“यह सोचकर कि मैं एक नौकरानी हूँ, मेरी होने वाली सास ने मुझे 50 मेहमानों के लिए बर्तन धोने के लिए मजबूर किया — लेकिन उसे उम्मीद नहीं थी कि यह ‘शहर की लड़की’ ही थी जिसने आखिरी चाल चली।”
मई ने अपने बॉयफ्रेंड, राहुल, के घर पहली बार जाने के लिए बहुत तैयारी की थी। उसने एक सुंदर और शालीन ‘सलवार-कमीज’ पहनी थी। वह एक शिक्षित परिवार से थी और उसके संस्कार उसके बात करने के तरीके में झलकते थे। लेकिन उसे नहीं पता था कि राहुल के घर वाले उसकी एक “अघोषित परीक्षा” लेने वाले हैं।

उस दिन राहुल के दादाजी का ८०वां जन्मदिन था। पूरे खानदान के लोग आए थे और लगभग ५० थालियों का भव्य भोजन (Feast) तैयार था। पार्टी खत्म होने के बाद, चारों तरफ जूठे बर्तन बिखरे हुए थे। राहुल की माँ ने मई को बुलाया और थोड़े सख्त लहजे में कहा: “देखो बेटा, हमारे यहाँ की बहुएं घर के कामों में हाथ बटाती हैं। ज़रा ये बर्तन साफ करने में मदद कर दो, झिझकने की ज़रूरत नहीं है।”
लेकिन वह “थोड़े” बर्तन नहीं, बल्कि ५० थालियों का पहाड़ था। राहुल की माँ और चाचियाँ दूर खड़ी मुस्कुरा रही थीं, यह देखने के लिए कि “शहर की लड़की” क्या करती है। राहुल ने बोलने की कोशिश की, लेकिन उसकी माँ ने उसे चुप करा दिया।
मई ने कुछ नहीं कहा। उसने शांति से अपना फोन निकाला, कुछ कॉल किए और फिर कहा, “आंटी, मुझे बस १५ मिनट दीजिए।”
तभी गेट पर एक छोटी गाड़ी रुकी। ४ लोग वर्दी में उतरे—वे एक प्रोफेशनल क्लीनिंग सर्विस (Professional Cleaning Service) से थे। वे अपने साथ आधुनिक उपकरण और लिक्विड सोप लाए थे। देखते ही देखते, उन्होंने सारे बर्तन चमका दिए।
मई ने राहुल की माँ से कहा, “आंटी, मैंने प्रोफेशनल सर्विस बुलाई थी। हर थाली के हिसाब से ५० रुपये लगे, कुल २५०० रुपये। मैंने भुगतान कर दिया है। मुझे लगा कि अगर मैं अकेले माँजती तो बहुत समय लगता और शायद उतनी सफाई भी न होती। इस तरह काम भी हो गया और हम सब साथ बैठकर समय भी बिता सकते हैं।”
राहुल के दादाजी, जो सब देख रहे थे, ज़ोर से हँसे और बोले, “शबाश! बात बर्तन धोने की नहीं, समस्या को सुलझाने (Problem Solving) की है। यह लड़की न केवल समझदार है, बल्कि आधुनिक भी है। ऐसी बहू तो आज ही हमारे घर आनी चाहिए, कहीं हाथ से निकल न जाए!”
सब लोग हँसने लगे। राहुल की माँ का गुस्सा गर्व में बदल गया। अब वे अक्सर मई को फोन करती हैं और पूछती हैं, “बेटा, शादी की तारीख कब पक्की करें?”
मई के लिए वह शाम सिर्फ़ एक “इम्तिहान” नहीं थी, बल्कि अपने आत्मसम्मान और सोच की घोषणा थी। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई—असल मोड़ तो इसके बाद आया।
दादाजी की बात पर सब हँसे, मगर कमरे के एक कोने में खड़ी राहुल की मौसी सुधा चुप थीं। उनकी आँखों में एक हल्की-सी चुभन थी। उन्होंने धीमे स्वर में कहा, “दादाजी, समझदारी अपनी जगह ठीक है, मगर घर की परंपराएँ भी कुछ होती हैं।”
मई ने यह सुना, मगर प्रतिक्रिया नहीं दी। उसने राहुल की ओर देखा। राहुल ने उसके हाथ को हल्के से दबाया—जैसे कह रहा हो, मैं तुम्हारे साथ हूँ।
रात के खाने के बाद जब सब लोग ड्राइंग रूम में बैठे, दादाजी ने चाय के साथ बातचीत छेड़ दी। “मई, बताओ, तुम क्या करती हो?”
मई ने मुस्कुराकर कहा, “दादाजी, मैं एक कंसल्टिंग फर्म में काम करती हूँ। कंपनियों को उनके प्रोसेस बेहतर करने में मदद करती हूँ—कम समय, कम लागत, बेहतर नतीजे।”
दादाजी की आँखें चमक उठीं। “तो आज जो किया, वही तो तुम्हारा काम है!”
मई हँस पड़ी। “जी, बस घर के स्तर पर लागू कर दिया।”
राहुल की माँ—अब जिनके चेहरे पर पहले जैसी कठोरता नहीं थी—ने पहली बार खुलकर पूछा, “लेकिन बेटा, अगर हर काम के लिए बाहर की मदद बुलाएँगे, तो घर कैसे चलेगा?”
मई ने आदर से सिर झुकाया। “आंटी, घर चलाने के कई तरीके होते हैं। कभी मेहनत से, कभी समझदारी से। मेरी नज़र में परिवार का समय सबसे कीमती है। अगर थोड़े पैसों से हम थकान और तनाव बचा सकें, तो वो भी सेवा ही है।”
कुछ पल की चुप्पी छा गई। फिर राहुल की छोटी बहन ने शरारत से कहा, “मम्मी, अगर भाभी आएँगी तो मुझे भी बर्तन नहीं धोने पड़ेंगे!”
सब ठहाका मारकर हँस पड़े। माहौल हल्का हो गया।
अगले दिन, मई लौटने की तैयारी कर रही थी। राहुल की माँ ने उसे अलग कमरे में बुलाया। “कल जो हुआ… मैं मानती हूँ, वो ठीक नहीं था,” उन्होंने धीरे से कहा। “मैं बस यह देखना चाहती थी कि तुम कितनी ‘घर संभाल’ सकती हो।”
मई ने विनम्रता से जवाब दिया, “आंटी, घर संभालना केवल हाथों से नहीं, दिमाग और दिल से भी होता है। मैं मेहनत से डरती नहीं, पर अपमान से समझौता नहीं कर सकती।”
राहुल की माँ की आँखें नम हो गईं। “शायद हमें भी बदलने की ज़रूरत है।”
शादी की तारीख तय हुई। लेकिन इससे पहले एक और परीक्षा आई। शादी की तैयारियों में बजट बढ़ता जा रहा था। रिश्तेदारों की फरमाइशें, दिखावे का दबाव—सब कुछ भारी पड़ रहा था। एक दिन राहुल परेशान होकर बोला, “मई, मुझे डर है कि कहीं हम कर्ज़ में न डूब जाएँ।”
मई ने लैपटॉप खोला, एक शीट बनाई और बोली, “डर मत। चलो, इसे भी एक प्रोजेक्ट समझते हैं।”
उसने खर्चों को प्राथमिकताओं में बाँटा, अनावश्यक तामझाम हटाया, स्थानीय वेंडर्स से सीधे बात की। नतीजा? वही भव्यता, आधे खर्च में।
शादी के दिन दादाजी ने मंच से कहा, “आज मैं सिर्फ़ एक बहू नहीं, एक नई सोच का स्वागत कर रहा हूँ।”
राहुल की माँ ने मई को गले लगाया। “तुमने हमें सिखाया कि परंपरा और आधुनिकता दुश्मन नहीं, साथी हो सकते हैं।”
शादी के बाद भी चुनौतियाँ आईं। कभी काम और घर के बीच संतुलन, कभी रिश्तेदारों की अपेक्षाएँ। मगर मई और राहुल ने हर बार मिलकर समाधान ढूँढा। वे बहस नहीं, बातचीत करते। आदेश नहीं, सहमति बनाते।
एक शाम, वही मौसी सुधा बोलीं, “मई, तुमने हमें गलत साबित कर दिया।”
मई ने मुस्कुराकर कहा, “मौसी, मैंने किसी को गलत साबित नहीं किया। बस यह दिखाया कि हर समस्या का एक से ज़्यादा रास्ता होता है।”
कहानी का सबक साफ़ था—सम्मान से बड़ा कोई संस्कार नहीं, और समझदारी से बड़ी कोई ताक़त नहीं।
मई ने न सिर्फ़ ५० थालियों का ढेर, बल्कि पीढ़ियों की सोच का बोझ भी हल्का कर दिया। और यही उसकी असली जीत थी।
