उस रात देर से, खिड़की से ठंडा कोहरा अंदर आने लगा। लिविंग रूम से आ रही हल्की, पीली रोशनी छोटे से किचन में फैल रही थी, जहाँ खाने और चिकनाई की तेज़ गंध बनी हुई थी। हान, एक औरत जिसने दो हफ़्ते से भी कम समय पहले बच्चे को जन्म दिया था, बड़े से सिंक के पास खड़ी थी। उसने अपने पति, क्वोक को अपने दोस्तों के साथ हँसते और बातें करते हुए देखा, जबकि गिलासों की खनक ज़ोर-ज़ोर से गूँज रही थी, मानो उसकी थकान और उसे घेरे हुए गुस्से को चुनौती दे रही हो।
“जल्दी करो और खत्म करो, देर हो गई है! हमें अभी भी यह लड़ाई जारी रखनी है!” क्वोक चिल्लाया, शराब के नशे में उसकी आवाज़ थोड़ी लड़खड़ा रही थी। वह मुड़ी नहीं, बस बिना पैसे वाली नौकरानी की तरह हाथ हिलाकर मना कर दिया।
हान ने डिश टॉवल को कसकर पकड़ लिया, और अपने नाखूनों को अपनी हथेलियों में गड़ा लिया। उसे अभी अपने कमरे में होना चाहिए था, अपने नए जन्मे बच्चे को गर्माहट दे रही थी, न कि तीन भारी खाने और बर्तनों के ढेर से निपट रही थी। उसके ब्रेस्ट सूजे हुए और दर्द कर रहे थे। लेकिन वह शारीरिक दर्द उसके दिल के दर्द के सामने कुछ भी नहीं था।
“क्वोक, मैंने… मैंने अभी-अभी बच्चे को जन्म दिया है, डॉक्टर ने कहा है कि मुझे आराम करने की ज़रूरत है,” हान ने अपनी आवाज़ शांत रखने की कोशिश की, भले ही उसके सीने में आग लगी हो। उसने डाइनिंग टेबल पर खाली कुर्सी की ओर देखा जहाँ उसे बैठना चाहिए था। “तुमने मुझे आराम करने का वादा किया था।”
क्वोक के दोस्त, थैंग ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा, “ओह, क्वोक की पत्नी एक बिगड़ी हुई राजकुमारी है, है ना? उसका सिर्फ़ एक बच्चा हुआ है और वह ऐसे बर्ताव कर रही है जैसे अभी-अभी युद्ध से लौटी हो। हम जैसी औरतें बच्चे को जन्म देने के तुरंत बाद पानी ढोती थीं और चावल पकाती थीं। वह यहाँ सिर्फ़ दो हफ़्ते से है और वह पहले से ही शिकायत कर रही है? क्या उसकी कीमती सेहत सच में इतनी कीमती है?”
क्वोक भी हँसी में शामिल हो गया, एक जंगली, डरावनी हँसी जो हान के दिल में चाकू की तरह चुभ गई। “हाँ, हान। अपनी तरफ देखो। थांग सही कह रहा है। बच्चे पैदा करना तुम्हारा काम है, लेकिन दोस्तों को एंटरटेन करना मेरी इज़्ज़त है। औरतों को होशियार रहना चाहिए, छोटी-छोटी बातों का हिसाब नहीं लगाना चाहिए। किचन में जाओ और खाओ; नीचे टेबल पर अभी भी कुछ स्टिर-फ्राइड रिब्स रखी हैं। मैंने तुम्हारे लिए सबसे अच्छी बचाकर रखी हैं।” हान ने किचन के कोने की तरफ देखा, जहाँ एक पुरानी लकड़ी की टेबल रखी थी, जिस पर हड्डियों से ढके ठंडे, चिकने खाने के टुकड़े बिखरे पड़े थे। उसकी आँखों में आँसू आ गए, गर्म और नमकीन, लेकिन उसने खुद को रोकने की कोशिश की। वह उन बेरहम लोगों के सामने रोना नहीं चाहती थी।
“तुमने कहा था कि तुम मुझे प्रायोरिटी दोगे?” हान ने अपना सिर उठाया, उसकी नज़र ठंडी और चुभने वाली थी, उसमें हमेशा की तरह कमज़ोरी नहीं थी। “तुम इसे मुझे प्रायोरिटी देना कहते हो, क्वोक? जब मैं और मेरा बेटा ज़िंदगी और मौत के बीच थे, तो तुम अपने दोस्तों को घर ले आए, मुझसे खाना बनवाया, और फिर बचा हुआ खाना खाने के लिए मुझे किचन में ले गए। क्या तुम भूल गए कि तुम्हारा बेटा ऊपर है, या तुम सबको दिखाना चाहते हो कि तुम कितने अच्छे पति हो?”
थैंग ने बीयर का एक घूंट लिया, उसकी आँखें नफरत से जल रही थीं और उसने हान को घूरा। “तुम कैसी अजीब बातें कर रहे हो? बचा हुआ खाना खाने में क्या बुराई है? ज़्यादा से ज़्यादा, इससे तुम्हारा मुँह गंदा होगा, पेट नहीं! तुम ऐसे बर्ताव कर रही हो जैसे तुम्हारा पति कोई पुराना क्रिमिनल हो। या तुम ज़िंदगी भर रानी बनना चाहती हो?” याद रखना, तुम एक हाउसवाइफ हो। तुम्हें अपने पति का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उन्होंने तुम्हारा गुज़ारा करने के लिए पैसे कमाए।
क्वोक खड़ा हुआ, हान के पास गया, और टेबल पर हाथ पटका, जिससे बर्तन खड़खड़ाने लगे। उसने दाँत भींच लिए। “मैंने तुम्हें इस टोन में बात करने से मना किया है! क्या तुम मेरे दोस्तों के सामने मुझे शर्मिंदा करना चाहते हो? मैं तुमसे कह रहा हूँ, किचन में जाओ, खाना खाओ, और ये बर्तन धो लो। जब तुम्हारा काम हो जाए, तो अपने कमरे में जाकर सो जाओ। हमें और परेशान मत करो। अगर तुम नहीं…” वह रुका, हान को ऊपर से नीचे तक ठंडी नज़र से देखते हुए, “…मैं तुम्हें दिखाऊंगा कि बेइज्जत होने का क्या मतलब होता है।”
हान एक कदम पीछे हटी, उसका दिल टूट गया। वह क्वोक की बेरहमी और मतलबीपन समझती थी, लेकिन उसने कभी नहीं सोचा था कि यह इतनी हद तक पहुँच जाएगा, ठीक उसके बच्चे को जन्म देने के बाद। वह मुड़ी, ठंडे चावल गटकते हुए, इस भयानक काम को पूरा करने की ताकत जुटाने की कोशिश कर रही थी। आँसू अभी भी उसके चेहरे से बह रहे थे, बर्फीले सिंक पर गिर रहे थे।
उसी पल, सामने का दरवाज़ा खुला। एक सुंदर फिगर और बहुत अच्छे से स्टाइल किए हुए बालों वाली एक औरत अंदर आई। वह मिसेज़ बिच थीं, हान की सास। वह अभी-अभी एक बिज़नेस ट्रिप से लौटी थीं और अपनी बहू की डिलीवरी के बारे में सुनकर दौड़कर आईं।
मिसेज़ बिच दरवाज़े पर ही जम गईं, उनकी नज़रें उनके सामने के नज़ारे पर टिकी थीं: लिविंग रूम खाली बीयर की बोतलों और बिखरे हुए खाने के टुकड़ों से भरा था; क्वोक और उसके दोस्त खुशी-खुशी हंस रहे थे और बातें कर रहे थे; और हान, जिसका चेहरा दुबला-पतला था और उसकी ढीली मैटरनिटी ड्रेस पर अभी भी चिकनाई लगी थी, बड़े से सिंक पर झुकी हुई थी।
कमरे का माहौल जम गया। अचानक, क्वोक की हंसी बंद हो गई, और उसके दोस्त चुप हो गए।
क्वोक हकलाते हुए बोला, “माँ… माँ वापस आ गई? तुमने मुझे क्यों नहीं बताया?”

ठंडी रात की धुंध अब दिल्ली के बाहरी इलाके में बसे उस बड़े से घर की खिड़कियों से भीतर घुसने लगी थी। ड्राइंग रूम की पीली रोशनी रसोई तक फैल रही थी, जहाँ तेल और मसालों की तीखी गंध अब भी हवा में तैर रही थी।
अनन्या—जिसे अभी-अभी माँ बने हुए मुश्किल से दस दिन हुए थे—भारी स्टील के सिंक के पास खड़ी थी। उसका शरीर अभी भी कमज़ोर था, कमर में लगातार दर्द बना हुआ था, और सीने में दूध का असहनीय दबाव था। फिर भी उसके हाथ काँपते हुए बर्तन माँज रहे थे।
वह बीच-बीच में ड्राइंग रूम की ओर देख लेती, जहाँ उसका पति राहुल शर्मा अपने दोस्तों के साथ ज़ोर-ज़ोर से हँस रहा था। शराब के गिलासों की टकराहट उसके कानों में हथौड़े की तरह बज रही थी।
“जल्दी करो अनन्या!”
राहुल ने नशे में लड़खड़ाती आवाज़ में चिल्लाया।
“अभी रात लंबी है, दोस्तों के साथ जश्न जारी रहेगा!”
उसने पलटकर भी नहीं देखा। बस ऐसे हाथ हिलाया जैसे किसी नौकरानी को इशारा कर रहा हो।
अनन्या ने रसोई का कपड़ा इतनी ज़ोर से पकड़ा कि उसकी उंगलियाँ सफ़ेद पड़ गईं।
उसे इस वक्त ऊपर अपने कमरे में होना चाहिए था—अपने नवजात बेटे आरव को सीने से लगाए, उसे गर्माहट दे रही होती।
लेकिन आज…
आज उसे तीन भारी-भरकम खाना बनवाया गया था।
आज उसे सबके सामने अलग बैठकर खाने को मजबूर किया गया था।
आज उसे माँ बनने की सज़ा दी जा रही थी।
“राहुल…”
उसकी आवाज़ थरथरा रही थी, लेकिन उसने खुद को संभाला।
“डॉक्टर ने कहा है मुझे आराम की ज़रूरत है। मैं अभी-अभी डिलीवरी से निकली हूँ…”
राहुल का दोस्त विक्रम हँस पड़ा।
“अरे भाई, तुम्हारी बीवी तो बड़ी नाज़ुक निकली! बस एक बच्चा पैदा किया है, ऐसे बोल रही है जैसे जंग जीतकर आई हो।”
“हमारी माँ-दादी तो खेतों में काम करती थीं, बच्चे के अगले दिन ही चूल्हा फूँक देती थीं!”
सारे लोग हँस पड़े।
राहुल ने भी वही हँसी दोहराई—वही ठंडी, बेरहम हँसी जो अनन्या के दिल को चीर गई।
“देखा अनन्या,”
राहुल बोला,
“औरत का काम ही यही होता है—बच्चा पैदा करना और घर संभालना। दोस्तों की खातिरदारी मेरा सम्मान है।”
उसने रसोई की कोने वाली छोटी सी मेज़ की ओर इशारा किया, जहाँ ठंडा पड़ा खाना, हड्डियाँ और जूठन बिखरी पड़ी थीं।
“वहीं बैठकर खा लो। तुम्हारे लिए छोड़ दिया है।”
अनन्या की आँखें भर आईं, लेकिन उसने आँसू नहीं गिरने दिए।
“क्या इसे तुम प्राथमिकता कहते हो, राहुल?”
उसकी आवाज़ अचानक ठंडी और स्थिर हो गई।
“जब मैं और मेरा बच्चा मौत से जूझकर लौटे, तुम दोस्तों के साथ शराब पी रहे थे।”
“मुझे खाना बनवाया, फिर जूठन खाने भेज दिया।”
“ऊपर तुम्हारा बेटा रो रहा है—या तुम्हें यह दिखाने में ज़्यादा दिलचस्पी है कि तुम कितने ‘मर्द’ हो?”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
विक्रम ने तंज कसा,
“इतना ड्रामा क्यों? जूठन खाने से पेट थोड़े खराब हो जाता है!”
“याद रखो, तुम घर में बैठकर खाती हो। तुम्हारा पति कमाता है।”
राहुल गुस्से से उठा, मेज़ पर ज़ोर से हाथ मारा।
“बस!”
“मेरे दोस्तों के सामने ज़बान मत चलाओ।”
“खाना खाओ, बर्तन धोओ और चुपचाप सो जाओ।”
“वरना…”
उसकी आँखों में खतरनाक ठंडक थी।
अनन्या पीछे हट गई।
उसका दिल टूट चुका था।
उसी पल—
दरवाज़ा ज़ोर से खुला।
एक सधी हुई, गरिमामयी महिला भीतर दाख़िल हुई।
साफ़ साड़ी, सख़्त लेकिन शांत चेहरा।
श्रीमती सुधा शर्मा।
राहुल की माँ।
व्यापार यात्रा से लौटी थीं।
बहू के प्रसव की ख़बर मिलते ही सीधे घर आई थीं।
उन्होंने जो दृश्य देखा, वह उनके भीतर आग बनकर फैल गया।
बिखरी शराब की बोतलें।
हँसते-मुस्कुराते मर्द।
और रसोई में झुकी, थकी, पीली पड़ी उनकी बहू—जिसने अभी-अभी वंश को आगे बढ़ाया था।
कमरे की हँसी जैसे जम गई।
“माँ…”
राहुल हकलाया।
“आप… आपने बताया क्यों नहीं?”
श्रीमती सुधा ने कुछ नहीं कहा।
सीधे रसोई में गईं।
अनन्या को अपने सीने से लगा लिया।
“बेटा…”
उनकी आवाज़ काँप रही थी,
“तुम्हें यहाँ खड़ा होना ही नहीं चाहिए था।”
अनन्या पहली बार फूट-फूट कर रो पड़ी।
सुधा जी ने धीरे-धीरे उसका माथा सहलाया, फिर सीधा होकर राहुल की ओर देखा।
वह नज़र…
किसी अदालत के फ़ैसले से कम नहीं थी।
“राहुल,”
उन्होंने शांत स्वर में कहा,
“आज से इस घर में कुछ नियम बदलेंगे।”
उन्होंने अपने मैनेजर को फ़ोन किया।
“कल सुबह से—
इस घर की सारी ज़िम्मेदारी तुम्हारी पत्नी की नहीं, तुम्हारी होगी।”
फिर उन्होंने राहुल के दोस्तों की ओर देखा।
“और आप सब…”
“अभी इस घर से जाइए।”
कोई विरोध नहीं हुआ।
अगली सुबह—
राहुल को एहसास हुआ कि उसकी ज़िंदगी पलट चुकी है।
माँ ने उसकी बैंक कार्ड अपने पास रख ली।
घर का पूरा ख़र्च, बच्चे की देखभाल, डॉक्टर के चक्कर—सब राहुल की ज़िम्मेदारी।
अनन्या को आराम दिया गया।
माँ-बेटे को ऊपर वाले कमरे में सुकून मिला।
हफ्ते बीते।
राहुल पहली बार समझ रहा था—
रात-रात भर जागना क्या होता है।
बच्चे का रोना क्या होता है।
शरीर टूटने का मतलब क्या होता है।
एक रात—
वह अनन्या के कमरे के बाहर खड़ा था।
आँखों में आँसू थे।
“मुझे माफ़ कर दो…”
उसने धीमी आवाज़ में कहा।
“मैं आदमी बनना भूल गया था।”
अनन्या ने कुछ नहीं कहा।
बस अपने बेटे को और कसकर पकड़ लिया।
समय लगा।
लेकिन बदलाव सच्चा था।
कुछ महीनों बाद—
अनन्या ने फिर से पढ़ाई शुरू की।
माँ-सास उसके साथ खड़ी रहीं।
राहुल ने अपनी गलती स्वीकार की—सिर्फ़ शब्दों में नहीं, कर्मों में।
और एक दिन—
जब किसी ने पूछा,
“तुमने सबसे बड़ा सबक कहाँ सीखा?”
राहुल ने जवाब दिया—
“जिस दिन मैंने अपनी पत्नी को कमज़ोर समझा था…
उसी दिन मेरी माँ ने मुझे आईना दिखाया।”
