।
मुख्य दीवार पर
एक बड़ी तस्वीर टँगी थी—
एक बरसाती रात।
एक महिला।
और दो भीगे हुए बच्चे।
तस्वीर के नीचे
एक सुनहरी पट्टिका लगी थी:
“दयालुता कभी खोती नहीं।
वह समय के साथ बढ़ती है
और पीढ़ियों के लिए
आशा बन जाती है।”
हर दिन
लोग उस तस्वीर के सामने रुकते थे—
अकेली माँएँ,
दादा-दादी,
नौजवान।
सब पढ़ते थे।
और चुपचाप
आगे बढ़ जाते थे—
थोड़ा हल्का दिल लेकर।
अमित और सिया
हर हफ़्ते आते थे।
दाता बनकर नहीं—
परिवार बनकर।
क्योंकि उन्होंने सीखा था—
सच्चा प्यार
इसमें नहीं है कि तुम कितना देते हो,
बल्कि इसमें है
कि तुम दूसरों को
देने के लिए कितना प्रेरित करते हो।
एक तूफ़ानी रात में
जो बीज बोया गया था,
वह अब
उम्मीद का जंगल बन चुका था—
और वह जंगल
तब भी बढ़ता रहेगा
जब हम सब
इस दुनिया से चले जाएँगे।
