हाईवे का सफर: एक अनकही दास्तान
एक लाल रंग का टाटा सिग्न ट्रक राजस्थान के सुनसान हाईवे से गुज़र रहा था, जब एक बंद पड़े पेट्रोल पंप के सामने अचानक ब्रेक की रोशनी चमकी। चिलचिलाती धूप में, लगभग 45 साल की एक महिला, जिसके गहरे काले बाल बंधे हुए थे और जिसने सूती सलवार-कमीज़ पहनी थी, मदद के लिए हाथ उठा रही थी। मैं ड्राइवर, उम्र मुश्किल से 24-25 साल, मैंने खिड़की नीचे की और उसकी आँखों में कुछ अजीब देखा—वह डर नहीं, बल्कि एक चट्टान जैसी दृढ़ता थी। वह बिना बुलाए ही ट्रक में चढ़ गई और जब हमारी नज़रें मिलीं, तो केबिन की खामोशी में एक अनकही चिंगारी भड़क उठी।

मैंने बिना कोई सवाल किए ट्रक आगे बढ़ा दिया। वह डरी हुई नहीं, बस थकी हुई लग रही थी। उसकी सांवली त्वचा पसीने से चमक रही थी और जब वह सीट पर संभलकर बैठी, तो मैंने देखा कि उसके हाथ हल्के कांप रहे थे।
मेरा नाम आर्यन है। पिछले तीन सालों से ये हाईवे ही मेरा परिवार हैं। मैं आमतौर पर अनजान लोगों को लिफ्ट नहीं देता, पर इस औरत में कुछ अलग था।
“कहाँ जाना है?” मैंने सड़क से नज़रें हटाए बिना पूछा। “कहीं भी, बस यहाँ से दूर,” उसने भारी आवाज़ में कहा, जैसे सदियों से प्यासी हो। मैंने उसे पानी की बोतल दी। उसने पागलों की तरह पानी पिया और जब रुकी, तो उसकी नज़रों ने मुझे बेचैन कर दिया।
उसके कपड़ों और चाल-ढाल से वह इस सुनसान सड़क की नहीं लग रही थी। उसके जूते गंदे थे पर कीमती थे, और उसकी कलाई पर बँधी घड़ी मेरे पूरे ट्रक से ज़्यादा महंगी थी। “तुम्हारा नाम क्या है?” मैंने ज़ोर दिया। “नताशा,” उसने लंबी खामोशी के बाद कहा। “और तुम्हें इससे ज़्यादा जानने की ज़रूरत नहीं है।”
वह अपने सीने से एक छोटा बैग चिपकाए बैठी थी, जैसे उसमें उसकी पूरी दुनिया बंद हो। जब भी कोई गाड़ी हमें ओवरटेक करती, वह डर के मारे शीशे में देखने लगती।
“क्या तुम किसी मुसीबत में हो?” मैंने सीधे पूछा। वह हँसी, पर उस हँसी में दर्द था। “जितना तुम सोच सकते हो, उससे कहीं ज़्यादा, बेटा।” “मैं कोई बच्चा नहीं हूँ,” मैंने सख्ती से कहा। “मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूँ।” नताशा ने अपनी उदास आँखों से मुझे देखा। “मैं तुम्हारे लिए बहुत बड़ी हूँ, आर्यन। मैं 45 साल की हूँ, तुम्हारी माँ की उम्र की।” उसकी बात ने मुझे चिढ़ा दिया। “उम्र सिर्फ एक नंबर है, और मैं तुम्हें अपनी माँ की तरह नहीं देख रहा।”
रात का अंधेरा घिरने लगा था। नताशा सो रही थी, पर उसकी सांसें तेज़ थीं। अचानक पीछे से एक गाड़ी की हेडलाइट्स चमकीं। नताशा हड़बड़ाकर जाग गई। “क्या वो वही लोग हैं?” मैंने पूछा। “पता नहीं, पर हम जोखिम नहीं ले सकते।”
पीछे एक काली स्कॉर्पियो थी, जिसकी खिड़कियाँ काली थीं और नंबर प्लेट गायब थी। मैंने ट्रक की रफ्तार बढ़ा दी। नताशा ने अपना बैग खोला। उसमें नोटों की गड्डियाँ थीं, बहुत सारे पैसे! और एक पेन-ड्राइव।
“यह क्या है नताशा?” “यह न्याय है,” उसने ठंडी आवाज़ में कहा। “मेरे देवर राकेश ने मेरे पति की हत्या की और सारा बिजनेस हड़प लिया। यह पेन-ड्राइव उसके काले कारनामों का सबूत है। वह मुझे मारना चाहता है ताकि कोई गवाह न बचे।”
उसने बताया कि उसका पति अमित कोई साधारण आदमी नहीं था, उसे रास्ते से हटा दिया गया क्योंकि उसने राकेश के जुर्म पकड़ लिए थे। अब नताशा को दिल्ली पहुँचना था, सीबीआइ मुख्यालय, ताकि वह ये सबूत सौंप सके।
“मैं तुम्हें दिल्ली पहुँचाऊँगा,” मैंने वादा किया। नताशा ने मेरी गाल पर हाथ रखा। उसका स्पर्श बिजली की तरह था। “तुम नहीं जानते तुम क्या कर रहे हो।” “मुझे बस तुम्हारी फिक्र है,” मैंने कहा और उसे चूम लिया। वह एक ऐसा चुंबन था जिसमें डर, उम्मीद और जुनून सब मिला हुआ था।
लेकिन राकेश के आदमी हमें ट्रैक कर चुके थे। हाईवे के एक किनारे उन्होंने हमारा रास्ता रोक लिया। मैं हाथ ऊपर करके नीचे उतरा, नताशा भी उतरी। मैंने चालाकी से पेन-ड्राइव अपनी जेब में छिपा ली और उन्हें पैसों का लालच दिया। तभी दूर से पुलिस के सायरन की आवाज़ आई और वे गुंडे भाग निकले।
जब हम फिर से अकेले हुए, तो हाईवे के किनारे नताशा टूटकर मेरे सीने से लग गई। “आर्यन, मुझे तुम्हें कुछ बताना है… बहुत ज़रूरी।” “क्या?” उसकी आँखों में आँसू थे। “मैं बीमार हूँ। चौथी स्टेज का कैंसर। डॉक्टरों ने मुझे 6 महीने दिए थे, जिनमें से 4 गुज़र चुके हैं।”
मेरी दुनिया हिल गई। अब मुझे समझ आया कि वह इतनी बेखौफ क्यों थी। “मैं इसलिए लड़ रही हूँ क्योंकि मैं मरने से पहले उस कातिल को सलाखों के पीछे देखना चाहती हूँ। ये पैसे मेरे इलाज के लिए नहीं, बल्कि अमित के इंसाफ के लिए हैं।”
“तुम नहीं मरोगी,” मैंने उसे कसकर पकड़ते हुए कहा। “हम दिल्ली जाएँगे, राकेश को जेल भेजेंगे और तुम्हारा सबसे अच्छा इलाज करवाएंगे।”
नताशा ने एक फीकी मुस्कान दी। “तुम बहुत मासूम हो, आर्यन।”
रात के सन्नाटे में, हम एक मामूली हाईवे मोटल में रुके। बाहर मौत खड़ी थी, पर उस कमरे के अंदर, हम दोनों अपनी ज़िंदगी का सबसे कीमती वक्त जी रहे थे।
