“कोमा में पड़े एक आदमी की देखभाल कर रही सभी नर्सें एक के बाद एक प्रेग्नेंट होने लगीं, जिससे सुपरवाइज़िंग डॉक्टर पूरी तरह से हैरान रह गए। लेकिन जब डॉक्टर ने मरीज़ के कमरे में एक हिडन कैमरा लगाया ताकि यह देख सकें कि उसकी गैरमौजूदगी में असल में क्या हो रहा है—तो उन्होंने जो देखा उससे वे डर गए, और उन्हें पुलिस को फ़ोन करना पड़ा…”
पहले तो, डॉ. राघव मेहरा को लगा कि यह सिर्फ़ एक इत्तेफ़ाक है।

नर्सों का प्रेग्नेंट होना कोई अजीब बात नहीं थी—हॉस्पिटल ज़िंदगी और मौत से भरे होते हैं, और लोग जहाँ भी मौका मिलता है, सुकून ढूंढते हैं।
आदित्य शर्मा, 27, दो साल से ज़्यादा समय से कोमा में थे—मुंबई में उनका एक भयानक कार एक्सीडेंट हुआ था।
शांतिदीप हॉस्पिटल के स्टाफ़ के बीच उनका मामला एक खामोश दुखद घटना बन गया था।
एक जवान आदमी—एक शांत, ज़ख्मी चेहरा—जो कभी नहीं उठा।
उसका परिवार हर छुट्टी पर फूल भेजता था।
नर्सें अक्सर कहती थीं कि वह बहुत शांत दिखता है।
लेकिन किसी को भी चुप्पी के अलावा कुछ और उम्मीद नहीं थी।
जब तक एक नियम नहीं बना।
हर प्रेग्नेंट नर्स को लंबे समय तक आदित्य की देखभाल करने के लिए रखा गया था।
वे सभी नाइट शिफ्ट में काम करती थीं—रूम 208-C।
और वे सभी इस बात पर ज़ोर देती थीं कि उनकी ज़िंदगी का कोई भी रिश्ता उनकी प्रेग्नेंसी की वजह नहीं हो सकता।
कुछ शादीशुदा थीं, कुछ नहीं—लेकिन सभी एक जैसी कन्फ्यूज्ड, शर्मिंदा और डरी हुई थीं।
शुरू में, पूरे हॉस्पिटल में अफवाहें फैल गईं—अजीब अंदाज़े:
हार्मोनल रिएक्शन, दवा की गलतियाँ, यहाँ तक कि किसी तरह का एनवायरनमेंटल कंटैमिनेशन भी।
लेकिन इंचार्ज न्यूरोलॉजिस्ट, डॉ. राघव मेहरा को कोई सही वजह नहीं मिली।
आदित्य के सभी टेस्ट नॉर्मल थे:
वाइटल साइन स्टेबल, ब्रेन की एक्टिविटी बहुत कम, कोई फिजिकल मूवमेंट नहीं।
लेकिन… इत्तेफाक बढ़ते गए। जब पांचवीं नर्स—नेहा वर्मा नाम की एक शांत औरत—आंखों में आंसू लिए, एक पॉजिटिव टेस्ट पकड़े और कसम खाते हुए उसके ऑफिस में आई कि वह महीनों से किसी के कॉन्टैक्ट में नहीं थी—तो राघव का शक आखिरकार कम होने लगा।
“मैंने हमेशा साइंस पर विश्वास किया है।”
लेकिन हॉस्पिटल मैनेजमेंट जवाब मांग रहा था।
मीडिया भी इस कहानी को उठाने लगा था।
और नर्सें—डर और शर्म से डूबी हुई—आदित्य के कमरे से जाने की रिक्वेस्ट करने लगीं।
तभी डॉ. मेहरा ने एक ऐसा फैसला लिया जिसने सब कुछ बदल दिया।
एक शुक्रवार दोपहर, आखिरी नर्स की शिफ्ट खत्म होने के बाद, वह अकेले कमरा 208-C में गए।
हवा में डिसइंफेक्टेंट और लैवेंडर की हल्की खुशबू थी।
आदित्य हमेशा की तरह बिना हिले-डुले लेटा था—मशीनें बिस्तर के पास लगातार बीप कर रही थीं।
राघव ने कैमरा चेक किया—छोटा, छोटा, बिस्तर की तरफ सीधे पंखे के अंदर छिपा हुआ।
रिकॉर्डिंग शुरू हुई—और सालों में पहली बार, वह कमरे से बाहर निकला… इस बात से डरकर कि उसे क्या पता चलने वाला है।
राघव मेहरा ने दरवाज़ा बाहर से बंद किया और कॉरिडोर की लंबी बेंच पर बैठ गया। दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। उसे पहली बार एहसास हुआ कि साइंस की किताबों में जो नहीं लिखा होता, वह भी दुनिया में मौजूद होता है।
कैमरा रिकॉर्ड कर रहा था।
रात के क़रीब दो बजे, स्क्रीन पर कुछ बदला।
आदित्य शर्मा की उँगली…
हिली।
राघव ने झटके से आँखें खोलीं।
“नहीं… यह मसल स्पाज़्म हो सकता है,” उसने खुद से कहा।
लेकिन फिर…
आदित्य की पलकें काँपीं।
मशीनों की बीप वही थी, ब्रेन वेव्स वही थीं—फिर भी उसका चेहरा…
जैसे जाग रहा हो।
और तभी दरवाज़ा खुला।
नाइट शिफ्ट की नर्स—अनामिका—अंदर आई।
उसके चेहरे पर थकान नहीं थी।
डर भी नहीं।
बल्कि… एक अजीब सी शांति।
उसने दरवाज़ा लॉक किया।
राघव की साँस अटक गई।
अनामिका ने आदित्य के पास जाकर धीरे से कहा,
“आज बहुत देर हो गई… सॉरी।”
आदित्य के होंठ…
हिले।
“तुम आई हो,”
आवाज़ धीमी थी, टूटी हुई…
लेकिन आवाज़ थी।
राघव की उँगलियाँ काँपने लगीं।
अनामिका मुस्कुराई।
“हाँ… जैसे हर रात आती हूँ।”
उसने IV लाइन को छुआ—लेकिन दवा नहीं बदली।
फिर उसने बिस्तर के पास बैठकर आदित्य का हाथ पकड़ा।
और तब…
आदित्य ने उसका हाथ ज़ोर से पकड़ लिया।
यह कोई रिफ़्लेक्स नहीं था।
यह पकड़ थी।
अनामिका ने आँखें बंद कर लीं।
“डरो मत… मैं हूँ।”
राघव कुर्सी से खड़ा हो गया।
“यह असंभव है…” वह बुदबुदाया।
स्क्रीन पर आदित्य ने आँखें खोलीं—पूरी तरह नहीं, लेकिन इतनी कि सामने का चेहरा देख सके।
“तुम्हें याद है,” उसने कहा,
“पहली रात?”
अनामिका का चेहरा बदल गया।
“मत याद दिलाओ…”
आदित्य मुस्कुराया।
“तुम रो रही थीं।”
अनामिका की आँखों से आँसू गिरने लगे।
“मैं अकेली थी… और तुम…”
उसने चारों तरफ देखा।
“तुम चुप थे… लेकिन सुन रहे थे।”
राघव के दिमाग़ में बिजली गिरी।
सुन रहे थे।
आदित्य ने धीमे से कहा,
“मैं सोया नहीं था, अनामिका।
मैं बंद था।”
अनामिका काँपने लगी।
“डॉक्टर कहते हैं तुम कुछ महसूस नहीं कर सकते…”
आदित्य की उँगलियाँ उसकी कलाई पर कस गईं।
“डॉक्टर बहुत कुछ नहीं जानते।”
राघव पीछे हट गया।
उसका दिमाग़ चीख रहा था—
लॉक्ड-इन सिंड्रोम।
पूरा होश।
पूरा दर्द।
पूरा समय।
लेकिन आगे जो हुआ…
वह मेडिकल नहीं था।
अनामिका ने धीमे से कहा,
“जब मैंने तुम्हें छुआ… तो तुमने… जवाब दिया।”
आदित्य की आवाज़ में कुछ अंधेरा था।
“क्योंकि तुम चाहती थीं कि मैं जवाब दूँ।”
कमरे में सन्नाटा फैल गया।
अनामिका फुसफुसाई,
“मैं अकेली नहीं थी, है ना?”
आदित्य ने सिर हिलाया।
“कोई भी अकेली नहीं थी।”
राघव की रीढ़ में ठंड दौड़ गई।
स्क्रीन पर फ्लैशबैक जैसे दृश्य आए—
अलग-अलग नर्सें।
अलग-अलग रातें।
एक ही कमरा।
और हर बार…
आदित्य की आँखें खुलती थीं।
“यह रेप है…”
राघव की आवाज़ टूट गई।
लेकिन तभी आदित्य ने कहा—
“नहीं।”
राघव चिल्ला उठा,
“क्या मतलब नहीं?!”
आदित्य की आँखों में आँसू थे।
“उन्होंने मुझे नहीं छुआ…
मैंने उन्हें रोका नहीं।”
अनामिका फूट-फूटकर रोने लगी।
“हमने सोचा तुम कुछ नहीं हो…
एक शरीर…”
आदित्य की आवाज़ भारी हो गई।
“और मैं सोचा…
कम से कम कोई मुझे देख रहा है।”
राघव कुर्सी पर गिर पड़ा।
कैमरा सब रिकॉर्ड कर रहा था।
तभी दरवाज़े के बाहर सायरन की आवाज़ आई।
पुलिस।
लेकिन सच्चाई…
अभी पूरी नहीं खुली थी।
क्योंकि आदित्य ने आख़िरी बात कही—
“डॉक्टर मेहरा…
आपको लगता है बच्चे मेरी वजह से हैं?”
राघव ने सिर उठाया।
“और किसकी वजह से होंगे?!”
आदित्य की आँखें…
मुस्कुराईं।
“उनकी वजह से…”
और स्क्रीन पर एक छाया दिखाई दी—
कमरे के कोने में।
जहाँ कोई इंसान नहीं था।
मशीनें अचानक तेज़ बीप करने लगीं।
और कैमरा…
अपने आप बंद हो गया।
कैमरा अचानक बंद हो गया, लेकिन कमरे में जो होने वाला था, उसे रिकॉर्ड करने के लिए किसी मशीन की ज़रूरत नहीं थी। मशीनों की बीप अब बेतरतीब हो चुकी थी, जैसे दिल नहीं बल्कि किसी और चीज़ की धड़कन सुनाई दे रही हो। राघव मेहरा ने कांपते हाथों से दरवाज़ा खोला और कमरे में घुसा। उसकी आँखें सीधे उस कोने पर गईं—जहाँ स्क्रीन पर छाया दिखी थी। वहाँ कुछ नहीं था। न परछाईं, न हरकत। सिर्फ़ हवा… जो अस्वाभाविक रूप से ठंडी थी।
अनामिका फर्श पर बैठ चुकी थी, सिर दोनों हाथों में थामे। “वो… वो हमेशा यहीं खड़ी रहती थी,” उसने सिसकते हुए कहा।
“कौन?” राघव की आवाज़ सूख चुकी थी।
“पहली नर्स,” अनामिका ने फुसफुसाया। “शिल्पा।”
राघव का दिल बैठ गया। शिल्पा—वही नर्स जिसने सबसे पहले प्रेग्नेंसी रिपोर्ट की थी। वही जिसने कुछ महीनों बाद… आत्महत्या कर ली थी।
आदित्य की साँसें अचानक तेज़ हो गईं। उसकी आँखें पूरी तरह खुल गईं—पहली बार, पूरे दो साल बाद। “डॉक्टर,” उसने भारी आवाज़ में कहा, “आपने कभी पूछा… उसने जान क्यों दी?”
राघव कुछ नहीं बोला।
“क्योंकि उसने सच समझ लिया था,” आदित्य बोला। “और सच… इंसान सहन नहीं कर पाते।”
कमरे की लाइट झिलमिलाई। दीवार पर परछाईं उभरी—इस बार साफ़। एक औरत की आकृति। बाल खुले हुए, नर्स की वर्दी में। उसका पेट… अस्वाभाविक रूप से उभरा हुआ।
अनामिका चीख पड़ी। “वो आ गई…!”
आदित्य ने आँखें बंद कर लीं। “मैंने उसे रोका था,” उसने धीमे से कहा। “कहा था—मत रहो यहाँ। लेकिन उसे लगा… अगर वो चली गई, तो बाक़ी सब पागल समझी जाएँगी।”
परछाईं आगे बढ़ी। कमरे की हवा भारी हो गई। मशीनों की स्क्रीन पर एक ही शब्द बार-बार चमकने लगा—PREGNANT।
राघव पीछे हट गया। “यह… यह कैसे संभव है? कोई पैरानॉर्मल एंटिटी… जैविक प्रेग्नेंसी—”
“यह प्रेग्नेंसी नहीं है,” आदित्य ने उसकी बात काट दी। “यह ट्रांसफर है।”
परछाईं ने आदित्य के सीने की ओर हाथ बढ़ाया। उसी पल, आदित्य ने ज़ोर से चीख मारी—एक ऐसी चीख जो किसी कोमा में पड़े इंसान की नहीं हो सकती थी। उसकी मॉनिटर लाइन सीधी हो गई।
बीप।
बीप।
फिर—एक लंबी, सपाट आवाज़।
अनामिका चीखती रही। राघव जड़ हो गया।
और परछाईं… धीरे-धीरे आदित्य के शरीर में समा गई।
सब कुछ शांत हो गया।
कुछ सेकंड बाद—मॉनिटर फिर से चलने लगे।
आदित्य की आँखें खुलीं।
लेकिन अब…
वह आदित्य नहीं था।
उसने सीधे राघव की तरफ़ देखा और मुस्कुराया। वही मुस्कान… जो शिल्पा की फ़ाइल फ़ोटो में थी।
“अब आप समझे, डॉक्टर?” आवाज़ औरत की थी। “हम मरी नहीं थीं। हमें बस जगह चाहिए थी।”
राघव की आवाज़ गले में अटक गई। “बच्चे…?”
“स्मृति,” उसने कहा। “हमारी यादें। हमारा दर्द। वो बच्चे नहीं थे—वो गवाह थे।”
पुलिस उसी पल कमरे में घुसी। उन्होंने जो देखा… उसे कभी रिपोर्ट में पूरी तरह नहीं लिखा गया।
आदित्य शर्मा की मौत का कारण बताया गया—ब्रेन फ़ेल्योर।
नर्सों की प्रेग्नेंसी—मास हिस्टीरिया और साइकोसोमैटिक डिसऑर्डर।
हॉस्पिटल—सील।
लेकिन राघव मेहरा ने इस्तीफ़ा नहीं दिया।
उसने खुद को पुलिस के हवाले कर दिया।
क्योंकि आख़िरी रात, जब वह अकेला था, उसने अपनी डेस्क पर एक पॉजिटिव प्रेग्नेंसी टेस्ट पाया।
और उसके कानों में एक फुसफुसाहट गूँजी—
“अब तुम देखोगे…
जैसा हमने देखा था।”
कभी-कभी, सबसे बड़ा अपराध छूना नहीं होता।
सबसे बड़ा अपराध होता है—
देखकर भी कुछ न करना।
और कुछ सच्चाइयाँ…
दफ़न नहीं की जातीं।
वे बस… शरीर बदल लेती हैं।
समाप्त।
