पत्थरों का रहस्य: जब बंजर जमीन ने उगला सोना
राजेश शर्मा (Ricardo Mendoza) के पेट में मरोड़ उठने लगी जब उन्होंने रियल एस्टेट ऑफिस में सूट पहने तीन आदमियों को ठहाके मारते देखा। 2 साल की कानूनी लड़ाई में उन्होंने अपना सब कुछ खो दिया था।
“देखो राजेश, तुम अपना छोटा सा घर हमारे प्रोजेक्ट के लिए बेचना नहीं चाहते थे, इसलिए अब हमने यह रास्ता निकाला है,” कंस्ट्रक्शन कंपनी के मालिक विक्रम मल्होत्रा (Fernando Vargas) ने हँसते हुए कहा। “हम तुम्हें तुम्हारे घर के बदले यह ज़मीन दे रहे हैं। यह जायज़ है या नहीं?” उसने तिरस्कार के साथ कागज मेज पर फेंक दिए। “2000 गज का टुकड़ा है, बस पत्थर और चट्टानें। वहां कुछ उगाने की कोशिश करना, किस्मत अच्छी रही तो शायद घास उग आए।”

राजेश ने कांपते हाथों से दस्तावेज़ लिए। 52 साल की उम्र में उन्होंने वह घर खो दिया था जहाँ अपनी बेटी अंजलि (Valentina) को पाला था, माइनिंग कंपनी की नौकरी जा चुकी थी और अब मुआवजे में वह ज़मीन मिली थी जिसे सब जानते थे कि वह बेकार है।
जब वह उस ज़मीन पर पहुँचे, तो नज़ारा वैसा ही था जैसा बताया गया था—चट्टानों का एक समंदर। कुछ पत्थर कारों जितने बड़े थे। अंजलि एक घंटे बाद वहाँ पहुँची और अपने पिता को एक बड़ी चट्टान पर बैठे देखा। “पापा, भगवान के लिए आप यहाँ क्या कर रहे हैं?” उसने चिढ़ते हुए पूछा। “यह ज़मीन बकरियां चराने के लायक भी नहीं है। उन्होंने आपको फिर से ठग लिया।”
राजेश खड़े हुए, एक छोटा पत्थर उठाया और उसे सूरज की रोशनी में देखा। “अंजलि, तुम्हें कुछ अजीब नहीं लगता? मैंने 25 साल जियोलॉजी (भूविज्ञान) पढ़ी है। ये पत्थर यहाँ नहीं होने चाहिए। इनकी बनावट, इनका रंग… यह इस इलाके की मिट्टी से मेल नहीं खाता। किसी ने ये पत्थर यहाँ बाहर से लाकर डाले हैं।”
अंजलि ने गहरी सांस ली। उसे लगा उसके पिता फिर से किसी ख्याली दुनिया में खो रहे हैं। “पापा, आपको नौकरी ढूंढनी चाहिए। यह ज़मीन कचरा है।” लेकिन राजेश की आँखों में एक चमक थी। “कल से मैं यहाँ काम शुरू करूँगा। मैं इन पत्थरों को हटाऊँगा और देखूँगा कि इनके नीचे क्या है।”
अगले दिन सुबह 7 बजे, राजेश अपनी पुरानी पिकअप गाड़ी में हथौड़ा, फावड़ा और तसला लेकर पहुँचे। मल्होत्रा कंस्ट्रक्शन के मजदूर बगल की साइट पर काम कर रहे थे और राजेश का मज़ाक उड़ा रहे थे। “ओए राजेश भाई! क्या इन पत्थरों को तोड़कर मूर्ति बनाओगे?” वे ज़ोर-ज़ोर से हँसे। राजेश ने कोई जवाब नहीं दिया।
उन्होंने एक मध्यम आकार के पत्थर पर हथौड़ा मारना शुरू किया। कुछ घंटों के भीतर, पूरी कंस्ट्रक्शन टीम राजेश के पागलपन की बातें करने लगी। कुछ लोग तो शर्त लगाने लगे कि यह ‘बुड्ढा’ कितनी देर टिक पाएगा। लेकिन राजेश को पता था कि अगर पत्थर को सही बिंदु पर मारा जाए, तो वह अपनी परतों को खोल देता है।
जब उन्होंने पहला पत्थर तोड़ा, तो उसके अंदर छोटे-छोटे क्रिस्टल (रवे) जड़े हुए थे, जिनका रंग हल्का हरा था—ऐसा कुछ उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था। उन्होंने उन टुकड़ों को जेब में रखा और काम जारी रखा। जैसे-जैसे पत्थर टूटते गए, और भी क्रिस्टल निकलने लगे—कुछ पीले, कुछ नीले। शाम को राजेश अपने पुराने दोस्त अजीत (Alejandro) के पास गए, जो यूनिवर्सिटी की लैब में काम करता था।
अजीत ने लैंस से उन नमूनों को देखा। “राजेश, ये सुंदर हैं, पर शायद साधारण क्वार्ट्ज (Quartz) हैं। फिर भी मैं कुछ टेस्ट कर दूँगा।” राजेश घर लौटे, थके हुए पर उम्मीद से भरे। अगले एक हफ्ते तक वह तपती धूप में पत्थर तोड़ते रहे। उन्होंने देखा कि पत्थरों के नीचे की मिट्टी उम्मीद से ज़्यादा नम थी।
अंजलि फिर आई, परेशान होकर। “पापा, अपनी हालत देखिए। आपकी खाल जल गई है, हाथ ज़ख्मी हैं। इन साधारण पत्थरों के लिए आप अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं? बैंक की तीन किश्तें बाकी हैं, वे गाड़ी भी उठा ले जाएंगे।” राजेश ने शांत होकर कहा, “अंजलि, मुझे दो हफ्ते और दे दो। अगर कुछ नहीं मिला, तो मैं चौकीदार की नौकरी कर लूँगा।”
अगले सोमवार अजीत का फोन आया। उसकी आवाज़ अजीब थी। “राजेश, तुरंत लैब आओ।” जब राजेश वहाँ पहुँचे, अजीत ने रिपोर्ट दिखाई। “ये साधारण क्वार्ट्ज नहीं हैं। इनमें बेरिल (Beryl) और एक्वामरीन (Aquamarine) के अंश हैं। यहाँ तक कि मुझे गुलाबी टूरमलाइन (Pink Tourmaline) और पन्ने (Emerald) के भी संकेत मिले हैं।”
राजेश का दिल तेज़ी से धड़कने लगा। “इसका क्या मतलब है?”
“इसका मतलब है कि तुम्हारी ज़मीन एक ऐसी चट्टानी परत (Pegmatite) के ऊपर हो सकती है जहाँ कीमती रत्न बनते हैं। पर राजेश, खुश होने से पहले यह समझ लो कि ये सिर्फ अंश हैं। पूरी खदान होने की गारंटी नहीं है।”
राजेश नए जोश के साथ ज़मीन पर लौटे। अब उन्होंने बेतरतीब पत्थर तोड़ने के बजाय गहराई में खुदाई शुरू की। और तभी, ज़मीन के डेढ़ मीटर नीचे उन्हें एक प्राकृतिक गुफा (Cavity) मिली। राजेश ने टॉर्च जलाई और अंदर झाँका।
वह सन्न रह गए। गुफा की दीवारें रंग-बिरंगे क्रिस्टल से भरी हुई थीं जो टॉर्च की रोशनी में जुगनू की तरह चमक रहे थे। कुछ पत्थर मुट्ठी जितने बड़े थे। यह एक ‘जियोड’ (Geode) की तरह था, पर बहुत बड़ा। राजेश कांपते हुए बाहर निकले। उन्होंने तुरंत अजीत को बुलाया।
जब अजीत उस अंधेरी गुफा में उतरा, तो वह 5 मिनट तक चुप रहा। “राजेश… यह सिर्फ छोटा-मोटा टुकड़ा नहीं है। यह तो रत्नों का खजाना है! देखो, यह इंटरनेशनल क्वालिटी का एक्वामरीन है और यह गुलाबी टूरमलाइन! और ये छोटे हरे पत्थर… अगर मैं गलत नहीं हूँ, तो ये बेशकीमती पन्ने हैं।”
राजेश दीवार के सहारे टिक गए, उनके पैर लड़खड़ा रहे थे। “इसकी कीमत क्या होगी?”
अजीत ने अपनी लैब की छोटी मशीन से कुछ केमिकल टेस्ट किए। “राजेश, अगर यह परत पूरी ज़मीन के नीचे फैली है, तो तुम करोड़ों के मालिक हो। और अगर सिर्फ यही गुफा है, तो भी तुम अपनी बाकी ज़िंदगी किसी राजा की तरह बिता सकते हो। मेक्सिको (भारत) के पन्ने दुनिया में सबसे कीमती माने जाते हैं।”
राजेश ने गुफा के मुँह को पत्थरों और मिट्टी से वापस ढँक दिया ताकि किसी को पता न चले। अंजलि जब शाम को आई, तो राजेश ने उसे कुछ नमूने दिखाए। “पापा, ये तो बहुत कीमती लग रहे हैं!” राजेश ने मुस्कुराते हुए कहा, “बेटा, मल्होत्रा ने मुझे बर्बाद करने के लिए यह ज़मीन दी थी, पर उसे नहीं पता था कि उसने मुझे कुबेर का खजाना सौंप दिया है।”
अगले दिन अजीत एक जेम-एक्सपर्ट जोशी जी (Jose Luis) को लेकर आए। जोशी जी ने 40 साल से रत्नों का कारोबार किया था। गुफा के अंदर देखते ही उन्होंने चश्मा उतारा और बोले, “बेटा, क्या तुम्हें अंदाज़ा भी है तुमने क्या खोजा है? पिछले 40 सालों में मैंने रत्नों का इतना बड़ा भंडार कभी नहीं देखा। ये पन्ने… ये तुम्हारी सात पुश्तें पाल सकते हैं!”
