मैंने अपने कमरे में एक छुपा हुआ कैमरा लगाया था—सोचा था सासू माँ मेरे गहने चुराती हैं तो सबूत मिल जाएगा। पर मुझे क्या पता था… उस कैमरे में जो दिखा, वह पिछले 10 सालों से मेरे पति की घिनौनी हरकतों का सच था।
मेरा नाम अनिता, उम्र 32 साल। मेरी शादी को 7 साल हुए थे। हम सब एक ही घर में रहते थे—दिल्ली में बना तीन मंज़िला मकान। मेरी सास शकुंतला देवी, जिन्हें हर चीज़ में दखल देने की आदत थी। वह अक्सर हमारे कमरे की अलमारी खोलकर देखने लगती थीं और कहतीं:
“बस देख रही हूँ कि कुछ कमी तो नहीं है।”
मैं उन पर भरोसा नहीं करती थी—खासकर तब से जब मेरी माँ के दिए हुए दो सोने के कड़े रहस्यमयी तरीके से गायब हो गए थे। उनसे पूछा तो वह हँस पड़ीं:
“इस घर में कोई चोरी नहीं करता!”
मुझे शक हुआ… बहुत शक।
इसलिए मैंने एक नन्हा-सा कैमरा गमले के पीछे छुपाकर रख दिया—सीधा हमारी अलमारी की तरफ़। कैमरे का मोशन अलर्ट भी ऑन कर दिया।
तीन दिन बीत गए।
दफ़्तर में बैठी थी कि अचानक मोबाइल पर लगातार नोटिफ़िकेशन आने लगे—
Camera detected motion.
मैंने तुरंत वीडियो खोलकर देखा।
जैसा मुझे शक था—
सासू माँ शकुंतला देवी कमरे में दाखिल हुईं। इधर-उधर नज़र दौड़ाई, फिर सीधा अलमारी की तरफ़ गईं और एक-एक खांचे को खोलकर टटोलने लगीं।
मैं बड़बड़ाई,
“अच्छा… अब रंगे हाथों पकड़ लिया।”
लेकिन…
वीडियो शुरू होने के 20 सेकंड बाद ही, मेरे पूरे शरीर में ठंड दौड़ गई।
स्क्रीन पर अब सास नहीं दिखाई दे रही थीं…
बल्कि मेरे पति — राजेश।
राजेश कमरे में धीरे से दाखिल हुआ, और एक पल चारों तरफ़ नज़रें घुमाकर दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया।
मैंने सोचा शायद ऑफिस से जल्दी आ गया होगा…
लेकिन अगला दृश्य तो जैसे मेरे सीने पर किसी ने पत्थर रख दिया हो।
वह सासू माँ के बिल्कुल पास जाकर कुछ फुसफुसाया।
सासू माँ ने सिर हिलाया… होंठों पर एक अजीब-सी मुस्कान आई…
और जो कुछ उसके बाद कैमरे में कैद हुआ,
उसे देखकर मेरा मन उलट गया—
मैं दफ़्तर की कुर्सी पर जड़ हो गई।
मोबाइल स्क्रीन में जो चल रहा था, मानो वह मेरे ही जीवन का नहीं, किसी और की बदकिस्मती की फिल्म हो।
कैमरे की रिकॉर्डिंग आगे बढ़ती रही—
राजेश ने अलमारी का दरवाज़ा खोला और मेरे गहनों वाला छोटा बॉक्स बाहर निकाला।
मैं हौले से चिल्लाई,
“ये… ये तो मेरे कड़े हैं…!”
उसने वह बॉक्स सासू माँ शकुंतला देवी को थमाया।
वह मुस्कुराईं—एक ऐसी मुस्कान जिससे किसी भी औरत की रूह काँप जाए।
फिर उन्होंने धीमे स्वर में कहा,
“तुझे पता है न, क्या करना है?”
राजेश ने सिर झुका दिया, जैसे किसी अपराधी को आदेश मिल रहा हो।
मेरा दिल एक पल रुक-सा गया।
ये दोनों… एक साथ… मेरे खिलाफ़?
कब से?
क्यों?
मैंने आगे देखा—
शकुंतला देवी ने सारे गहने अपने पर्स में डाल लिए और राजेश से बोलीं,
“तू चिंता मत कर। तेरी दीपाली को पता भी नहीं चलेगा।
वैसे भी… उसे जितना भी मिला है, हमारी वजह से ही तो मिला है।”
दीपाली…?
वह कौन?
मेरी साँसें अटक गईं।
क्या मेरे पति की कोई और औरत भी है?
वीडियो में राजेश ने जवाब दिया,
“वो तो ठीक है, माँ। लेकिन उसने अगर एक दिन हिसाब माँग लिया तो?”
सासू माँ हँसी—
“अरे, तू बेचैन काहे हो रहा है? मैंने उसकी ज़िंदगी पर पूरा कंट्रोल कर लिया है।
उसकी कमाई, उसके गहने, उसकी चीज़ें… सब तो हमारे हिस्से में ही आता है।
वह सिर्फ़ नाम की बहू है।”
मेरी आँखों से आँसू निकल पड़े।
मैंने हमेशा उनकी सेवा की थी, सम्मान दिया था…
और वो मुझे “नाम की बहू” कह रही हैं?
लेकिन नर्क तो अभी शुरू ही हुआ था।
अचानक राजेश ने उनकी ओर झुककर कहा,
“माँ… आज वाली बात?”
शकुंतला देवी ने आँखें उठाकर उसे देखा।
“तेरे पिताजी तो गाँव गए हैं… ऊपर वाली मंज़िल खाली पड़ी है।”
राजेश की साँसें भारी हो गईं।
और फिर—
उन्होंने दरवाज़ा बंद किया।
और दोनों ऊपर की ओर बढ़ गए।
मैंने मोबाइल ज़मीन पर गिरा दिया।
मेरे हाथ काँप रहे थे, दिल जैसे गले में अटक गया हो।
क्या ये सच है?
मेरे पति… मेरी सास…
क्या… ये रिश्ता…?
या मैं कोई दु:स्वप्न देख रही हूँ?
मैं उठकर वॉशरूम भागी, आँखों पर पानी डाला।
लेकिन आईने में दिख रही थी वही टूटी हुई मैं।
मैंने खुद से पूछा—
“अब क्या करूँ?
किस पर भरोसा करूँ?
कहाँ जाऊँ?”
कुछ सेकंड बाद मेरा मोबाइल फिर बजा।
Camera detected motion.
मैंने डरते हुए वीडियो खोला—
इस बार राजेश कमरे में अकेला था।
वह इधर-उधर बेचैनी से टहल रहा था, जैसे किसी बात से डरा हुआ हो।
फिर उसने फोन उठाया और बोला:
“हाँ दीपाली… सब ठीक है।
हाँ, आज रात मिलते हैं।
वो (मैं) दफ़्तर से लेट आएगी।”
मेरी साँसें फिर टूट गईं।
तो वह सिर्फ़ माँ के साथ ही नहीं…
किसी और औरत के साथ भी…
मैं अब सिर्फ़ एक पत्नी नहीं थी—
मैं एक गवाह थी।
और यह सबूत… मेरे पूरे जीवन को बदल सकता था।
मैंने आँसू पोंछे।
और उसी पल फैसला किया—
अब खेल मेरे तरीके से होगा।
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