मेरी माँ ने दहेज में जो दो सोने के कंगन दिए थे, वे अजीब तरह से गायब हो गए, तो मैंने अपने कमरे में एक हिडन कैमरा लगवाया—यह सोचकर कि मेरे पास सबूत होगा कि मेरी सास ने मेरे गहने चुरा लिए हैं। लेकिन मुझे क्या पता था… कैमरे ने जो दिखाया, वह पिछले 10 सालों में मेरे पति की घिनौनी हरकतों का सच था।../HXL

मेरी माँ ने दहेज में जो दो सोने के कंगन दिए थे, वे अजीब तरह से गायब हो गए, तो मैंने अपने कमरे में एक हिडन कैमरा लगवाया—यह सोचकर कि मेरे पास सबूत होगा कि मेरी सास ने मेरे गहने चुरा लिए हैं। लेकिन मुझे क्या पता था… कैमरे ने जो दिखाया, वह पिछले 10 सालों में मेरे पति की घिनौनी हरकतों का सच था।

मेरा नाम अनीता है, मैं 30 साल की हूँ। मेरी शादी को छह साल हो गए हैं। हम दिल्ली में एक तीन मंज़िला अपार्टमेंट में साथ रहते हैं। मेरी सास, शकुंतला देवी, को हर चीज़ में दखल देने की आदत है। वह अक्सर मेरे कमरे में आती हैं, हमारी अलमारियां और वार्डरोब खोलती हैं, और अंदर देखती हैं, और कहती हैं:

“मैं बस यह देख रही हूँ कि कुछ गायब तो नहीं है।”

मुझे उन पर यकीन नहीं हुआ—खासकर जब मेरी माँ ने जो दो सोने के कंगन दिए थे, वे अजीब तरह से गायब हो गए। जब ​​मैंने उनसे पूछा, तो वह हँसीं और बोलीं:

“इस घर में कोई चोरी नहीं करता!”

मुझे शक हुआ… बहुत शक हुआ।

तो, मैंने एक छोटा कैमरा वैनिटी मिरर के पीछे छिपा दिया—ठीक अलमारी के सामने—और दूसरा कैमरा—हमारे बेडसाइड टेबल के सामने। मैंने कैमरों के मोशन डिटेक्शन अलर्ट भी चालू कर दिए।

तीन दिन बीत गए।

मैं अपने ऑफिस में बैठी थी कि अचानक, मेरे सेल फोन पर कई नोटिफिकेशन आने लगे—
मोशन डिटेक्ट हुआ।

मैंने तुरंत वीडियो खोला और देखा।

जैसा कि मुझे उम्मीद थी—
मेरी सास, शकुंतला देवी, कमरे में आईं। उन्होंने इधर-उधर देखा, फिर सीधे अलमारी के पास गईं और हर दराज में कुछ ढूंढने लगीं।

मैंने धीरे से कहा,

“ओह… अब मैंने उन्हें रंगे हाथों पकड़ लिया है।”

लेकिन…
वीडियो शुरू होने के ठीक 20 सेकंड बाद, मेरी रीढ़ में एक सिहरन दौड़ गई।

स्क्रीन पर जो इंसान था वह अब मेरी सास नहीं थीं…
बल्कि मेरे पति—रैप्टर थे।

राजेश धीरे से कमरे में आए, एक पल के लिए इधर-उधर देखा, फिर दरवाज़ा बंद कर दिया।

मुझे लगा कि वह शायद ऑफिस से जल्दी घर आ जाएगा…
लेकिन अगला सीन ऐसा लगा जैसे मेरे सीने पर कोई भारी पत्थर गिर गया हो।

वह मेरी सास के पास गया और कुछ फुसफुसाया। मेरी सास ने सिर हिलाया…उनके होठों पर एक अजीब सी मुस्कान आ गई…
और इसके बाद जो हुआ वह कैमरे में कैद हो गया, जिससे मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगा—

मैंने फोन को दोनों हाथों से पकड़ रखा था, लेकिन उंगलियाँ ठंडी पड़ चुकी थीं। स्क्रीन पर राजेश और मेरी सास—या जिसे मैं “मेरी सास” समझ रही थी—एक ही फ्रेम में थे। राजेश ने कमरे का दरवाज़ा अंदर से कुंडी लगा दी, और जैसे ही उसने खिड़की के परदे आधे खींचे, मेरी सांस अटक गई।

वह झुका, मेरी “सास” के कान के पास कुछ फुसफुसाया। और सामने वाली औरत… हँसी। ऐसी हँसी जो मैं शाकुंतला देवी की कभी नहीं सुन पाई थी—उनकी हँसी हमेशा तीखी, ताना मारने वाली होती थी। यह हँसी… नरम थी, और किसी अजनबी की तरह बेपरवाह।

मैंने वीडियो रोक दिया। फिर चलाया। फिर रोका। जैसे मैं अपने दिमाग को यकीन दिलाना चाहती हूँ कि ये गलतफहमी है। मगर अगले ही पल, कैमरे ने जो पकड़ा, उसने मेरे भीतर कुछ तोड़ दिया।

राजेश ने अलमारी की सबसे ऊपर वाली दराज़ खोली—वही दराज़ जहाँ मैं अपने कंगन रखती थी। उसने बहुत सधे हाथों से कपड़ों को हटाया, और एक छोटे कपड़े के थैले में कुछ डाल दिया। फिर उसने बेडसाइड टेबल की तरफ देखा, जैसे वह जानता हो कि वहाँ क्या रखा है—मेरे कुछ दस्तावेज़, मेरे बैंक के काग़ज़, और वो छोटी डायरी जिसमें मैं अपने खर्चे लिखती थी।

फिर वह “सास” की तरफ मुड़ा। दोनों के बीच कुछ हुआ—लेकिन कैमरे के एंगल से ज्यादा कुछ साफ़ नहीं था। बस इतना दिखा कि वे दोनों मिलकर कुछ प्लान कर रहे हैं। राजेश ने मोबाइल निकाला, स्क्रीन दिखायी, और दूसरी औरत ने तुरंत सिर हिला दिया। जैसे सब तयशुदा हो।

मेरे अंदर एक ही सवाल गूंज रहा था:
“सास मेरे साथ ऐसा क्यों करेंगी?”

लेकिन उससे भी बड़ा सवाल—
“यह औरत… क्या सच में मेरी सास है?”

मैंने फटाफट दूसरा कैमरा खोला—वो जो बेडसाइड टेबल के सामने था। वहाँ भी वही दृश्य अलग एंगल से था। और उसी एंगल ने मुझे पहली बार वह चीज़ दिखा दी, जो मेरे शक को यकीन में बदल गई।

मेरी “सास” के हाथ में कंगन नहीं थे। उनकी कलाई पर वो पुरानी रेखाएँ नहीं थीं जो शाकुंतला देवी की कलाई पर हैं—उनकी उम्र के निशान, हल्के भूरे धब्बे। यहाँ कलाई चिकनी थी। हाथ जवान था। और उंगलियों में एक चमकदार अंगूठी… जिसे मैंने पहले कभी नहीं देखा।

मैंने झटके से अपने चेहरे पर हाथ रखा।
ये शाकुंतला देवी नहीं हैं।

मेरी सांस तेज़ हो गई। मैं ऑफिस में थी—मेरी कुर्सी पर, कंप्यूटर के सामने, लेकिन मेरी दुनिया उस स्क्रीन के अंदर सिमट गई थी। मैंने तुरंत घर की सीढ़ियों के पास लगे कॉमन कैमरे का लाइव एक्सेस खोला—जिसका पासवर्ड मैंने पिछले महीने बिल पेमेंट के बहाने रख लिया था।

स्क्रीन पर दिखा:
एक औरत साड़ी में, सिर पर पल्लू, वही चाल-ढाल, वही झुका हुआ कंधा… बिल्कुल मेरी सास जैसी।
लेकिन जब वह मुड़ी—बहुत हल्का सा—तो उसकी गर्दन के पीछे बालों की लाइन साफ़ दिखी। मेरी सास के बाल हमेशा पूरी तरह सफेद हैं, और वो बालों को कसकर जूड़ा बनाती हैं। इस औरत के बाल… काले थे। बस ऊपर से सफेद पाउडर या स्प्रे जैसा कुछ।

मेरे पेट में मरोड़ उठी।
राजेश की कोई औरत… मेरी सास बनकर हमारे घर में?

और तभी एक तीसरा नोटिफिकेशन आया: “मोशन डिटेक्टेड – LIVING ROOM”

मैंने कैमरा बदला। लिविंग रूम में मेरी असली सास बैठी थीं—टीवी के सामने, ऊनी शॉल ओढ़े, जैसे कुछ हुआ ही नहीं। उनके सामने चाय का कप था। मतलब… वो घर पर थीं।
फिर “मेरे कमरे में आई सास” कौन थी?

मैंने अपने बॉस से कहा, “मुझे इमरजेंसी है, अभी जाना होगा।”
मुझे याद नहीं, मैंने सही से कुछ कहा भी या नहीं। मैं बस उठी, बैग पकड़ा, और बाहर निकल गई।

टैक्सी में बैठते ही मैंने अपने वकील दोस्त—नेहा—को कॉल किया। नेहा कॉलेज से मेरी सबसे भरोसेमंद दोस्त थी, अब दिल्ली में फैमिली लॉ देखती थी।

“नेहा… मेरे घर में… मेरे कमरे में… राजेश और एक औरत… वो मेरी सास जैसी थी, लेकिन सास तो लिविंग रूम में बैठी है… और मेरे कंगन—”

नेहा ने एक सेकंड भी नहीं लगाया।
“अनीता, अब तुम घर जा रही हो?”
“हाँ।”
“ठीक है। अकेली मत जाना। मैं और एक पुलिस जानने वाला—हम भी निकल रहे हैं। तुम बस वहाँ पहुँचकर कोई हंगामा मत करना। और सबसे जरूरी: वीडियो डाउनलोड कर लो। बैकअप बना लो। क्लाउड में डालो।”

मेरे हाथ काँप रहे थे, लेकिन मैंने उसी समय वीडियो सेव किया—तीनों—और गूगल ड्राइव पर अपलोड कर दिए। फिर मैंने राजेश का नंबर देखा। कॉल नहीं किया। अगर मैं करती, तो वह सतर्क हो जाता। और मुझे सबूत चाहिए था—सिर्फ अपने कंगन के लिए नहीं—अपने सच के लिए।

जब टैक्सी हमारे अपार्टमेंट के नीचे रुकी, मैं ऊपर भागी नहीं। मैं धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ी। हर कदम पर मुझे ऐसा लग रहा था कि मैं किसी ऐसे दरवाज़े के पास जा रही हूँ, जिसके पीछे मेरी ज़िंदगी की परतें खुलने वाली हैं।

तीसरी मंज़िल पर पहुँचते ही मुझे अपने कमरे के पास धीमी आवाज़ें सुनाई दीं। मैं दीवार से लगकर खड़ी हो गई। दिल इतनी जोर से धड़क रहा था कि मुझे डर था आवाज़ बाहर सुनाई दे जाएगी।

दरवाज़ा आधा खुला था—जैसे किसी ने जल्दबाज़ी में बंद नहीं किया। मैं एक छोटे से गैप से अंदर देख सकती थी।

राजेश वहाँ था। और वही “सास”—अब पल्लू थोड़ा पीछे खिसक चुका था। एक पल के लिए उसका चेहरा मुझे दिखा—और मेरे शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई।

मैंने उसे पहले देखा था।
हमारी सोसायटी की नीचे वाली बिल्डिंग में रहने वाली—काव्या
तीन-चार महीने पहले लिफ्ट में मिली थी। राजेश ने उसे देखकर कुछ ज़्यादा ही मुस्कुराया था। मैंने तब ध्यान नहीं दिया। मैंने सोचा—“बस एक पड़ोसी।”

लेकिन आज… वह मेरे कमरे में मेरी सास बनकर खड़ी थी।

काव्या ने अलमारी से वही कपड़े का थैला निकाला, और राजेश को दिखाया। राजेश ने सिर हिलाया, फिर बेडसाइड टेबल की दराज़ खोलकर मेरी डायरी निकाली। वह पन्ने पलटने लगा—जैसे वह मेरे बारे में सब पढ़ रहा हो। मेरे खर्चे, मेरे नोट्स, मेरी छोटी-छोटी बातें—सब उसके हाथों में।

मैंने अपने अंदर कुछ टूटते हुए महसूस किया।
ये सिर्फ कंगन नहीं थे।
ये मेरी निजता थी।
मेरा भरोसा था।
मेरी सुरक्षा थी।

और तभी—काव्या ने अचानक कहा, “जल्दी करो। आंटी नीचे हैं। अगर उन्हें शक हो गया तो…”
राजेश ने चिढ़कर कहा, “तुमने कहा था वो मंदिर गई हैं।”
काव्या ने फुसफुसाकर कहा, “वो वापस आ गईं… और तुम्हारी बीवी भी कभी भी आ सकती है।”

मैंने अपना ही नाम सुना, तो मेरे अंदर आग लग गई। मैं दरवाज़े को धक्का देकर अंदर घुस गई।

“मैं आ चुकी हूँ।”

दोनों जैसे पत्थर बन गए। राजेश के हाथ से मेरी डायरी गिर गई। काव्या ने तेजी से पल्लू खींचकर चेहरा ढकने की कोशिश की, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।

मैंने बहुत शांत आवाज़ में कहा, “पल्लू हटाओ, काव्या।”
उसने मेरी तरफ देखा—डर, शर्म, और फिर… एक अजीब सा गुस्सा।

राजेश ने आगे बढ़कर कहा, “अनीता, तुम गलत समझ रही हो—”
मैंने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।
“मैंने सब देखा है, राजेश। कैमरे में।”

उसके चेहरे से रंग उड़ गया। काव्या ने एक कदम पीछे हटकर कहा, “तुमने कैमरा लगाया? अपने ही घर में?”
मैं हँसी—बिल्कुल सूखी, कड़वी।
“हाँ। अपने ही घर में। ताकि पता चले—चोरी कौन करता है।”

इसी समय बाहर से दरवाज़ा खुला और शाकुंतला देवी अंदर आईं—असली शाकुंतला देवी। उनके हाथ में सब्ज़ी का थैला था, और चेहरे पर वही सख्तपन। लेकिन जैसे ही उन्होंने काव्या को साड़ी में देखा, और राजेश को मेरे कमरे में खड़ा देखा, उनका चेहरा बदल गया।

“ये… ये क्या है?” उन्होंने धीमे से पूछा।

काव्या ने झट से कहा, “आंटी… मैं तो बस—”
शाकुंतला देवी ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा।
“तू… तू मेरी साड़ी पहने हुए है?” उनकी आवाज़ काँप गई। “मेरे घर के अंदर… मेरे बहू के कमरे में?”

राजेश ने बीच में कहा, “माँ, आप समझो—”
“चुप!” शाकुंतला देवी पहली बार राजेश पर ऐसे चिल्लाईं कि मैं भी चौंक गई। “तूने… तूने मेरे नाम का सहारा लेकर क्या-क्या किया है?”

अब कमरे में हवा भारी थी।
तीन लोग—तीन सच—और एक कैमरा, जिसने सबको नंगा कर दिया था।

मैंने अपने फोन में सेव वीडियो खोलकर शाकुंतला देवी के सामने रख दिया।
“ये देखिए,” मैंने कहा। “और अगर आप चाहें तो… मैं पुलिस बुला सकती हूँ। अभी।”

शाकुंतला देवी ने वीडियो देखा। पहले कुछ सेकंड… फिर उनका चेहरा पीला पड़ गया। उनकी आँखों में एक अजीब दर्द उभरा—जैसे कोई मां अपने बेटे की असली शक्ल पहली बार देख रही हो।

उन्होंने धीरे से पूछा, “ये कब से चल रहा है, राजेश?”

राजेश ने जवाब नहीं दिया।
काव्या ने हिम्मत करके कहा, “आंटी, ये सब अनीता की वजह से—वो हमेशा शक करती है, हमेशा—”
मैंने उसकी तरफ देखा।
“मेरे कमरे में घुसकर मेरे गहने चुराना… और फिर मुझे ही दोष देना… ये मेरी वजह से?”

काव्या की आँखें तिरछी हो गईं।
“तुम्हें क्या लगता है, तुम बहुत स्मार्ट हो? कैमरा लगाकर…”
मैंने एक कदम आगे बढ़ाया।
“स्मार्ट नहीं। मजबूर। क्योंकि इस घर में मेरी आवाज़ कभी सुनी नहीं गई।”

शाकुंतला देवी ने सब्ज़ी का थैला नीचे रखा। हाथ काँप रहे थे।
“कंगन कहाँ हैं?” उन्होंने काव्या से पूछा।

काव्या ने चुप्पी साध ली।
राजेश ने धीरे से कहा, “अनीता… मैं लौटा दूँगा। बस अभी…”
मैंने कहा, “अभी नहीं। अभी सच।

फिर मैंने वही बात कही, जिसने उस कमरे की दिशा बदल दी:
“और ये सिर्फ कंगन नहीं हैं। ये पिछले… दस साल का सच है, राजेश। क्योंकि कैमरा सिर्फ आज नहीं लगा था। मैंने बैकअप सेट कर दिया था—और तुम्हारी हर हरकत… रिकॉर्ड हो रही थी।”

राजेश का चेहरा जम गया।
“क्या मतलब?”
मैंने कहा, “मतलब—तुम ये पहली बार नहीं कर रहे। तुमने पहले भी… किसी को घर में बुलाया है। और कैमरे ने वो भी पकड़ा है।”

ये सुनते ही शाकुंतला देवी की आँखों में आँसू आ गए।
“राजेश…” उन्होंने कांपती आवाज़ में कहा, “तूने मेरे घर को… मेरे नाम को… मेरी बहू की इज्ज़त को…”

काव्या ने अचानक अपना असली चेहरा दिखाया। उसने पल्लू हटाया और बोली, “हाँ, मैंने किया। क्योंकि तुम दोनों का ये घर… ये आराम… ये सब अनीता के पैसों से चल रहा है, है ना? राजेश बस अपना हिस्सा लेने की कोशिश कर रहा था।”

मैं ठिठक गई।
“मेरे पैसों से?”
काव्या ने ज़हर भरी मुस्कान के साथ कहा, “तुम्हें पता नहीं? तुम्हारे नाम पर जो FD है… जो जॉइंट अकाउंट है… राजेश ने—”

मैंने राजेश की तरफ देखा।
उसकी आँखें झुक गईं।
और उसी झुकी आँखों में मुझे जवाब मिल गया।

शाकुंतला देवी ने एकदम से अपने सिर पर हाथ मारा।
“हे भगवान… मैं समझती रही कि ये बहू खर्चीली है… लेकिन ये तो…”

अब मेरे सामने एक और परत खुल रही थी। कंगन सिर्फ शुरुआत थे। असली चोरी… मेरे जीवन की थी।

नेहा का मैसेज आया: “हम नीचे पहुँच गए हैं। 2 मिनट।”

मैंने गहरी सांस ली।
और बहुत स्थिर आवाज़ में कहा, “अब कोई बहाना नहीं। मैं अभी सबूत पुलिस को दूँगी। और हाँ—मैंने अपने बैंक को भी अलर्ट कर दिया है।”

राजेश घबरा गया।
“नहीं, अनीता, प्लीज़… घर की बात घर में…”
मैंने कहा, “जिस दिन तुमने मेरे कमरे में किसी औरत को मेरी सास बनाकर घुसाया… उस दिन ये घर की बात नहीं रही।”

शाकुंतला देवी ने धीरे से मेरा हाथ पकड़ा। पहली बार उनके हाथ में सख्ती नहीं थी, सिर्फ थकान थी।
“अनीता…” उन्होंने कहा, “आज… अगर मैं तेरे साथ खड़ी न हुई, तो मैं माँ कहलाने लायक नहीं।”

मैंने उनकी तरफ देखा—और पहली बार मुझे लगा, वो भी किसी की साजिश का शिकार थीं। उनके बेटे ने उनके नाम का मुखौटा पहनकर घर में अपराध किया था। और काव्या ने उनकी शक्ल की नकल बनकर मेरे घर में घुसपैठ की थी।

नेहा ऊपर आ गई। उसके साथ एक जान-पहचान वाला कॉन्स्टेबल भी था—सिविल में।

नेहा ने एक नजर में माहौल समझ लिया।
उसने मेरी तरफ देखा: “तुम तैयार हो?”
मैंने सिर हिलाया।
“हाँ। अब मैं डरकर नहीं जीऊँगी।”

काव्या पीछे हटने लगी।
कॉन्स्टेबल ने कहा, “मैडम, आप कहीं नहीं जाएंगी।”
राजेश ने एकदम से गुस्से में कहा, “ये मेरा घर है—”
नेहा ने ठंडे स्वर में कहा, “और ये उसकी जिंदगी है, जिसे तुमने खेल समझ रखा था।”

इसके बाद जो हुआ, वो बहुत शोर-शराबा नहीं था। असली सजा शोर से नहीं—सबूत से होती है। मैंने वीडियो, बैंक स्टेटमेंट्स, और चोरी के सबूत सौंप दिए। काव्या की साड़ी—जो शाकुंतला देवी की थी—भी सबूत बनी। और राजेश का फोन—जिसमें उनके मैसेज थे—भी।

Twist यहीं खत्म नहीं हुआ।

पुलिस ने जब काव्या से सख्ती से पूछताछ की, तो उसने कबूल किया कि ये सब सिर्फ राजेश का प्लान नहीं था
राजेश ने काव्या को इसलिए चुना क्योंकि उसकी बॉडी लैंग्वेज, कद-काठी, और आवाज़—शाकुंतला देवी से मिलती-जुलती थी। उसने उसे साड़ी पहनाकर, सिर पर पल्लू डालकर, और बालों पर सफेद स्प्रे लगाकर “माँ” बना दिया—ताकि अगर कैमरे में दिख भी जाए, तो दोष माँ पर आए।

यानी…
मैं जिस सास को चोर समझ रही थी, वो असल में ढाल थी।
और असली चोर… मेरे पति और उसकी प्रेमिका थे।

उस रात के बाद, मैं शाकुंतला देवी के साथ बैठी। उन्होंने पहली बार मेरे सामने रोते हुए कहा,
“मैंने तुझे ताने दिए… शक किया… लेकिन मेरा बेटा… मेरे नाम की आड़ में…”

मैंने उनके सामने एक गिलास पानी रखा।
“अब बस एक बात चाहिए, माँजी,” मैंने कहा। “सच के साथ खड़े रहिए। बाकी मैं संभाल लूँगी।”

अगले हफ्ते, मैंने अपना अलग अकाउंट कर लिया। अपने काग़ज़ सुरक्षित किए। और कोर्ट में एक आवेदन दिया—भरोसे के टूटने का, आर्थिक धोखाधड़ी का, और मानसिक उत्पीड़न का।

शाकुंतला देवी ने—हाँ, वही शाकुंतला देवी—पहली बार मेरे पक्ष में गवाही देने का फैसला किया।
और वही गवाही… मेरे लिए सबसे बड़ा “कंगन” बन गई—जो सोने का नहीं था, मगर आत्मसम्मान का था।

कहानी का अंत “हैप्पी” इस तरह हुआ कि मैं टूटी नहीं—मैं जाग गई।
मैंने अपने आप से कहा:
“जो प्यार मुझे छोटा करे, वो प्यार नहीं। जो रिश्ता मुझे डराए, वो रिश्ता नहीं।”

और आख़िरी सीख—
वफादारी किसी से भी पहले अपने-आप के प्रति होती है।
क्योंकि जब आप खुद की इज्ज़त बचाते हैं, तभी कोई और आपकी इज्ज़त करना सीखता है।

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