हर सुबह वही नर्क दोहराया जाता था। मेरा पति, अजय, मुझे आँगन के बीचों-बीच घसीट लाता और ऐसे पीटता जैसे उसकी मर्दानगी का सबूत मेरे शरीर पर ही लिखा जाना चाहिए।
एक ही ताना, एक ही ज़हर:
“मैंने तुम्हें घर की बहू इसलिए बनाया था कि तुम मुझे बेटा दो — और तुमसे ये भी नहीं हो पाया!”

पहले थप्पड़।
फिर लात।
फिर मुक्के।
अंत में वो वार… जिनके बाद शरीर सुन्न हो जाता था।
पड़ोसी सब जानते थे।
पर परदे खींचकर चुप हो जाते थे।
सास जी मंदिर के कमरे में बैठकर बस मंत्र जपती रहती थीं, जैसे मेरी चीखें उनका धर्म भंग कर देंगी।
और मैं?
मैं हर दिन बस यही सोचती थी —
“कब खत्म होगा ये सब?”
मेरी दो बेटियाँ थीं।
और इस घर में बेटियाँ पैदा करना…
मानो मेरे सीने पर “अपराध” खुदा हो।
उस सुबह भी कुछ अलग नहीं था।
अजय दगाबाज़ी और गालियाँ बकते हुए मुझ पर बरस रहा था।
एक पल में ही कान बजने लगे…
नज़र धुँधली हो गई…
और मैं धड़ाम से आँगन में गिर पड़ी — बेहोश।
जब आँख खुली, मैं स्ट्रेचर पर थी।
अजय डॉक्टर से बड़े ही मीठे स्वर में झूठ बोल रहा था:
“मेरी पत्नी… सीढ़ियों से गिर गई।”
मैंने पलकें बंद कर लीं।
बोलने की ताकत नहीं बची थी।
डॉक्टर ने गंभीर चोट की आशंका में मुझे कई जाँचों से गुज़ारा।
ठंडी सफ़ेद रोशनी में मेरी हड्डियों की हर दरार साफ़ दिखाई दे रही थी।
लगभग एक घंटे बाद डॉक्टर ने अजय को बाहर बुलाया।
मैं अंदर थी… लेकिन आवाज़ें दीवारों को भेदकर मेरे कानों तक पहुँच रही थीं।
डॉक्टर की आवाज़ असामान्य रूप से धीमी थी:
“मिस्टर अजय, कृपया अंदर आइए… ये रिपोर्ट आपको खुद देखनी होगी।”
चंद पलों की खामोशी।
फिर दरवाज़ा अचानक धक् से खुला।
अजय अंदर आया —
चेहरा बिल्कुल सफ़ेद…
हाथ काँप रहे…
और उसकी उँगलियों में X-ray की फिल्म लगभग फिसल रही थी।
उसकी आँखें मुझ पर जमी थीं —
डर, सदमा, और कुछ ऐसा…
जो मैंने उससे पहले कभी नहीं देखा था।
डॉक्टर पीछे खड़े थे।
उन्होंने बेहद स्पष्ट, ठंडी आवाज़ में कहा:
“…रिपोर्ट में जो दिख रहा है, उसे सुनकर आपको संभलकर बैठना पड़ेगा।”
मैंने आँखें खोली।
अजय का गला सूख चुका था।
और डॉक्टर ने वो वाक्य बोला —
जिसने एक ही क्षण में हम दोनों की पूरी दुनिया पलट दी…
डॉक्टर ने रिपोर्ट को लाइट बॉक्स पर लगाया। सफ़ेद रोशनी में काली-सी रेखाएँ उभर आईं। कुछ सेकंड तक कमरे में केवल मशीनों की हल्की बीप सुनाई देती रही। फिर डॉक्टर ने बहुत शांत, लगभग निर्विकार आवाज़ में कहा, “श्रीमती… एक और जाँच में जो सामने आया है, उसे सुनने के लिए आप तैयार रहिए।”
अजय का गला सूख गया। वह कुर्सी की पीठ पकड़कर खड़ा रहा। मैंने उसकी ओर देखा—पहली बार उसकी आँखों में डर था, वही डर जो सालों से मेरी आँखों में रहता आया था।
“आप गर्भवती हैं,” डॉक्टर ने कहा।
कमरे की हवा जैसे जम गई।
अजय ने हँसी दबाने की कोशिश की—एक अजीब, खोखली हँसी। “डॉक्टर साहब, आप मज़ाक कर रहे हैं?”
डॉक्टर ने दूसरी फ़ाइल खोली। “और यह भी सुनिए—यह जुड़वाँ गर्भ है।”
मेरे कानों में शोर गूँज उठा। जुड़वाँ? मैं? जिस शरीर को रोज़ तोड़ा गया, वह शरीर दो ज़िंदगियों को थामे है?
डॉक्टर ने आगे कहा, “अभी पूरी पुष्टि के लिए अल्ट्रासाउंड किया गया है। दोनों भ्रूण स्वस्थ हैं।”
अजय ने अचानक पूछा, “ल… लिंग?”
डॉक्टर ने उसकी आँखों में सीधे देखते हुए कहा, “दोनों लड़के हैं।”
अजय की उँगलियों से X-ray की फ़िल्म फिसलकर ज़मीन पर गिर पड़ी। वह कुर्सी पर बैठ गया, जैसे पैरों से ताक़त खिंच गई हो। उसके होंठ काँप रहे थे। “दो… दोनों?”
“हाँ,” डॉक्टर ने दो टूक कहा।
उस पल मुझे कोई खुशी नहीं हुई। न आँसू आए। मेरे भीतर बस एक सन्नाटा था—गहरा, ठंडा, सख़्त। वही सन्नाटा, जिसमें सालों की चीख़ें दफ़्न थीं।
अजय ने मेरी ओर देखा, पहली बार उसकी आवाज़ टूट रही थी। “सुन… सुन रही हो? भगवान ने… भगवान ने हमें…”
मैंने उसकी बात काट दी। “हमें?”
वह चुप हो गया।
डॉक्टर ने धीरे से कहा, “एक बात और—आपकी चोटें गिरने से नहीं हैं। ये बार-बार की मारपीट के निशान हैं।”
कमरे में खामोशी फिर टूट गई।
अजय ने हड़बड़ाकर कहा, “डॉक्टर साहब, ये सब… घर की बात है।”
डॉक्टर ने सख़्ती से जवाब दिया, “घर की बात नहीं—क़ानून की बात है।”
नर्स अंदर आई। पुलिस को सूचना दी जा चुकी थी।
अजय की साँसें तेज़ हो गईं। उसने मेरी ओर देखा—अब वह डर भीख में बदल रहा था। “मैं बदल जाऊँगा,” उसने फुसफुसाया। “बस… बच्चों के लिए।”
मैंने पहली बार उसकी आँखों में देखकर कहा, “बच्चों के लिए—मैं बदलूँगी।”
पुलिस आई। बयान दर्ज हुए। सास कमरे के बाहर खड़ी रोती रही—वही रोना, जो मेरे दर्द पर कभी नहीं निकला।
अजय को बाहर ले जाया गया। जाते-जाते उसने पीछे मुड़कर देखा। मैं चुप रही।
अगले दिनों में सब कुछ तेज़ी से बदला। मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट आई। अदालत ने अंतरिम संरक्षण दिया। मेरे माता-पिता अस्पताल पहुँचे—मेरी माँ ने मेरा हाथ पकड़ा, बहुत कसकर। “अब ख़त्म,” उसने कहा।
अजय की ज़मानत हुई, पर घर में नहीं—दूरी तय हो चुकी थी।
अल्ट्रासाउंड की अगली तस्वीरों में दो छोटे दिल धड़कते दिखे। डॉक्टर ने समझाया—“आपको आराम चाहिए, सुरक्षा चाहिए।”
मैंने सिर हिलाया। पहली बार मुझे लगा—मेरे भीतर कुछ मज़बूत है।
अजय ने मिलने की इजाज़त माँगी। अदालत ने सीमित मुलाक़ात दी। वह आया—आँखों में पछतावा ओढ़े। “मैंने तुम्हें बहुत दुख दिया,” उसने कहा। “मुझे एक मौक़ा…”
मैंने शांत स्वर में कहा, “मौक़ा मैंने सालों दिया। अब मैं सीमा दूँगी।”
उसने बच्चों का नाम पूछना चाहा।
“नाम मैं तय करूँगी,” मैंने कहा। “और वे नाम याद दिलाएँगे कि सम्मान विरासत में दिया जाता है।”
समय बीता। पेट बढ़ता गया। डर भी आया—पर डर के साथ हिम्मत भी। मैंने पढ़ाई शुरू की—ऑनलाइन। एक छोटा काम लिया। हर शाम बेटियाँ मेरे पेट से बात करतीं—“माँ, हमारे भाई कब आएँगे?”
मैं मुस्कराती—वह मुस्कान, जो दर्द से नहीं, उम्मीद से बनी थी।
अदालत में अंतिम सुनवाई हुई। डॉक्टर की गवाही, रिपोर्टें, पड़ोसियों के बयान—सब सामने आए।
जज ने कहा, “बेटा या बेटी—यह अपराध नहीं। अपराध है हिंसा।”
फ़ैसला आया—तलाक़, संरक्षण, और बच्चों की ज़िम्मेदारी।
अजय बाहर निकला—खामोश।
मैं बाहर निकली—सीधी।
डिलीवरी के दिन बारिश थी। ऑपरेशन थिएटर की रोशनी में दो रोने की आवाज़ें गूँजीं।
“दोनों स्वस्थ,” नर्स ने कहा।
मैंने आँखें बंद कीं—आँसू बहने दिए, पर इस बार वे दर्द के नहीं थे।
मैंने उनके नाम रखे—अर्जुन और नील।
अर्जुन—न्याय के लिए।
नील—शांत आकाश के लिए।
समय के साथ मैं अपने पैरों पर खड़ी हुई। बेटियाँ स्कूल में चमकीं। अर्जुन-नील हँसते-रोते बड़े हुए।
कभी-कभी लोग पूछते—“इतना सहा, फिर भी…”
मैं कहती—“सहना मेरी मजबूरी थी। खड़े होना मेरा चुनाव।”
एक दिन अजय का संदेश आया—“मैं माफ़ी चाहता हूँ।”
मैंने जवाब नहीं दिया।
मैंने बच्चों को देखा—उनकी आँखों में डर नहीं था।
और यही अंत था—
जहाँ बेटों की चाह ने एक घर तोड़ा,
और सम्मान की समझ ने एक औरत को बनाया।
