कमरे के बंद दरवाजे के पीछे से आती सिसकियों की आवाज ने सावित्री देवी के कदमों को वहीं रोक दिया। उनके हाथ में पूजा की थाली थी, जो कांपने लगी। यह आवाज उनकी बहू, अनघा की थी। पिछले छह महीनों से इस घर की दीवारों ने हंसी कम और दबी हुई चीखें ज्यादा सुनी थीं।
सावित्री देवी ने कांपते हाथों से दरवाजे को थोड़ा सा धक्का दिया। दृश्य देखकर उनका कलेजा मुंह को आ गया। उनका बेटा, रोहन, अनघा की अलमारी बिखेरे खड़ा था। अनघा जमीन पर बैठी थी, और रोहन उसके हाथों से जबरदस्ती सोने के कंगन उतारने की कोशिश कर रहा था।
“दे दे मुझे यह कंगन! तुझे समझ नहीं आता? मुझे पैसों की सख्त जरूरत है। अगर आज शाम तक मैंने पैसे जमा नहीं किए, तो मेरा पूरा बिजनेस डूब जाएगा,” रोहन गुर्राया। उसकी आंखों में एक अजीब सा पागलपन था—लालच और हताशा का पागलपन।

“नहीं रोहन, प्लीज!” अनघा ने गिड़गिड़ाते हुए अपना हाथ पीछे खींचा। “यह मेरी माँ की आखिरी निशानी है। आप पहले ही मेरे शादी के सारे गहने सट्टेबाज़ी में उड़ा चुके हैं। मेरी एफडी तुड़वा दी, मेरे पिता से उधार ले लिया। अब बस यह कंगन बचे हैं। इन्हें मत लीजिए, प्लीज। हमारे बेटे आरव की स्कूल फीस भी अभी बाकी है।”
“भाड़ में गया आरव और भाड़ में गई तेरी माँ की निशानी!” रोहन ने अनघा को धक्का दिया। अनघा का सिर बेड के कोने से टकराया।
दरवाजे पर खड़ी सावित्री देवी की चीख निकल गई। “रोहन!”
रोहन चौंककर पलटा। माँ को वहां देखकर उसके चेहरे पर एक पल के लिए घबराहट आई, लेकिन फिर वही ढिठाई लौट आई। “माँ, तुम बीच में मत आओ। यह पति-पत्नी का मामला है।”
सावित्री देवी अंदर आईं और अनघा को सहारा देकर उठाया। अनघा का माथा सूज रहा था। सावित्री देवी ने बेटे को घृणा से देखा। “पति-पत्नी का मामला? इसे डकैती कहते हैं रोहन। अपनी ही पत्नी को लूटना, उसे धमकाना… क्या यही संस्कार दिए थे हमने तुझे?”
“संस्कारों से पेट नहीं भरता माँ!” रोहन चिल्लाया। “तुम्हें पता भी है बाहर दुनिया में क्या चल रहा है? मुझे एक बड़ी डील मिली है, बस थोड़े इन्वेस्टमेंट की जरूरत है। एक बार पैसा आ जाए, तो इसे रानी बनाकर रखूंगा। पर अभी यह कंगन मुझे चाहिए।”
तभी बाहर से एक भारी और गंभीर आवाज आई। “अगर तुझे कंगन चाहिए, तो पहले मेरी लाश से गुजरना होगा।”
दरवाजे पर दीनानाथ जी खड़े थे। रोहन के पिता। वे रिटायर्ड प्रिंसिपल थे, जीवन भर अनुशासन और ईमानदारी की मिसाल रहे थे। आज उनके हाथ में उनकी पुरानी छड़ी थी, लेकिन उनका हाथ कांप नहीं रहा था। उनकी आंखों में आज पिता का मोह नहीं, बल्कि एक न्यायाधीश का क्रोध था।
“पापा, आप तो कम से कम समझो…” रोहन ने अपनी बात रखने की कोशिश की।
“चुप रह!” दीनानाथ जी की आवाज में बिजली सी कड़क थी। वे कमरे में दाखिल हुए। उन्होंने देखा कि पूरा कमरा अस्त-व्यस्त है, बहू रो रही है और उनका बेटा—जो कभी उनकी आंखों का तारा था—आज किसी अपराधी से कम नहीं लग रहा था।
दीनानाथ जी ने रोहन की आंखों में आंखें डालकर कहा, “मुझे लगा था कि तू भटक गया है, सुधर जाएगा। पिछले महीने जब तूने झूठ बोलकर मुझसे पेंशन के पैसे मांगे थे, मैंने दे दिए। सोचा शायद तुझे सच में जरूरत होगी। लेकिन आज पता चला कि तू जरूरत पूरी नहीं कर रहा, तू जुआ खेल रहा है। अपनी गृहस्थी को दांव पर लगाकर कौन सा व्यापार खड़ा करना चाहता है तू?”
“यह जुआ नहीं है, यह शेयर मार्केट है, क्रिप्टो है! आप पुराने जमाने के लोग हो, आपको समझ नहीं आएगा,” रोहन ने झुंझलाते हुए कहा। “अनघा, कंगन दे रही है या नहीं?” वह फिर से अनघा की तरफ लपका।
अनघा डर के मारे सावित्री देवी के पीछे छिप गई।
दीनानाथ जी ने अपनी छड़ी रोहन के सीने पर टिका दी और उसे पीछे धकेल दिया। “खबरदार जो उसे हाथ लगाया। वह इस घर की बहू बाद में है, पहले एक इंसान है और अब… वह हमारी बेटी है।”
रोहन हंस पड़ा, एक खोखली हंसी। “वाह! बेटा पराया हो गया और बहू सगी? पापा, यह सब इमोशनल ड्रामा बंद करो। प्रैक्टिकल बनो। यह घर मेरा भी है। मुझे मेरे हिस्से के पैसे चाहिए। अगर कंगन नहीं देती, तो घर के कागज दे दो। मैं गिरवी रख दूंगा।”
सावित्री देवी सन्न रह गईं। “घर? जिस घर को तेरे पिता ने ईंट-ईंट जोड़कर बनाया? उसे तू गिरवी रखेगा?”
“हाँ, तो क्या? मैं उनका इकलौता बेटा हूँ। उनके बाद सब मेरा ही तो है। आज दे दें तो क्या बुराई है?” रोहन की बेशर्मी की हद पार हो चुकी थी।
दीनानाथ जी की आंखें भर आईं, लेकिन आंसू गिरने से पहले ही सूख गए। उन्होंने एक गहरी सांस ली, जैसे कोई बहुत बड़ा फैसला ले रहे हों। वे धीरे से अपनी अलमारी की तरफ गए।
“क्या कर रहे हैं आप?” सावित्री देवी ने घबराकर पूछा। उन्हें लगा शायद वे घर के कागज निकालने जा रहे हैं।
दीनानाथ जी ने दराज से एक फाइल निकाली। रोहन की आंखों में चमक आ गई। “मुझे पता था पापा, आप मुझे निराश नहीं करोगे। लाइए कागज।”
दीनानाथ जी ने फाइल खोली। उसमें घर के कागज नहीं थे। उसमें एक पुराना स्टांप पेपर था और एक पेन।
“यह ले,” दीनानाथ जी ने कागज रोहन की तरफ बढ़ाया।
“यह क्या है?” रोहन ने उलझन में पूछा।
“यह बेदखली का नोटिस है,” दीनानाथ जी ने शांत स्वर में कहा। “मैंने यह कागज दो महीने पहले ही वकील से तैयार करवा लिया था, जिस दिन मुझे पता चला था कि तूने आरव की गुल्लक तोड़कर पैसे चुराए थे। मैं बस साइन करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। मुझे लगा मेरा बेटा लौट आएगा। लेकिन आज… आज तूने साबित कर दिया कि मेरा बेटा मर चुका है। जो सामने खड़ा है, वह सिर्फ एक लालची जानवर है।”
रोहन का चेहरा फक पड़ गया। “पापा, आप मजाक कर रहे हैं? आप मुझे घर से निकालेंगे? अपने इकलौते बेटे को?”
“बेटा?” दीनानाथ जी ने कड़वाहट से कहा। “बेटा वह होता है जो बुढ़ापे में माँ-बाप की लाठी बने, वह नहीं जो उनकी बहू के गहने नोचे। बेटा वह होता है जो घर की इज्जत बढ़ाए, वह नहीं जो अपनी पत्नी को मानसिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित करे। अनघा ने तेरी वजह से कितनी रातें भूखे रहकर गुजारी हैं, यह हमें पता है। हमने सोचा था कि हम बीच में नहीं बोलेंगे, शायद तुम दोनों सुलझा लोगे। पर अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है।”
दीनानाथ जी ने अनघा का हाथ पकड़ा और उसे अपने पास खड़ा किया। “सुन ले रोहन, यह घर, यह जमीन, मेरी पेंशन और मेरी जमा-पूंजी… इसमें से एक फूटी कौड़ी भी तुझे नहीं मिलेगी। यह सब मेरी बहू अनघा और मेरे पोते आरव के नाम होगा। वसीयत मैं आज ही बदल दूंगा।”
रोहन गुस्से से पागल हो गया। “आप ऐसा नहीं कर सकते! कानूनन मेरा हक है!”
“कानूनन हक तब होता है जब बाप बिना वसीयत किए मर जाए। मैं जिंदा हूँ, और पूरे होश-हवास में हूँ,” दीनानाथ जी ने गरजते हुए कहा। “और रही बात हक की, तो तूने एक पति और पिता होने का हक उसी दिन खो दिया था जब तूने अपनी गर्भवती पत्नी को तनाव देकर अस्पताल पहुँचा दिया था। तुझे क्या लगा था हमें पता नहीं? अनघा ने हमसे छिपाया, पर डॉक्टर ने मुझे सब बताया था।”
रोहन की बोलती बंद हो गई।
दीनानाथ जी ने दरवाजे की तरफ इशारा किया। “निकल जा यहाँ से। अभी, इसी वक्त।”
“मैं कहाँ जाऊँगा?” रोहन चिल्लाया। “मेरे पास पैसे नहीं हैं, बाहर कर्जदार खड़े हैं।”
“तो कमाना सीख,” सावित्री देवी पहली बार बोलीं। उनकी आवाज में अब ममता नहीं, कठोरता थी। “जब तक बाप की कमाई और बीवी के गहने मिल रहे थे, तब तक तुझे हाथ-पैर हिलाने की जरूरत नहीं पड़ी। अब सड़क पर ठोकर खाएगा, तो शायद आटे-दाल का भाव पता चलेगा। जा रोहन, अपनी जिंदगी जी, जैसे तुझे जीनी है। पर इस घर की शांति को आग मत लगा।”
रोहन ने अनघा की तरफ देखा, उम्मीद की एक आखिरी किरण के साथ। “अनघा, तुम तो कुछ बोलो। तुम मेरे बिना कैसे रहोगी?”
अनघा ने अपने आंसू पोंछे। उसने सिर उठाया और पहली बार रोहन की आंखों में आंखें डालकर देखा। “मैं रह लूंगी रोहन। मैं कम खा लूंगी, सादे कपड़े पहन लूंगी, पर अब और डर-डर के नहीं जिऊंगी। मैं आरव को यह सिखाना नहीं चाहती कि जुल्म सहना औरत का धर्म है। मेरे पास मेरे माता-पिता समान सास-ससुर हैं, मुझे और कुछ नहीं चाहिए।”
रोहन को विश्वास नहीं हुआ कि जिस पत्नी को उसने इतना दबाया, वह आज उसके खिलाफ खड़ी हो गई। उसे अपनी हार सामने दिख रही थी। वह बड़बड़ाता हुआ, गालियां देता हुआ, पैर पटकता हुआ कमरे से निकला।
दीनानाथ जी ने उसके पीछे जाकर मुख्य दरवाजा बंद कर दिया। चिटकनी लगाने की आवाज पूरे घर में गूंजी। वह सिर्फ दरवाजे की चिटकनी नहीं थी, वह एक अध्याय के बंद होने की आवाज थी।
दीनानाथ जी दरवाजे के सहारे खड़े रहे। उनका शरीर अब जवाब दे रहा था। एक पिता के लिए अपने बेटे को घर से निकालना, अपने ही शरीर का एक अंग काट कर फेंकने जैसा था। वे धीरे-धीरे जमीन पर बैठ गए और सिसक पड़े।
सावित्री देवी भी उनके पास बैठकर रोने लगीं। “हमने क्या कमी छोड़ दी थी परवरिश में? क्यों हुआ हमारे साथ ऐसा?”
अनघा, जो अब तक पत्थर बनी खड़ी थी, दौड़कर उनके पास आई। वह दोनों के बीच बैठ गई और दोनों के घुटनों पर सिर रख दिया।
“माँ जी, पापा जी… आप मत रोइए। आप हार नहीं गए, आप जीत गए हैं। आपने आज धर्म को चुना है, मोह को नहीं। महाभारत में भी तो भीष्म और द्रोण यही गलती कर गए थे, उन्होंने पुत्र मोह और सिंहासन के लिए अधर्म का साथ दिया था। लेकिन आपने… आपने आज साबित कर दिया कि संस्कार खून के रिश्तों से बड़े होते हैं।”
दीनानाथ जी ने कांपते हाथों से अनघा के सिर पर हाथ रखा। “बेटी, हमें माफ करना। हमारी ही खून ने तुझे इतना दर्द दिया। हम तुझे वो खुशियां नहीं दे पाए जिसका वादा करके तुझे ब्याह कर लाए थे।”
“नहीं पापा जी,” अनघा ने सिसकते हुए कहा, “दुनिया में कौन से सास-ससुर अपनी बहू के लिए अपने सगे बेटे को त्याग देते हैं? मुझे पति का सुख नहीं मिला, पर मुझे ऐसे माता-पिता मिले जिन्होंने मुझे बेटी से बढ़कर माना। अब मैं काम करूँगी। मैंने बी.एड. किया है, मैं स्कूल में पढ़ाऊँगी। मैं आरव को पालूँगी और आपका सहारा बनूँगी। हम तीनों मिलकर इस घर को फिर से ‘घर’ बनाएंगे।”
सावित्री देवी ने अनघा को गले लगा लिया। “हाँ मेरी बच्ची। अब तू ही हमारा बेटा है। वह नालायक तो चला गया, पर अपने पीछे अपनी जिम्मेदारी छोड़ गया। अब यह घर आंसुओं से नहीं, तेरे स्वाभिमान से चलेगा।”
बाहर बारिश शुरू हो गई थी। रोहन गेट के बाहर खड़ा भीग रहा था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह कहाँ जाए। और अंदर, एक बूढ़ा दंपत्ति और उनकी बहू अपनी टूटी हुई दुनिया को फिर से समेटने की कोशिश कर रहे थे। दर्द गहरा था, घाव ताजा थे, लेकिन हवा में एक अजीब सी पवित्रता थी—सत्य और न्याय की पवित्रता।
उस रात दीनानाथ जी ने खाने की मेज पर अनघा से कहा, “बहू, कल सुबह वकील को बुलाना। वसीयत के साथ-साथ, मैं चाहता हूँ कि तू आरव के नाम से एक नई एफडी शुरू करे। मेरी पेंशन का आधा हिस्सा अब से हर महीने तेरे खाते में जाएगा। तुझे किसी के आगे हाथ फैलाने की जरूरत नहीं है।”
अनघा ने पानी का गिलास भरकर दीनानाथ जी को दिया। उसकी आंखों में अब भय नहीं था। उसे पता था कि रास्ता कठिन है, एक अकेले माँ (single mother) का सफर आसान नहीं होगा, लेकिन उसके सिर पर एक ऐसी छत थी जो तूफानों में भी नहीं हिली थी।
रोहन का जाना एक अंत नहीं, बल्कि एक नई सुबह की शुरुआत थी। एक ऐसी सुबह जहाँ रिश्तों की कीमत प्यार और सम्मान से आंकी जाती थी, न कि खून के संबंधों से। दीनानाथ जी ने उस दिन समाज को एक मूक संदेश दिया था—कि जब औलाद नासूर बन जाए, तो उसे शरीर से अलग कर देना ही परिवार को बचाने का एकमात्र उपाय है।
घर के मंदिर में दिया जल रहा था। उसकी लौ स्थिर थी, बिल्कुल अनघा के विश्वास की तरह।
