चमत्कार या श्राप? वह लड़की जो 10,000 मीटर की ऊंचाई पर हुए प्लेन क्रैश में बच गई।

चमत्कार या श्राप? वह लड़की जो 10,000 मीटर की ऊंचाई पर हुए प्लेन क्रैश में बच गई।

एयरलाइन SkySaffron की उड़ान संख्या SS142 सुबह 6:40 बजे इंदौर हवाई अड्डे से रवाना हुई। विमान में 112 यात्री और 7 क्रू सदस्य सवार थे, और इसे लगभग दो घंटे बाद तटीय शहर कोणार्क पहुँचना था। उस दिन आसमान साफ़ था, हवा हल्की—सब कुछ मानो शांतिपूर्वक गुजरने वाला हो।

 

आन्या, 25 वर्षीय एयर होस्टेस, अपनी हमेशा की मुस्कान के साथ विमान में दाख़िल हुई। यह उसके करियर का 18वाँ महीना था—एक ऐसा पेशा जिसे वह दिल से अपना सपना मानती थी। वह असाधारण रूप से सुंदर नहीं थी, लेकिन उसकी मुस्कुराती आँखें और नाज़ुक कद-काठी उसे सभी का प्रिय बना देती थीं। सहकर्मी उसे केबिन की “वसंत की चिड़िया” कहा करते थे।

उड़ान भरने के लगभग 45 मिनट बाद, जब विमान 10,200 मीटर से अधिक की ऊँचाई पर क्रूज़ कर रहा था, पीछे की ओर से एक तेज़, चीर देने वाली सीटी-सी आवाज़ गूँजी। अगले ही पल ज़ोरदार धमाका हुआ। विमान बुरी तरह हिलने लगा, यात्री दहशत में चीख़ने लगे। आन्या दीवार से टकराकर गिर पड़ी—उसके हाथ में अभी भी वह ट्रे थी, जिस पर चाय परोसी जानी थी।

आसमान के बीच विमान के दो हिस्सों में बँट जाने का वह पल—वही क्षण था जब उसे लगा कि सब कुछ ख़त्म हो गया है।

लेकिन नहीं…

विस्फोट के बाद के कुछ सेकंड ऐसे थे जैसे समय टूटकर बिखर गया हो। केबिन में हवा दहाड़ती हुई घुसी, ऑक्सीजन मास्क बारिश की तरह नीचे गिरने लगे। हर तरफ चीखें थीं—मदद की गुहार, बच्चों का रोना, लोगों की आख़िरी प्रार्थनाएँ।

“शांत रहिए! मास्क पहनिए!”
त्रिशा की आवाज़ काँप रही थी, लेकिन वह फिर भी चिल्ला रही थी।

वह सीटों के बीच लड़खड़ाती हुई आगे बढ़ी। एक माँ अपने बच्चे को सीने से लगाए रो रही थी।
“मेरे बेटे को बचा लो…”
त्रिशा ने बच्चे के चेहरे पर मास्क ठीक किया।
“उसे देखो, साँस ले रहा है। आप भी पहनिए। अभी हार नहीं मान सकते।”

तभी एक ज़बरदस्त झटका लगा।

धातु की भयानक चरमराहट के साथ विमान का पिछला हिस्सा अलग हो गया।

कुछ लोग… उसी पल आसमान में ग़ायब हो गए।

त्रिशा हवा में उछली। उसे लगा जैसे किसी ने उसके शरीर को खींचकर वापस फेंक दिया हो। उसकी कमर किसी टूटे ढाँचे में फँस गई। दर्द ऐसा था कि साँस रुक गई।

और फिर—अचानक—खामोशी।

इतनी गहरी कि कान बजने लगे।

जब उसने आँखें खोलीं, तो सामने सिर्फ़ बादल थे। नीचे… कुछ भी नहीं।
वह अब पूरे विमान में नहीं थी।
वह सिर्फ़ एक टूटे हुए हिस्से में फँसी हुई थी, जो चमत्कारिक रूप से अभी भी हवा में था।

“कोई है?”
उसकी आवाज़ खुद उसे अजनबी लगी।

कोई जवाब नहीं आया।

कुछ मिनट बाद, उसने एक कराह सुनी। पास ही एक आदमी सीट से लटका हुआ था, चेहरा खून से भरा।
“मैडम… हम ज़िंदा हैं क्या?”
उसकी आँखों में डर नहीं, बल्कि अविश्वास था।

त्रिशा ने निगलकर कहा,
“हाँ… अभी तक।”

तभी कॉकपिट से टूटी-फूटी आवाज़ आई—रेडियो अब भी काम कर रहा था।
“यह कैप्टन अरविंद बोल रहा हूँ… अगर कोई केबिन क्रू सुन रहा है… जवाब दो…”

त्रिशा रो पड़ी।
“सर! मैं हूँ! त्रिशा… पीछे का सेक्शन टूट चुका है… ज़्यादातर लोग…”

कुछ सेकंड की चुप्पी।
फिर भारी आवाज़—
“भगवान… सुनो, त्रिशा। जो भी हो रहा है, तुमने अपना फ़र्ज़ निभा दिया है।”

“नहीं, सर,” उसने काँपती आवाज़ में कहा,
“अभी नहीं।”

तभी एक और झटका लगा। यह हिस्सा भी गिरने लगा।

हवा की गति इतनी तेज़ थी कि शरीर सुन्न होने लगा। उसकी उँगलियाँ फिसल रही थीं। सामने वही आदमी चीख रहा था—
“मुझे छोड़ मत देना!”

त्रिशा ने आख़िरी ताक़त लगाकर उसका हाथ पकड़ा।
“अगर गिरना है,” उसने आँसुओं के बीच कहा,
“तो अकेले नहीं।”

और उसी पल—
नीचे बादलों के बीच, कुछ खुला।

एक पुराना, आधा-फटा हुआ कार्गो पैराशूट।

किसी ने कभी नहीं सोचा था कि वह काम करेगा।

लेकिन आसमान ने उस दिन एक फ़ैसला लिया था।

और ज़मीन पर गिरने से पहले…
किस्मत ने एक बार फिर साँस ली।

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