एक खूबसूरत युवा कॉलेज की छात्रा, जो एक बीयर शॉप में ग्लास धोने का काम करती थी, उसे एक दिन एक डायरेक्टर ने 5000 रुपये टिप दिए और उसका नाम पूछा। ठीक एक हफ्ते बाद, उसकी पत्नी और बेटा उससे मिलने आए और एक ऐसा सच बताया जिसने उसकी रूह तक हिला दी…/HXL

एक खूबसूरत युवा कॉलेज की छात्रा, जो एक बीयर शॉप में ग्लास धोने का काम करती थी, उसे एक दिन एक डायरेक्टर ने 5000 रुपये टिप दिए और उसका नाम पूछा। ठीक एक हफ्ते बाद, उसकी पत्नी और बेटा उससे मिलने आए और एक ऐसा सच बताया जिसने उसकी रूह तक हिला दी…

उस बीयर शॉप में ग्लास धोने वाली लड़की का नाम अनन्या था।

अनन्या दिल्ली की एक यूनिवर्सिटी में तीसरे वर्ष की छात्रा थी। दिन में वह पढ़ाई करती थी, और शाम को करोल बाग की एक सड़क किनारे की बीयर शॉप में ग्लास धोने का काम करती थी। काम बिल्कुल भी आसान नहीं था: ठंडे पानी की वजह से हाथ हमेशा रूखे और जलन भरे रहते, कपड़ों में हमेशा बीयर की बदबू बस जाती, और मेहनताना बस इतना मिलता कि फीस भर सके और उत्तर प्रदेश में अपनी माँ को थोड़ा बहुत भेज सके।

उस रात दुकान खचाखच भरी थी।

एक मध्यम-उम्र का आदमी, सफेद शर्ट, साफ-सुथरी पैंट और महँगी घड़ी पहने, सबसे अंदर की टेबल पर बैठा था। वह ज्यादा नहीं पी रहा था—सिर्फ चुपचाप सबको देख रहा था।

जब अनन्या एक ढेर सारे ग्लास लेकर उसके पास से गुज़री, उसने पुकारा:

“बेटी।”

अनन्या चौंक गई और विनम्रता से बोली:

“जी?”

उसने कुछ पल उसे देखा, फिर मेज़ पर एक गड्डी पैसे रख दिए।

“टिप है। 5000 रुपये।”

अनन्या घबरा गई, हाथ पीछे कर लिए:

“न… नहीं सर, मैं ये नहीं ले सकती।”

वह हल्की मुस्कान के साथ बोला:

“ले लो। तुम्हारी मेहनत की कीमत है।”

फिर उसने बहुत धीमी आवाज़ में पूछा:

“तुम्हारा नाम क्या है?”

“जी… मेरा नाम अनन्या है।”

वह बस सिर हिलाकर चुप हो गया।

उस रात अनन्या हॉस्टल लौटी तो दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। 5000 रुपये उसके लिए पूरे महीने का ख़र्च था। उसने खुद को समझाया कि शायद कोई अमीर और दयालु आदमी रहा होगा।

ठीक एक हफ्ते बाद, जब अनन्या काम से थोड़ी जल्दी निकली, एक काला SUV दुकान के सामने आकर रुकी।

उसमें से एक बेहद ख़ूबसूरत, महँगी साड़ी पहने एक महिला उतरी, साथ में करीब दस साल का एक लड़का था।

महिला ने सीधा पूछा:

“क्या तुम अनन्या हो?”

अनन्या ने सिर हिलाया—दिल अचानक ठंडा पड़ गया।

“हमें बात करनी है।”

वे सड़क के सामने वाली चाय की दुकान में बैठे। महिला अनन्या को कुछ क्षण तक देखती रही, फिर शांत लेकिन ठंडी आवाज़ में बोली:

“क्या तुम्हें उस आदमी की याद है जिसने तुम्हें 5000 रुपये टिप दिए थे?”

अनन्या ने धीरे से सिर हिलाया।

तभी, उसके पास खड़ा लड़का अचानक बोल पड़ा:

“वह मेरे पापा हैं।”

अनन्या स्तब्ध रह गई।

महिला ने अपने बेटे के कंधे पर हाथ रखा और अनन्या की ओर मुड़ी:

“वे मेरे पति हैं। दिल्ली की एक बड़ी कंस्ट्रक्शन कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर।”

अनन्या लगभग घबरा गई:

“मैडम… मेरा उनसे कोई रिश्ता नहीं है। मैं तो बस ग्लास धोती हूँ…”

महिला ने उसकी बात काट दी—आवाज़ और गहरी हो गई—और जो सच उसने आगे बताया, वह तो और भी डरावना था…

महिला ने अनन्या की बात काटते हुए गहरी साँस ली, जैसे कोई बोझिल सच ज़ुबान पर लाने से पहले खुद को संभाल रही हो। “तुम्हें डरने की ज़रूरत नहीं है,” उसने कहा, “लेकिन जो बताने जा रही हूँ, वह आसान नहीं है।” चाय की दुकान में केतली की सीटी बजी, भीड़ का शोर अचानक दूर सा लगने लगा। महिला की आँखें नम थीं। “मेरे पति बीमार हैं—बहुत बीमार। उन्हें कैंसर है। डॉक्टरों ने ज़्यादा समय नहीं दिया।” अनन्या का दिल धक से रह गया। वह कुछ बोल पाती, उससे पहले महिला ने आगे कहा, “पिछले कुछ महीनों से वे अजीब तरह से बेचैन रहते हैं। पुराने पाप, पुराने रिश्ते… सब याद आने लगे हैं।”

लड़का—जिसकी उम्र मुश्किल से दस-ग्यारह रही होगी—अनन्या की ओर देख रहा था, मानो उसे भी कुछ समझ में न आ रहा हो। महिला ने उसके सिर पर हाथ फेरा। “उस रात जब उन्होंने तुम्हें देखा,” वह बोली, “तो घर आकर पहली बार फूट-फूटकर रोए। बोले—‘मुझे वह चेहरा याद है। वही आँखें।’ मैंने सोचा, बीमारी की वजह से भ्रम होगा। लेकिन फिर उन्होंने तुम्हारा नाम पूछा—अनन्या। वही नाम… जो उन्होंने बरसों पहले एक काग़ज़ पर लिखा था, जिसे वे आज तक सीने से लगाए रखते हैं।”

अनन्या का गला सूख गया। “मैडम, आप क्या कहना चाहती हैं?” वह फुसफुसाई। महिला ने सीधा देखा। “मैं सच छिपाना नहीं चाहती। बरसों पहले, कॉलेज के दिनों में, मेरे पति का एक रिश्ता था। एक साधारण लड़की से—उत्तर प्रदेश की। परिवार के दबाव में उन्होंने उसे छोड़ दिया। वह गर्भवती थी।” अनन्या की आँखों के सामने अंधेरा छा गया। माँ की झुकी हुई आँखें, पुराने कमरे की दीवारें, और वे रातें—जब माँ चुपचाप रोती थी—सब एक साथ उमड़ आए। “वह लड़की… मेरी माँ?” अनन्या की आवाज़ काँप गई।

महिला ने सिर हिलाया। “हाँ।” पल भर को चाय की दुकान जैसे थम गई। “वे तुम्हारे पिता हैं।” शब्द हवा में तैरते रहे, जैसे किसी ने समय को रोक दिया हो। अनन्या कुर्सी से उठ खड़ी हुई, हाथ काँपने लगे। “नहीं… यह झूठ है,” उसने कहा, “मेरी माँ ने कभी—” महिला ने धीरे से बीच में रोका। “उन्होंने तुम्हें बचाने के लिए चुप्पी ओढ़ी। तुम्हारे पिता ने कई बार ढूँढने की कोशिश की, लेकिन तब बहुत देर हो चुकी थी। वे डर गए थे—अपने परिवार, समाज, अपनी कमज़ोरी से।”

अनन्या के कानों में माँ की आवाज़ गूँजने लगी—“कुछ सवालों के जवाब समय देता है।” उसकी आँखों से आँसू बह निकले। “तो 5000 रुपये…?” महिला ने कहा, “वह पैसा नहीं था। वह उनका पछतावा था—पहली बार बाहर आया हुआ।” लड़का आगे बढ़ा। “दीदी,” उसने मासूमियत से कहा, “पापा आपको बहुत याद करते हैं।” अनन्या ने बच्चे को देखा—उसकी आँखों में वही चमक थी, जो आईने में कभी-कभी अपनी आँखों में देखती थी। वह बैठ गई, जैसे पैरों से ताक़त निकल गई हो।

कुछ दिनों बाद, अनन्या अस्पताल के कमरे में खड़ी थी। सफ़ेद चादरों के बीच वह आदमी—जिसे उसने बस एक अमीर ग्राहक समझा था—अब बेहद कमज़ोर दिख रहा था। उसने अनन्या को देखा तो आँखें भर आईं। “माफ़ कर दो,” वह फुसफुसाया, “मैं डरपोक था।” अनन्या ने जवाब नहीं दिया। वह बस खड़ी रही। डॉक्टर बाहर गए तो कमरे में सन्नाटा छा गया। “तुम्हारी माँ…” उसने कहना चाहा। अनन्या ने पहली बार बोलते हुए कहा, “मेरी माँ ने मुझे अकेले पाला। हर चोट मुस्कान में छुपाई।” आदमी ने आँखें मूँद लीं। “मैं जानता हूँ। मैं सब ठीक नहीं कर सकता। लेकिन जो बचा है—वह तुम्हारा है।”

अगले हफ्तों में, सच काग़ज़ों पर उतरने लगा। डीएनए रिपोर्ट आई—सच की मुहर। कंपनी के वकील आए। ट्रस्ट बनाया गया—अनन्या और उसकी माँ के नाम। स्कॉलरशिप, घर, इलाज—सब तय हुआ। लेकिन अनन्या के लिए सबसे मुश्किल था माँ से सच कहना। वह गाँव गई। माँ ने बेटी की आँखों में आँसू देखे तो चुपचाप उसे सीने से लगा लिया। “माँ,” अनन्या ने कहा, “वे… मेरे पिता हैं।” माँ ने देर तक कुछ नहीं कहा। फिर बस इतना बोली, “मैंने तुम्हें इसलिए मज़बूत बनाया था कि सच तुम्हें तोड़ न दे।”

अस्पताल में आख़िरी मुलाक़ात में, आदमी ने अनन्या का हाथ पकड़ा। “मैं तुम्हें अपना नाम नहीं दे पाया,” उसने कहा, “पर अपनी ज़िम्मेदारी देना चाहता हूँ।” अनन्या ने धीरे से हाथ नहीं खींचा। “नाम से ज़्यादा ज़रूरी काम होते हैं,” उसने कहा। आदमी मुस्कुराया—शायद पहली बार सुकून से। कुछ दिनों बाद वह चला गया। ख़बर आई तो अनन्या रोई—ग़ुस्से से नहीं, थकान से। जैसे कोई अधूरा चक्र बंद हो गया हो।

समय बदला। अनन्या ने पढ़ाई पूरी की। उसी कंपनी के एक सामाजिक प्रोजेक्ट में काम करने लगी—जहाँ मज़दूरों के बच्चों की पढ़ाई का इंतज़ाम था। वह हर महीने गाँव जाती, माँ के साथ चाय पीती। कभी-कभी, वह बीयर शॉप के सामने से गुज़रती तो हाथों की रूखाई याद आ जाती—और दिल में यह भी कि मेहनत बेकार नहीं जाती। उस महिला—जो अब उसकी सौतेली माँ नहीं, बस एक इंसान थी—से उसका रिश्ता सम्मान का बन गया। लड़का उसे “दीदी” कहकर पुकारता रहा।

एक शाम, अनन्या ने अपनी माँ से कहा, “अगर वे पहले लौट आते…” माँ मुस्कुराई। “तब तुम शायद इतनी मज़बूत न बनती।” अनन्या ने समझ लिया—ज़िंदगी देर से भी न्याय कर सकती है, बशर्ते इंसान सच का सामना करे। कहानी का अंत किसी महल में नहीं, बल्कि एक साधारण घर की छत पर हुआ—जहाँ माँ-बेटी ने सितारों को देखते हुए चाय पी, और यह जाना कि जिम्मेदारी देर से भी ली जाए, तो दर्द कम नहीं होता—पर भविष्य बेहतर हो सकता है। यही सबक था: पैसे से नहीं, साहस से रिश्ते जुड़ते हैं; और सच चाहे जितना कड़वा हो, अंततः वही उपचार है।

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