भारत के पश्चिम बंगाल राज्य में नदी के किनारे बसे एक छोटे से गाँव में, जुड़वाँ बहनें अंजलि और पूजा अपनी सादगी, मधुर सुंदरता और भले स्वभाव के लिए पूरे इलाके में जानी जाती थीं। दोनों की उम्र 50 वर्ष थी। वे पहले एक-एक विवाह कर चुकी थीं, लेकिन दुर्भाग्यवश उन्हें संतान का सुख नहीं मिला था। उनका जीवन बहुत साधारण था—नदी किनारे बनी एक झोपड़ी में रहकर वे साथ-साथ सब्ज़ियाँ उगातीं और मछलियाँ पालकर गुज़ारा करती थीं।

एक दिन, राजीव मल्होत्रा—इलाके का एक बड़ा ज़मींदार, जिसके पास दर्जनों हेक्टेयर ज़मीन और मछली पकड़ने वाली नावों का बड़ा बेड़ा था—अचानक दोनों बहनों से शादी का प्रस्ताव लेकर आया। राजीव कई वर्षों से विधुर था। उसके पास अपार धन था, लेकिन कोई वारिस नहीं था, इसलिए वह एक ऐसा विवाह चाहता था जिससे उसे पुत्र मिल सके जो उसकी संपत्ति संभाल सके।
लेकिन अंजलि और पूजा में से किसी एक को चुन न पाने के कारण उसने एक अजीब शर्त रखी: दोनों बहनें उसकी पत्नियाँ बनेंगी, और वह उनके साथ रहने के दिनों को बराबरी से बाँटेगा। अंजलि को हफ्ते में चार दिन, और पूजा को तीन दिन मिलेंगे।
शुरू में दोनों बहनें हिचकिचाईं, लेकिन गरीबी भरे जीवन और हालात बदलने की उम्मीद ने उन्हें हाँ कहने पर मजबूर कर दिया।
साधारण लेकिन पूरे गाँव में चर्चा का विषय बने विवाह के बाद, दोनों बहनें राजीव के बड़े घर में रहने लगीं। बाहर से वे आपसी सौहार्द बनाए रखती थीं, लेकिन भीतर ही भीतर अंजलि और पूजा के बीच एक मौन प्रतिस्पर्धा चल रही थी। दोनों ही जल्दी से जल्दी संतान चाहती थीं, क्योंकि राजीव ने साफ़ कहा था कि जो पहले पुत्र को जन्म देगी, उसे अधिक महत्व मिलेगा, यहाँ तक कि संपत्ति का बड़ा हिस्सा भी उसी के नाम किया जा सकता है।
चार दिन पति के साथ रहने के कारण अंजलि को हमेशा लगता था कि उसके पास बढ़त है। वहीं पूजा, भले ही उसे केवल तीन दिन मिलते हों, चुपचाप आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों और पारंपरिक उपचारों का सहारा लेने लगी ताकि गर्भधारण की संभावना बढ़ सके।
शुरुआती दिन इसी अदृश्य तनाव में बीतते गए। अंजलि और पूजा बारी-बारी से अपने पति की देखभाल करतीं, एक आदर्श पत्नी की भूमिका निभाने की पूरी कोशिश करतीं। लेकिन सातवें दिन, जिस दिन दोनों बहनें एक साथ घर पर रहती थीं और परिवार के साथ भोजन करती थीं, एक भयानक घटना घटी जिसने दोनों को भीतर तक हिला दिया।
उस सुबह, जब अंजलि और पूजा रसोई में दोपहर का भोजन तैयार कर रही थीं, उन्हें राजीव के शयनकक्ष से अजीब-सी आवाज़ें सुनाई दीं। यह सोचकर कि कहीं उसे कुछ हो तो नहीं गया, दोनों घबराकर ऊपर भागीं। लेकिन जैसे ही उन्होंने दरवाज़ा खोला, सामने का दृश्य देखकर वे सन्न रह गईं।
दरवाज़ा खुलते ही अंजलि और पूजा की साँस जैसे थम गई। कमरे के भीतर जो दृश्य था, उसने उनके पैरों तले ज़मीन खिसका दी। बिस्तर पर राजीव मल्होत्रा अकेला नहीं था। उसके पास एक औरत बैठी थी—सफ़ेद साड़ी में, सिर ढका हुआ, चेहरा आधा झुका हुआ। कुछ पल के लिए दोनों बहनों को लगा कि उनकी आँखें धोखा खा रही हैं। लेकिन अगले ही क्षण पूजा के मुँह से अनायास निकल पड़ा, “ये… ये कौन है?”
औरत ने धीरे-धीरे सिर उठाया। उसका चेहरा सामने आते ही अंजलि चीख़ पड़ी। वह और कोई नहीं, बल्कि उनकी ही जैसी शक्ल-सूरत वाली एक और औरत थी। वही आँखें, वही नाक, वही होंठ—मानो आईने में दूसरा प्रतिबिंब। पूजा लड़खड़ाकर दीवार का सहारा लेने लगी। “ये मज़ाक है क्या?” उसने काँपती आवाज़ में कहा, “या हम सपना देख रहे हैं?”
राजीव उठकर खड़ा हुआ। उसके चेहरे पर घबराहट नहीं थी, बल्कि एक अजीब-सी थकान और वर्षों से दबा हुआ बोझ साफ़ झलक रहा था। उसने भारी स्वर में कहा, “अब छुपाने का कोई मतलब नहीं है।” वह उस औरत की ओर मुड़ा। “रीना… अब सब कुछ सच बता दो।”
रीना की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने साड़ी का पल्लू ठीक किया और धीमी आवाज़ में बोली, “मैं तुम दोनों की… छोटी बहन हूँ।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
“बहन?” अंजलि ने हँसने की कोशिश की, लेकिन हँसी गले में ही अटक गई। “हम तो सिर्फ़ दो बहनें हैं। हमारे माता-पिता…”
रीना ने बीच में ही कहा, “नहीं, अंजलि दीदी। सच यह है कि हम तीन बहनें थीं। लेकिन मुझे तुमसे अलग कर दिया गया था।”
पूजा का सिर घूमने लगा। उसे बचपन की धुँधली यादें कौंध गईं—एक छोटा-सा हाथ जो कभी उसकी उँगली पकड़ता था, माँ की फुसफुसाती आवाज़, और फिर अचानक वह यादें जैसे मिटा दी गई हों। “ये झूठ है,” पूजा बुदबुदाई, “अगर ऐसा था तो हमें कभी बताया क्यों नहीं गया?”
रीना ने गहरी साँस ली। “क्योंकि हमारी माँ बहुत गरीब थीं। तीन बेटियों को पालना उनके लिए असंभव था। जब मैं पैदा हुई, तो एक अमीर परिवार ने मुझे गोद लेने की पेशकश की। उन्होंने वादा किया था कि मुझे अच्छा जीवन मिलेगा। माँ ने भारी दिल से मुझे दे दिया।”
अंजलि की आँखें भर आईं। “तो तुम… हमें छोड़कर चली गई थीं?”
“नहीं,” रीना ने सिर हिलाया, “मुझे ले जाया गया था।”
राजीव खाँसकर बोला, “और अब मेरी बात सुनो।” दोनों बहनों की नज़रें उसकी ओर घूम गईं—अब तक जिस आदमी को वे पति मानती थीं, वह अचानक उन्हें किसी अजनबी से भी ज़्यादा रहस्यमय लगने लगा। “मैं रीना के दत्तक परिवार को जानता था। वे लोग कर्ज़ में डूबे हुए थे। रीना की ज़िंदगी वहाँ भी सुखद नहीं थी। वह पढ़ी-लिखी थी, लेकिन अपनी पहचान से वंचित थी।”
पूजा ने तीखे स्वर में पूछा, “तो आप उसे यहाँ क्यों लाए?”
राजीव ने आँखें झुका लीं। “क्योंकि मैं भी एक सच छुपा रहा था। मुझे डॉक्टरों ने सालों पहले बता दिया था कि… मैं पिता नहीं बन सकता।”
यह सुनते ही अंजलि जैसे पत्थर की हो गई। “क्या?”
राजीव ने सिर हिलाया। “हाँ। यह सच है। मैं जानता था कि समाज में यह बात फैल गई तो मेरी इज़्ज़त, मेरा सब कुछ खत्म हो जाएगा। इसलिए मैंने संतान की चाह का नाटक किया। और तुम दोनों से विवाह…”
पूजा गुस्से से काँप उठी। “तो हमारी पूरी ज़िंदगी एक नाटक थी?”
“नहीं,” राजीव ने जल्दी से कहा, “नाटक नहीं। मैं तुम्हें कभी धोखा नहीं देना चाहता था। लेकिन जब तुम दोनों आईं, और फिर मैंने रीना को ढूँढ निकाला—मुझे लगा शायद… शायद कोई रास्ता निकले।”
अंजलि की आवाज़ टूट गई। “कौन-सा रास्ता?”
राजीव ने गहरी साँस ली। “रीना गर्भवती है।”
कमरे में फिर सन्नाटा। पूजा का चेहरा पीला पड़ गया। “और बच्चे का पिता?”
रीना ने सिर झुका लिया। “मेरे पति का देहांत हो चुका है,” उसने धीरे से कहा। “वह बच्चा उसकी निशानी है। मैं अकेली थी। राजीव जी ने मुझे सहारा दिया। उन्होंने कहा कि अगर मैं यहाँ रहूँ, तो बच्चे को एक सुरक्षित भविष्य मिलेगा।”
अंजलि फूट-फूटकर रो पड़ी। “तो हम दोनों… बस इस्तेमाल की गईं?”
राजीव ने आगे बढ़कर कहा, “नहीं। मैंने कभी तुम्हें नीचा नहीं समझा। सच यह है कि मैं तुम दोनों का सम्मान करता हूँ। लेकिन समाज को एक वारिस चाहिए था, और मुझे भी अपने अकेलेपन से डर लगता था।”
पूजा ने कड़वी हँसी हँसी। “तो आपने हमें आपस में लड़वाया, बेटे के नाम पर?”
राजीव चुप रहा। वही चुप्पी उसकी सबसे बड़ी स्वीकारोक्ति थी।
कई घंटों तक कोई कुछ नहीं बोला। शाम ढल गई। कमरे में दिया जल रहा था। अंत में अंजलि ने आँसू पोंछते हुए कहा, “हमने ज़िंदगी भर दूसरों के फैसलों का बोझ उठाया है। पहले माँ का, फिर समाज का, और अब आपका।”
पूजा ने उसका हाथ थामा। “लेकिन अब फैसला हमारा होगा।”
रीना घुटनों के बल बैठ गई। “अगर मेरी वजह से तुम दोनों को दर्द हुआ है, तो मुझे माफ़ कर दो। मैं यहाँ रहने की हक़दार नहीं हूँ।”
अंजलि ने उसे उठाया। “नहीं। दोष तुम्हारा नहीं है। हम सब किसी न किसी तरह से पीड़ित हैं।”
राजीव की आँखों में नमी आ गई। “अगर तुम चाहो, तो मैं सब कुछ सार्वजनिक कर दूँ। संपत्ति तुम्हारे नाम कर दूँ। मैं…”
पूजा ने उसे रोक दिया। “हमें दया नहीं चाहिए। हमें सच्चाई चाहिए—और सम्मान।”
उस रात तीनों औरतें पहली बार एक साथ बैठीं—पत्नी, बहन और एक अनकहे रिश्ते में बँधी हुई। बाहर नदी बह रही थी, जैसे वर्षों से दबे राज़ अब बहकर बाहर आ रहे हों।
लेकिन यह अंत नहीं था। यह तो बस शुरुआत थी—क्योंकि अगली सुबह एक और सच सामने आने वाला था, जो सब कुछ फिर से बदल देने वाला था…
अगली सुबह हवेली में अजीब-सी ख़ामोशी थी। जैसे दीवारें भी रात के खुलासों से थकी हुई हों। अंजलि और पूजा लगभग पूरी रात जागती रहीं। कभी रोतीं, कभी चुपचाप एक-दूसरे का हाथ थामे बैठी रहतीं। पहली बार उन्हें एहसास हुआ कि वे जीवन भर किसी और की शर्तों पर जीती आई थीं।
सुबह की पहली किरण के साथ ही हवेली के मुख्य द्वार पर दस्तक हुई।
“कौन है?” पूजा ने आवाज़ दी।
दरवाज़ा खुलते ही सामने एक अधेड़ उम्र का आदमी खड़ा था—सादा कपड़े, हाथ में फाइल, आँखों में गंभीरता।
“मैं वकील शशांक मेहता हूँ,” उसने कहा, “राजीव मल्होत्रा जी ने मुझे बुलाया है।”
यह नाम सुनते ही अंजलि और पूजा दोनों चौंक गईं।
“उन्होंने… आपको क्यों बुलाया?” अंजलि ने पूछा।
वकील ने गहरी साँस ली। “क्योंकि आज वह सच सामने आने वाला है, जिसे उन्होंने वर्षों तक छुपाए रखा।”
कुछ ही देर में राजीव भी कमरे में आया। उसका चेहरा पीला था, चाल लड़खड़ा रही थी। वह कुर्सी पर बैठते हुए बोला, “मैं जानता हूँ, अब मुझे कोई हक़ नहीं बचा। लेकिन जाने से पहले, मैं सब ठीक करना चाहता हूँ।”
“जाने से पहले?” पूजा ने तीखे स्वर में पूछा।
राजीव ने कड़वी मुस्कान के साथ कहा, “हाँ। मुझे कैंसर है। आख़िरी स्टेज। शायद कुछ महीने… या उससे भी कम।”
यह सुनकर अंजलि का दिल बैठ गया। गुस्सा, धोखा, दर्द—सब कुछ अचानक किसी अजीब करुणा में बदल गया।
“आपने यह भी हमसे छुपाया,” उसने धीमे से कहा।
राजीव ने सिर झुका लिया। “क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि तुम मुझे मजबूरी में माफ़ करो।”
वकील शशांक ने फाइल खोली। “राजीव जी ने अपनी वसीयत तैयार कर ली है।”
पूजा चौंकी। “और उसमें क्या लिखा है?”
वकील ने पढ़ना शुरू किया।
“मेरी सारी संपत्ति—ज़मीन, हवेली, व्यवसाय—तीन बराबर हिस्सों में बाँटी जाएगी।”
अंजलि और पूजा ने एक-दूसरे को देखा।
“पहला हिस्सा—अंजलि देवी के नाम।”
“दूसरा हिस्सा—पूजा देवी के नाम।”
“और तीसरा हिस्सा—रीना और उसके होने वाले बच्चे के नाम, एक ट्रस्ट के ज़रिए।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
पूजा ने धीरे से कहा, “तो आपने आखिरकार हमें बराबरी दी।”
राजीव की आँखों में आँसू आ गए। “मैंने देर कर दी… लेकिन अन्याय नहीं करना चाहता था।”
अचानक अंजलि उठ खड़ी हुई। “नहीं।”
सब उसकी ओर देखने लगे।
“हमें यह संपत्ति नहीं चाहिए,” उसने दृढ़ स्वर में कहा।
“क्या?” राजीव और वकील दोनों एक साथ बोल पड़े।
पूजा भी उठी। “हमने आधी ज़िंदगी पैसों की लालसा में नहीं, बल्कि सम्मान की कमी में गंवाई है। अब हम किसी की दया या अपराधबोध पर अमीर नहीं बनना चाहते।”
रीना घबरा गई। “दीदी, आप ऐसा मत कीजिए। यह आपका हक़ है।”
अंजलि ने उसका हाथ थामा। “हम अपना हक़ चुन रहे हैं, रीना। और वह ज़मीन या हवेली नहीं है।”
अंजलि ने राजीव की ओर देखा। “हम गाँव लौटना चाहते हैं। वही नदी, वही सादा ज़िंदगी। लेकिन एक शर्त पर।”
“कौन-सी शर्त?” राजीव ने काँपती आवाज़ में पूछा।
“आप अपनी सारी संपत्ति बेचकर एक महिला आश्रम और निःसंतान दंपतियों के लिए सहायता केंद्र बनवाएँगे,” पूजा ने कहा।
“और रीना,” अंजलि मुस्कुराई, “वह उस केंद्र की मालिक नहीं, बल्कि संरक्षिका होगी—सम्मान के साथ।”
रीना की आँखों से आँसू बहने लगे। “मैं अकेली नहीं रहूँगी?”
पूजा ने उसे गले लगा लिया। “अब नहीं। अब हम तीनों बहनें हैं—सच में।”
राजीव फूट-फूटकर रो पड़ा। “शायद पहली बार… मैं सही काम कर रहा हूँ।”
कुछ महीनों बाद हवेली खाली हो गई। संपत्ति बेच दी गई। नदी किनारे एक नया आश्रम बन रहा था—जहाँ औरतों को सहारा मिलेगा, बच्चों को पहचान मिलेगी, और किसी को झूठे वादों में नहीं जीना पड़ेगा।
राजीव का देहांत शांति से हुआ। जाते-जाते उसने सिर्फ़ एक वाक्य कहा:
“मैं अमीर था… लेकिन आज जाकर इंसान बना हूँ।”
आज अंजलि और पूजा फिर उसी नदी किनारे रहती हैं—लेकिन अब झोपड़ी में नहीं। उनके चेहरे पर सुकून है। रीना का बच्चा आँगन में खेलता है और उन्हें “माँ” नहीं, “मौसी” कहकर बुलाता है।
और गाँव वाले आज भी कहते हैं—
“कभी-कभी सबसे बड़ा वारिस बेटा नहीं होता…
बल्कि वह सच्चाई होती है, जिसे स्वीकार करने की हिम्मत बहुत कम लोग रखते हैं।”
— समाप्त —
