टर्मिनल कैंसर से पीड़ित पत्नी को पति ने रखैल के लिए छोड़ दिया: वकील की वसीयत की घोषणा के साथ एक कड़वा अंत।
पति ने टर्मिनल कैंसर से पीड़ित पत्नी को छोड़ दिया, पत्नी की सबसे अच्छी दोस्त के साथ अफेयर था; पत्नी की मौत के दिन, जब वकील ने वसीयत पढ़ी तो वह हैरान रह गया।

उस दिन, कैंसर हॉस्पिटल की पांचवीं मंज़िल का कमरा ग्रे सन्नाटे में डूबा हुआ था। बाहर हल्की बारिश हो रही थी, और अंदर, एक कमज़ोर औरत बिस्तर पर सिकुड़ी हुई थी, उसकी धँसी हुई आँखें दरवाज़े को घूर रही थीं – जैसे किसी ऐसे साये का इंतज़ार कर रही हो जो कई दिनों से वापस नहीं आया हो…
अनन्या सिर्फ़ 42 साल की थी। उसके पास अपने परिवार की देखभाल करने और अपना छोटा सा सपना पूरा करने के लिए कई साल थे: शहर में कहीं फूलों की दुकान खोलना। लेकिन बेरहम ओवेरियन कैंसर ने उसे लगातार दर्द से परेशान कर रखा था, और वह सपना दिन-ब-दिन धीरे-धीरे धुंधला होता जा रहा था। पिछले तीन महीनों से, वह हॉस्पिटल में भर्ती थी; उसका शरीर इतना कमज़ोर हो गया था कि ऐसा लग रहा था जैसे उसका मांस उसकी हड्डियों से चिपक गया हो। हर शाम, डूबता हुआ सूरज खिड़की से चमकता था, उसके पीले चेहरे को रोशन करता था और उसकी आँखों में तड़प को और गहरा करता था—एक औरत की तड़प जो अपने आखिरी दिनों का सामना कर रही हो।
अनन्या का पति, राहुल, शुरू में उसकी देखभाल करने आता था, लेकिन धीरे-धीरे काम का बहाना बनाने लगा। एक दिन, अनन्या ने नर्सों के बीच बातचीत सुन ली—और पता चला कि राहुल का काव्या के साथ अफेयर चल रहा है, जो अनन्या की स्कूल की सबसे अच्छी दोस्त थी। यह सच उसके दिल पर एक तेज़ चाकू की तरह चुभ गया। काव्या हॉस्पिटल में उसके शुरुआती दिनों में अक्सर उससे मिलने आती थी, उसे दिलासा देती थी और हिम्मत देती थी। लेकिन जैसे-जैसे राहुल का आना कम होता गया, वैसे-वैसे काव्या का भी आना कम होता गया—अब सिर्फ़ अच्छे मैसेज ही बचे थे। अनन्या सब समझती थी। दर्द बर्दाश्त से बाहर था, फिर भी वह चुप रही। इमोशनल दर्द—धोखे का दर्द—शारीरिक दर्द से भी ज़्यादा गहरा था।
हर दिन, अनन्या नर्स से खिड़की खोलने के लिए कहती थी ताकि वह ताज़ी हवा में साँस ले सके। वह मुस्कुराई और बोली, “मुझे थोड़ी देर और धूप और बारिश की खुशबू लेने दो… ताकि जब मैं चली जाऊं, तो ये सारी यादें मेरे साथ रहें।”
लोगों को लगता था कि वह कमज़ोर और टूटी हुई है, लेकिन अंदर ही अंदर वह शांत और मज़बूत थी। उसने चुपचाप इंतज़ाम करना शुरू कर दिया। उसने अपने पिता के एक पुराने दोस्त – जो वकील था – से अपनी वसीयत का ड्राफ़्ट बनाने को कहा। उसने हर शब्द और बात ध्यान से चुनी—अपने लिए नहीं, बल्कि अपनी सत्रह साल की बेटी, आशा के लिए।
आशा अपने यूनिवर्सिटी एंट्रेंस एग्ज़ाम की तैयारी कर रही थी और अक्सर अपनी माँ से हॉस्पिटल में मिलने जाती थी। वह अपनी माँ से बहुत प्यार करती थी, लेकिन इस दर्द का पूरा बोझ उठाने के लिए बहुत छोटी थी। अनन्या ने बस अपनी बेटी से कहा, “मुझसे वादा करो—ज़िंदगी में हमेशा ईमानदार रहो, कभी नफ़रत मत रखो, कभी बदला मत लो। मुझे तुम पर विश्वास है।”
आशा फूट-फूट कर रोने लगी और सहमति में सिर हिलाया।
अन्या ने अपनी बेटी को देखा, फिर मुँह फेर लिया—ताकि कोई उसकी आँखों के कोनों में उमड़ते गर्म आँसू न देख ले। वह जानती थी कि सफ़र लंबा नहीं होगा, लेकिन वह शांति से निकल जाएगी—क्योंकि वह तैयार थी…
उस रात अनन्या को पहली बार लगा कि दर्द अब उसके शरीर से निकलकर किसी और ही जगह चला गया है—सीधे उसके दिल के बीचों-बीच। मॉर्फ़ीन की हल्की खुराक के बावजूद वह जाग रही थी। घड़ी की टिक-टिक, मॉनिटर की बीप और बाहर बारिश की आवाज़ मिलकर जैसे समय को रोक रही थीं। तभी दरवाज़ा धीरे से खुला। नर्स नहीं थी—राहुल था। बाल बिखरे, आँखों में अपराधबोध और जल्दबाज़ी की परछाईं।
“अनन्या…” उसने नाम लिया, जैसे अब भी कोई अधिकार बचा हो।
अनन्या ने आँखें खोलीं। उसकी आवाज़ कमज़ोर थी, पर शब्द सीधे और साफ़ थे। “तुम देर से आए हो। शायद अब ज़रूरत भी नहीं।”
राहुल ने बिस्तर के पास कुर्सी खींची। “मैं… मैं बस कहना चाहता था कि मुझे अफ़सोस है। हालात मुश्किल थे।”
अनन्या मुस्कुराई—वो मुस्कान जो दर्द से ज़्यादा सच्ची थी। “मुश्किल हालात नहीं, राहुल। मुश्किल इंसान होता है। और इंसान अपने चुनावों से बनता है।”
राहुल कुछ कहना चाहता था, लेकिन शब्द गले में अटक गए। उसी पल अनन्या ने धीरे से जोड़ा, “आशा के बारे में सोचते रहना। वही तुम्हारी असली ज़िम्मेदारी है।”
वह चुपचाप चला गया। उस रात अनन्या ने नर्स से काग़ज़-कलम मंगवाया। काँपते हाथों से उसने आख़िरी चिट्ठी लिखी—काव्या के नाम। उसमें न गुस्सा था, न बदला—बस सच। “तुम मेरी दोस्त थीं। दोस्ती का अर्थ था—मेरे दर्द में मेरे साथ खड़े रहना। तुमने रास्ता चुना। मैं भी चुन रही हूँ—माफ़ी और सच्चाई।”
दो दिन बाद, सुबह की धूप खिड़की से अंदर आई। अनन्या ने आँखें खोलीं, आशा का हाथ पकड़ा और धीमे से बोली, “डरो मत। सच हमेशा रास्ता बना लेता है।” और फिर, जैसे किसी ने धीरे से पर्दा गिरा दिया हो—वह चली गई।
अंतिम संस्कार सादगी से हुआ। राहुल दूर खड़ा रहा। काव्या आई नहीं। तीन दिन बाद, वकील के दफ़्तर में वसीयत पढ़ी जानी थी। कमरे में राहुल, काव्या, आशा और कुछ रिश्तेदार बैठे थे। हवा भारी थी।
वकील ने पढ़ना शुरू किया। “मेरी सारी चल-अचल संपत्ति—घर, बचत, निवेश—मेरी बेटी आशा के नाम।” राहुल का चेहरा सख़्त हो गया। काव्या ने नज़रें झुका लीं। वकील रुका, फिर बोला, “मेरे पति राहुल के लिए—एक शर्त के साथ—एक ट्रस्ट। जब तक वह आशा की पढ़ाई पूरी नहीं कराता और हर महीने उसके साथ निर्धारित समय नहीं बिताता, उसे कोई लाभ नहीं मिलेगा।”
राहुल सन्न रह गया। “शर्त?”
वकील ने आगे पढ़ा, “यदि शर्तों का उल्लंघन हुआ, तो ट्रस्ट स्वतः समाप्त होकर सारी राशि कैंसर रिसर्च फ़ाउंडेशन और एक सरकारी फूलों की दुकान प्रशिक्षण कार्यक्रम को दान हो जाएगी।”
कमरे में फुसफुसाहट हुई। काव्या ने राहत की साँस ली, मानो वह बच गई हो। तभी वकील ने आख़िरी पन्ना खोला। “काव्या के लिए—एक लिफ़ाफ़ा।”
काव्या के हाथ काँप रहे थे। उसने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर वही चिट्ठी थी—और एक यूएसबी। वकील ने कहा, “अनन्या चाहती थीं कि यह यहाँ सुना जाए।”
यूएसबी चला। अनन्या की रिकॉर्ड की हुई आवाज़ गूँजी—कमज़ोर, पर स्थिर। “काव्या, दोस्ती विश्वास होती है। मैंने तुम्हें माफ़ किया है, पर सच से भागना मत। राहुल के साथ जो रिश्ता तुमने चुना—वह तुम्हारी पहचान नहीं बनना चाहिए। अगर तुम साहस दिखाओगी, तो यह चक्र टूट सकता है।”
काव्या रो पड़ी। तभी वकील ने जोड़ा, “और एक और बात। अनन्या ने अपने फ़ोन रिकॉर्ड्स और अस्पताल की सीसीटीवी की कानूनी प्रतियाँ सुरक्षित रखी हैं—केवल इस शर्त पर कि यदि आशा को भविष्य में किसी भी तरह का मानसिक या आर्थिक नुकसान पहुँचा, तो ये सब अदालत में प्रस्तुत किए जाएँगे।”
राहुल का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। वह समझ गया—यह बदला नहीं था; यह सुरक्षा थी।
हफ़्तों बाद, राहुल ने नौकरी बदली, शहर छोड़ा और हर रविवार आशा से मिलने लगा। पहली बार वह सचमुच पिता बना। काव्या ने रिश्ता तोड़ा, काउंसलिंग शुरू की और अनन्या के नाम पर एक स्वयंसेवी समूह में काम करने लगी—जहाँ कैंसर मरीज़ों को भावनात्मक सहारा दिया जाता था।
समय बीता। आशा ने यूनिवर्सिटी में टॉप किया। एक दिन वह माँ की पुरानी डायरी लेकर उसी अस्पताल की खिड़की के पास खड़ी थी। उसने डायरी खोली—अंतिम पन्ने पर लिखा था: “साहस का अर्थ शोर नहीं, शांति है। सच का अर्थ चोट नहीं, सुरक्षा है।”
आशा मुस्कुराई। उसने बाहर बारिश की खुशबू में साँस ली और सोचा—माँ ने मरकर भी सबको जीना सिखाया।
कहानी का सबक साफ़ था: धोखा अँधेरा पैदा करता है, पर सच्चाई रोशनी की तरह रास्ता बनाती है। बदला जला देता है, पर न्याय बचाता है। और प्रेम—जब ईमानदार हो—तो मौत के बाद भी जीवन को दिशा देता है।
