“एक मामूली किराए के फ्लैट में रहने वाला बच्चा कह रहा है कि उसके पिता ‘फोर-स्टार जनरल’ हैं? यह मेरी 23 साल की टीचिंग में सुना गया सबसे घटिया झूठ है!”
“एक मामूली किराए के फ्लैट में रहने वाला बच्चा कह रहा है कि उसके पिता ‘फोर-स्टार जनरल’ हैं? यह मेरी 23 साल की टीचिंग में सुना गया सबसे घटिया झूठ है!”
“एक मामूली किराए के फ्लैट में रहने वाला लड़का कह रहा है कि उसके पिता ‘फोर-स्टार जनरल’ (सेनाध्यक्ष) हैं? यह मेरी 23 साल की टीचिंग में सुनी गई सबसे घटिया और बेतुकी कहानी है।”
श्रीमती पुष्पा शर्मा ने यह बात फुसफुसाते हुए नहीं, बल्कि दिल्ली के ‘पब्लिक स्कूल’ की चौथी कक्षा के सामने चिल्लाते हुए कही। फिर उन्होंने आर्यन की डेस्क से उसका होमवर्क छीना और उसे बीच से फाड़ दिया। कागज फटने की आवाज़ पूरे कमरे में गूँज उठी। उन्होंने उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिए।
कागज के वे टुकड़े आर्यन के पुराने जूतों पर बर्फ की तरह गिरे। “तुम्हें झूठी कहानियाँ गढ़ने का कोई हक नहीं है, आर्यन। जनरल बड़े बंगलों में रहते हैं। उनके बच्चे प्राइवेट स्कूलों में जाते हैं और बड़ी गाड़ियों में घूमते हैं। वे तुम्हारी तरह…” उन्होंने तिरस्कार से उसे ऊपर से नीचे तक देखा, “तुम्हारी तरह नहीं दिखते।”
10 साल का आर्यन वहीं पत्थर की तरह खड़ा रह गया। उसके हाथ कांप रहे थे। पूरी क्लास उसे घूर रही थी। मैडम ने उन टुकड़ों को मरोड़कर कूड़ेदान में फेंक दिया। “शर्मनाक।”
दो घंटे पहले, आर्यन अपने पिता की आवाज़ सुनकर जागा था। “नाश्ता पाँच मिनट में तैयार होना चाहिए, जवान!”
आर्यन का परिवार दिल्ली के आर.के. पुरम में एक साधारण से तीन कमरों के फ्लैट में रहता था। यह इलाका सेना के मुख्यालय के करीब था। घर का फर्नीचर साफ था लेकिन पुराना। दीवारों पर पारिवारिक तस्वीरें थीं, लेकिन ऐसा कुछ नहीं था जिससे लगे कि यह किसी बड़े सैन्य अधिकारी का घर है। न कहीं वर्दी दिख रही थी, न कोई मेडल, न कोई झंडा। यह सुरक्षा का प्रोटोकॉल था।
जनरल विक्रम सिंह अपनी पहचान का ढिंढोरा नहीं पीटते थे। रसोई में आर्यन ने अपने पिता को देखा, जो जींस और एक साधारण हुडी पहने बैठे थे। बाहर से देखने पर वे एक आम आदमी, शायद किसी ऑफिस के कर्मचारी लगते थे। उसकी माँ, डॉ. अंजलि सिंह, जो एक मशहूर सर्जन थीं, अपनी ड्यूटी पर जाने के लिए तैयार थीं।
फ्रिज पर एक छोटा सा चित्र लगा था जो आर्यन ने बनाया था—एक आदमी जिसकी वर्दी के कंधों पर चार सितारे थे। पास ही कैलेंडर पर आज की तारीख पर लाल गोला बना था। ‘पेरेंट्स प्रोफेशन डे’ (माता-पिता के व्यवसाय का दिन)।
आर्यन अपनी मुस्कुराहट नहीं रोक पा रहा था। वह हफ्तों से इस दिन का इंतज़ार कर रहा था। “पापा, क्या मैं उन्हें उस समय के बारे में बता सकता हूँ जब आप प्रधानमंत्री से मिले थे?”
जनरल सिंह ने अपनी पत्नी की ओर देखा। अंजलि की नज़रों में यह बात साफ थी कि उनके बेटे को अब छिपने की ज़रूरत नहीं है। “आर्यन, याद है हमने क्या बात की थी? सुरक्षा की वजह से कुछ बातें निजी रखनी पड़ती हैं।”
“मुझे पता है पापा, लेकिन दूसरे बच्चे तो अपने माता-पिता की तारीफ करते हैं।” विक्रम की आवाज़ नरम पर अटल थी। “हमारा परिवार अलग है। हम अपनी पहचान ज़ाहिर नहीं करते। समझे?”
आर्यन ने सिर हिलाया, पर वह पूरी तरह नहीं समझ पा रहा था कि दूसरे बच्चे गर्व क्यों कर सकते हैं और उसे चुप क्यों रहना पड़ता है। अंजलि ने अपने पति का हाथ पकड़ा और कहा, “विक्रम, उसे तुम पर गर्व करने का पूरा हक है।”
जनरल ने अपने बेटे को देखा। “ठीक है, बस कल इसे सादा रखना। तुम्हें किसी को कुछ साबित करने की ज़रूरत नहीं है।” आर्यन अपना नाश्ता खत्म कर स्कूल के लिए तैयार होने चला गया। वह नहीं जानता था कि अगले 12 घंटों में सब कुछ इतना जटिल हो जाएगा।
दिल्ली का वह स्कूल शहर के बीचों-बीच था, जहाँ हर तरह के बच्चे आते थे—डिप्लोमैट्स के बच्चे, मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चे और वे भी जिनके माता-पिता उन बड़ी इमारतों में सफाई का काम करते थे। यहाँ हर बच्चे को बराबर समझा जाना चाहिए था, लेकिन श्रीमती पुष्पा शर्मा पिछले 23 सालों से यहाँ पढ़ा रही थीं और उन्हें लगता था कि वे चेहरे देखकर ही सच और झूठ का पता लगा सकती हैं।

श्रीमती पुष्पा शर्मा को यक़ीन था कि उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर सही किया है। उनके लिए आर्यन बस एक और बच्चा था जो “ध्यान पाने” के लिए झूठ बोल रहा था। लेकिन आर्यन के लिए, उस दिन कुछ टूट गया था—कुछ ऐसा जिसे वह शब्दों में नहीं समझा सकता था।
अगले कुछ घंटे वह चुप रहा। न लंच किया, न किसी से बात की। उसकी आँखें बार-बार कूड़ेदान की ओर चली जातीं, जहाँ उसका फटा हुआ होमवर्क पड़ा था—वही होमवर्क जिसमें उसने अपने पिता को गर्व से “फोर-स्टार जनरल” लिखा था।
स्कूल की छुट्टी हुई। बच्चे शोर मचाते हुए बाहर निकले। आर्यन चुपचाप अपना बैग उठाकर बस स्टॉप की ओर चला गया। बस की खिड़की से बाहर देखते हुए उसने पहली बार सोचा—अगर पापा सच में इतने बड़े हैं, तो हम ऐसे क्यों रहते हैं?
उस शाम घर में असामान्य शांति थी। जनरल विक्रम सिंह डाइनिंग टेबल पर बैठे अख़बार पढ़ रहे थे। उन्होंने आर्यन को देखा—झुका हुआ सिर, बिना मुस्कान।
“क्या हुआ, जवान?” उन्होंने सामान्य लहजे में पूछा।
आर्यन ने जवाब नहीं दिया। सीधे अपने कमरे में चला गया।
अंजलि ने यह सब देखा। माँ का दिल तुरंत समझ गया। उन्होंने दरवाज़ा खटखटाया।
“आर्यन, बेटा… मैं अंदर आ सकती हूँ?”
आर्यन बिस्तर पर बैठा था, मुट्ठियाँ भींचे।
“मैडम ने कहा… मैं झूठा हूँ,” वह फूट पड़ा। “उन्होंने सबके सामने मेरा होमवर्क फाड़ दिया। कहा कि जनरल के बच्चे मेरे जैसे नहीं होते।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
विक्रम सिंह दरवाज़े पर खड़े थे। उन्होंने एक-एक शब्द सुना था। उनकी आँखें स्थिर थीं, लेकिन जबड़े की मांसपेशियाँ तन गईं।
“उन्होंने… क्या किया?” उनकी आवाज़ शांत थी, लेकिन वह शांति तूफ़ान से पहले की थी।
आर्यन ने डरते-डरते सब बता दिया।
अंजलि ने बेटे को गले लगा लिया। विक्रम ने एक गहरी साँस ली।
“आर्यन, तुमने कोई ग़लत काम नहीं किया,” उन्होंने दृढ़ता से कहा। “गलत यह है कि किसी बच्चे को उसकी सच्चाई के लिए शर्मिंदा किया जाए।”
उस रात विक्रम और अंजलि देर तक बात करते रहे। सुरक्षा प्रोटोकॉल, गुमनाम जीवन, सब कुछ… लेकिन एक सवाल सबसे ऊपर था—क्या अब भी चुप रहना सही है?
अगली सुबह, दिल्ली का वह स्कूल हमेशा की तरह खुला। श्रीमती पुष्पा शर्मा अपने रजिस्टर के साथ कक्षा में पहुँचीं, आत्मविश्वास से भरी हुई। उन्हें ज़रा-सी भी भनक नहीं थी कि यह दिन उनकी 23 साल की टीचिंग का सबसे यादगार—और सबसे निर्णायक—दिन बनने वाला है।
तीसरे पीरियड के बीच, स्कूल के गेट पर हलचल हुई। एक काली साधारण कार अंदर आई, बिना किसी सायरन के। गार्ड तुरंत सतर्क हो गए। प्रिंसिपल के ऑफिस में फोन घनघनाया।
“मैम… इंडियन आर्मी से कोई वरिष्ठ अधिकारी आए हैं। चार-स्टार रैंक,” आवाज़ काँप रही थी।
प्रिंसिपल का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
कुछ ही मिनटों में पूरे स्कूल में फुसफुसाहट फैल गई।
“आर्मी का जनरल?”
“यहाँ?”
“क्यों?”
चौथी कक्षा में श्रीमती शर्मा पढ़ा रही थीं कि अचानक दरवाज़ा खटखटाया गया।
“मैडम, प्रिंसिपल आपको बुला रही हैं… अभी।”
वह चौंकीं, लेकिन चली गईं।
ऑडिटोरियम में सभी टीचर्स और चौथी कक्षा के बच्चे बुलाए गए। आर्यन सबसे पीछे खड़ा था, दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। उसने मंच की ओर देखा—वहाँ एक लंबा, सधा हुआ आदमी खड़ा था। जींस, साधारण जैकेट। कोई तड़क-भड़क नहीं।
लेकिन जब उसने मुड़कर देखा…
“पापा?”
पूरा हॉल सन्न रह गया।
जनरल विक्रम सिंह ने माइक लिया।
“नमस्कार। मैं विक्रम सिंह हूँ। भारतीय सेना में सेवा करता हूँ।”
उन्होंने एक पल रुककर कहा,
“आज मैं यहाँ किसी पद के कारण नहीं, बल्कि एक पिता के रूप में आया हूँ।”
भीड़ में खुसर-पुसर शुरू हो गई। श्रीमती पुष्पा शर्मा की साँस अटक गई।
“कल,” जनरल बोले, “मेरे बेटे को उसकी कक्षा में सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया। उसके शब्दों पर विश्वास नहीं किया गया। उसका काम फाड़ा गया।”
उन्होंने सीधा श्रीमती शर्मा की ओर देखा।
“एक बच्चे को उसकी सच्चाई पर शर्मिंदा करना… यह शिक्षा नहीं, अन्याय है।”
श्रीमती शर्मा का चेहरा उतर गया।
“मुझे… मुझे नहीं पता था,” वह बुदबुदाईं।
“यही समस्या है,” विक्रम ने शांत लेकिन कठोर स्वर में कहा। “आपने जाना ही नहीं। आपने मान लिया।”
पूरा हॉल खामोश था।
“हम साधारण फ्लैट में रहते हैं क्योंकि सेवा का मतलब दिखावा नहीं होता। मेरे बच्चे साधारण स्कूल में पढ़ते हैं क्योंकि बराबरी यहीं से शुरू होती है।”
फिर उन्होंने आर्यन को अपने पास बुलाया।
“यह मेरा बेटा है। और मुझे उस पर गर्व है—इसलिए नहीं कि वह जनरल का बेटा है, बल्कि इसलिए कि वह सच बोलने से नहीं डरता।”
अंजलि की आँखों में आँसू थे। कई टीचर्स की भी।
श्रीमती पुष्पा शर्मा आगे आईं। उनकी आवाज़ काँप रही थी।
“आर्यन… मुझे माफ़ कर दो। मैंने तुम्हें गलत समझा। अपने घमंड और अनुभव पर भरोसा किया, इंसानियत पर नहीं।”
आर्यन ने ऊपर देखा। उसके पिता ने हल्का-सा सिर हिलाया।
“ठीक है, मैडम,” आर्यन ने कहा। “बस… अगली बार किसी और बच्चे के साथ ऐसा मत करना।”
वह पल पूरे हॉल को चीर गया।
प्रिंसिपल ने तुरंत घोषणा की—स्कूल में “सम्मान और समानता” पर नई ट्रेनिंग होगी। श्रीमती शर्मा ने स्वयं आगे बढ़कर इसे लीड करने का वादा किया।
कुछ हफ्तों बाद, आर्यन की क्लास में “पेरेंट्स प्रोफेशन डे” फिर मनाया गया। इस बार आर्यन ने बस इतना कहा—
“मेरे पापा देश की सेवा करते हैं। और उन्होंने मुझे सिखाया है कि सबसे बड़ी रैंक इंसान होने की होती है।”
तालियों की गड़गड़ाहट से कमरा गूँज उठा।
उस दिन श्रीमती पुष्पा शर्मा ने अपनी डायरी में लिखा:
“23 साल में पहली बार, एक बच्चे ने मुझे सिखाया कि सच्चाई चेहरे और कपड़ों से नहीं पहचानी जाती।”
और आर्यन?
वह मुस्कुरा रहा था। अब चुप नहीं था।
अब शर्मिंदा नहीं था।
अब गर्व के साथ खड़ा था—सिर्फ़ एक जनरल का बेटा नहीं, बल्कि एक सच्चा, साहसी बच्चा।
