रात के 9:30 बज रहे थे। मैं रसोई की मेज पर बैठी उस ठंडी खिचड़ी को देख रही थी जिसे खाने की मेरी बिल्कुल इच्छा नहीं थी। घर फिनाइल और अकेलेपन की महक से भरा था। मैंने पूरा दिन सफाई की थी, अपने बेटे राहुल की कमीज़ें प्रेस की थीं और पोतों के कपड़े तह किए थे। मेरे हाथों से अब भी ब्लीच की गंध आ रही थी।
तभी मेरे फोन की स्क्रीन चमकी। मुझे लगा राहुल का फोन होगा, शायद उसने मेरे लिए टेबल पर जगह बना ली होगी, पर नहीं। वह मेरी बहू, श्वेता का मैसेज था: “सासू माँ, फ्रिज में कल की बची हुई सब्ज़ी रखी है, उसे गर्म करके खा लीजिएगा। खाना बर्बाद मत करिएगा।”

मैंने उन शब्दों को एक बार, दो बार, तीन बार पढ़ा। मेरे सीने में कुछ टूट सा गया। यह सिर्फ एक मैसेज नहीं था, यह वह तिरस्कार था जो पिछले 3 साल से मैं सह रही थी। मैंने इंस्टाग्राम खोला—वहां जश्न की तस्वीरें थीं। राहुल अपनी उसी सफेद शर्ट में था जिसे मैंने सुबह प्रेस किया था, श्वेता लाल साड़ी में चमक रही थी। समधन जी, ननद, जीजाजी… सब वहां थे, सिवाय मेरे। कैप्शन था: “मेरी रानी के प्रमोशन का जश्न! 34 की उम्र में रीजनल मैनेजर। उन महिलाओं के लिए जाम उठाओ जो कभी रुकती नहीं।”
मैंने फोन रख दिया। मैं रोई नहीं, चिल्लाई नहीं। एक अजीब सी बर्फीली शांति मुझ पर छा गई। मैं उठी, अपने कमरे में गई और अलमारी खोली। जो वो नहीं जानते थे, वह यह था कि मैं इस पल के लिए महीनों से तैयारी कर रही थी। इस बार मैं उनका बचा हुआ खाना गर्म नहीं करने वाली थी, इस बार मैं गायब होने वाली थी।
3 साल पहले की बात है… मेरे पति के निधन के बाद राहुल ने मुझसे कहा था, “माँ, आप अकेले कोठरी में क्या करोगी? अपना घर बेच दो, हम साथ में बड़ा बंगला लेंगे। आप बच्चों के साथ रहोगी और हम एक परिवार बनकर रहेंगे।” मैंने अपना पुश्तैनी घर 1.5 करोड़ में बेच दिया। 80 लाख राहुल को बंगले के लिए दिए, बाकी फर्नीचर और रिनोवेशन में लगा दिए। राहुल ने कहा था कि कागज़ों की चिंता मत करो माँ, घर आपका ही है। और मैंने, एक माँ की ममता में अंधा होकर, अपना नाम रजिस्ट्री में नहीं डलवाया।
लेकिन श्वेता के लिए मैं माँ नहीं, एक ‘मुफ्त की बाई’ थी। “सासू माँ, शीशों पर दाग हैं। सासू माँ, बच्चों के कपड़े ठीक से प्रेस नहीं हुए। सासू माँ, सर्फ कम इस्तेमाल कीजिए, महंगा आता है।” राहुल चुप रहता था। एक रात मैंने सुना श्वेता कह रही थी, “तुम्हारी माँ बच्चों को बिगाड़ रही है। या तो वो यहाँ के नियम मानेगी या फिर उसे किसी वृद्धाश्रम का रास्ता देखना होगा।”
आज की रात आखिरी थी। जब वो लोग 3200 रुपये की वाइन पी रहे थे, मैंने अपना पुराना संदूक खोला। उसमें इस घर की असली रजिस्ट्री थी। राहुल और श्वेता को लगा था कि उन्होंने घर अपने नाम करवा लिया है, पर उस वक्त वकील ने मुझे सुरक्षा के लिए सलाह दी थी कि पैसे मैंने दिए हैं तो रजिस्ट्री मेरे ही नाम होगी। कागज़ात अब भी मेरे नाम पर थे।
मैंने अपनी वकील भांजी को फोन किया, “बेटा, मुझे अब कानूनी कार्रवाई करनी है। मुझे घर खाली करवाना है।”
रात के 1:30 बजे जब राहुल और श्वेता नशे में झूमते हुए लौटे, तो घर का सन्नाटा उन्हें डराने लगा। ड्राइंग रूम से मेरा वह पुराना कश्मीरी कालीन गायब था, दीलरों से मेरी तस्वीरें हट चुकी थीं। राहुल लड़खड़ाते हुए मेरे कमरे में गया। कमरा खाली था। अलमारी खुली थी, सारा सामान जा चुका था।
उसके तकिए पर एक लिफाफा रखा था। उसमें रजिस्ट्री की कॉपी थी और एक छोटा सा नोट: “राहुल, 3 साल तक मैं इस घर में एक अदृश्य नौकरानी बनकर रही। आज जब तुमने मुझे ‘बचा हुआ खाना’ खाने को कहा, तो तुमने अपनी माँ को हमेशा के लिए खो दिया। यह घर कानूनी रूप से मेरा है। अगले हफ्ते तक घर खाली करने का नोटिस तुम्हें मिल जाएगा। अब अपनी ‘सफलता’ का जश्न मनाओ, पर अपने घर में, मेरे में नहीं।”
श्वेता की चीख पूरे बंगले में गूंज गई। राहुल ज़मीन पर बैठ गया। जिस माँ को उन्होंने ‘बोझ’ समझा था, आज उसी ने उन्हें सड़क पर ला खड़ा किया था। मैंने अपनी गरिमा वापस पा ली थी, और वो… वो अब अपनी ‘सफलता’ के मलबे में दबे हुए थे।
