अगली सुबह काव्या राजीव के छोटे से घर में उठी। दिल भारी था, भविष्य को लेकर डर से भरा। उसने अपना पर्स देखा—पूरी तरह खाली। फिर आँगन की तरफ़ नज़र गई, जहाँ राजीव काम पर जाने की तैयारी कर रहा था।

मेरे मामा (मौसी के पति) ने मुझे ज़बरदस्ती एक ग़रीब निर्माण मज़दूर से शादी करने पर मजबूर कर दिया, जबकि मेरे सामने पचास लाख रुपये सालाना कमाने वाला एक “बेहतरीन रिश्ता” था। मुझे लगा मेरी ज़िंदगी वहीं खत्म हो गई। लेकिन शादी के अगले ही दिन जब मैंने बाज़ार के लिए सिर्फ़ दो सौ रुपये मांगे, तो पाँच मिनट बाद मेरे पति ने जो किया, उसने मुझे आँगन के बीचों-बीच सन्न कर दिया। उस मज़दूर की असली दौलत की सच्चाई मेरी कल्पना से भी परे थी।

सुबह की धूप कच्चे से, पुराने एक-मंज़िला घर में धूल भरी हवा को चीरती हुई अंदर आ रही थी। घर में अभी भी चूने और सीमेंट की तीखी गंध बसी हुई थी। काव्या बिस्तर के किनारे बैठी थी। पूरी रात रोने से उसकी आँखें सूज चुकी थीं। सामने दीवार पर टंगी सस्ती शादी की साड़ी को देख रही थी, जो एक टूटे हुए प्लास्टिक के हुक पर लटकी थी। उसे यक़ीन नहीं हो रहा था कि सिर्फ़ उसके मामा की लालच की वजह से उसकी ज़िंदगी इतनी अंधेरी राह पर मुड़ गई।

उसके मामा—जो बाहर से बड़े धर्मात्मा और आदर्श इंसान बनते थे—अंदर से छोटे-छोटे स्वार्थों और घटिया चालों से भरे हुए थे। उन्हीं ने काव्या का रिश्ता राजीव से तय कर दिया। राजीव एक निर्माण मज़दूर था—खुरदुरे हाथ, जिन पर हमेशा सीमेंट जमी रहती थी, और कपड़े जिन पर चूने के दाग साफ़ दिखते थे। लोगों की नज़र में यह शादी एक अपमान थी, एक सज़ा—एक अनाथ भांजी के लिए जो “बड़ों की बात नहीं मानती”।

“तुझे खुद को खुशनसीब समझना चाहिए, काव्या,” शादी से पहले आख़िरी रात के खाने पर मामा ने सिगरेट का कश लेते हुए उसके चेहरे पर धुआँ छोड़ते हुए कहा। “राजीव मज़बूत है, मज़दूरी करता है, भूखा तो नहीं मरेगा। लेकिन उस अमित से शादी कर देता, जो पचास लाख कमाता है, तो तेरे जैसे नखरीली लड़की से बेचारा परेशान ही रहता।”

काव्या ने कुछ नहीं कहा। बस सिर झुका लिया और अपने दुपट्टे को इतनी ज़ोर से पकड़ा कि उंगलियाँ सफ़ेद पड़ गईं। अमित वही लड़का था जो उसे लंबे समय से चाहता था—अच्छी नौकरी, चमकदार कपड़े, शहर की बड़ी कंपनी में काम करने वाला। हर लड़की का सपना।
लेकिन मामा ने साफ़ मना कर दिया। बहाना बनाया कि “उसका खानदान मज़बूत नहीं है।” असली वजह कुछ और थी—राजीव ने वादा किया था कि वह मामा की पूरी किराये की इमारत मुफ़्त में मरम्मत करके देगा।

शादी डरावनी ख़ामोशी में हुई। न ढोल, न हँसी, न बधाइयाँ—बस पड़ोसियों की दबी-दबी फुसफुसाहटें।
“बेचारी लड़की… इतनी सुघड़ और सुंदर, और किस्मत देखो—मज़दूर की बीवी बन गई,”
ये बातें काव्या के कानों में चुभती रहीं, जैसे किसी ने दिल में सुई चुभो दी हो।

उसने राजीव की तरफ़ देखा—उसका पति। वह चुपचाप शराब पी रहा था। उसका चेहरा सख़्त और भावनाहीन था, जैसे उसे इस शादी से कोई फ़र्क़ ही न पड़ता हो।

घर की ग़रीबी हर कोने में दिखती थी—पुरानी लकड़ी की मेज़, जर्जर पंखा जो कर्कश आवाज़ कर रहा था।

वह हिम्मत करके आँगन में गई। आवाज़ काँप रही थी।
“राजीव… सुनिए…”
वह उसकी आँखों में देखने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी।
“क्या आप मुझे… बाज़ार के लिए दो सौ रुपये दे सकते हैं? घर में कुछ भी नहीं है… नाश्ते और दोपहर के खाने के लिए…”

उसे डर था—कहीं वह नाराज़ न हो जाए। आख़िर कौन-सा ग़रीब मज़दूर अपनी नई बीवी को पहले ही दिन पैसे माँगते देख खुश होता है?

राजीव ने तुरंत जवाब नहीं दिया।
उसने हाथ रोका, माथे से पसीना पोंछा और कुछ सेकंड तक उसे गहरी नज़र से देखता रहा। उसकी आँखों की गहराई देखकर काव्या की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।

राजीव बिना कुछ कहे चुपचाप मुड़ा और घर के अंदर चला गया, काव्या को आँगन के बीचों-बीच शर्म और बेबसी में छोड़कर। काव्या ने सोचा—शायद उसके पास दो सौ रुपये भी नहीं हैं, या वह पछता रहा है कि उसने ऐसी पत्नी से शादी की जो पहले ही दिन पैसे माँग रही है।

पाँच मिनट ऐसे बीते जैसे पूरी एक सदी। काव्या कमरे में लौटने ही वाली थी कि राजीव बाहर आया—हाथ में कुछ काग़ज़ात और एक छोटा सा बैग था। वह उसके सामने आकर रुका, बैग उसके हाथ में थमाया और शांत स्वर में बोला,
“ये रहे बाज़ार के पैसे। लेकिन जाने से पहले शायद तुम्हें ये देख लेना चाहिए।”

काव्या ने काग़ज़ात खोले—और अगले ही पल उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह सदमे में आँगन में ही बैठ गई। ये बिजली का बिल या क़र्ज़ के काग़ज़ नहीं थे, बल्कि एक नए टाउनशिप प्रोजेक्ट का ठेका—तीन सौ लग्ज़री विला। काग़ज़ों पर बड़े अक्षरों में नाम छपा था:
राजीव मल्होत्रा — मुख्य ठेकेदार और वैधानिक प्रतिनिधि।

“ये… ये क्या है? आप… आप मालिक हैं?” काव्या हकलाते हुए बोली, आँखें फटी की फटी रह गईं।
राजीव मुस्कराया—एक दुर्लभ लेकिन बेहद सुकून देने वाली मुस्कान। उसने उसे उठाया, कपड़ों की धूल झाड़ी और बोला,
“मुझे साइट पर काम करना पसंद है ताकि मैं अपने प्रोजेक्ट की गुणवत्ता खुद देख सकूँ। इसका मतलब ये नहीं कि मैं वैसा ग़रीब मज़दूर हूँ जैसा तुम्हारे मामा समझते थे।”

काव्या अभी संभल भी नहीं पाई थी कि गेट की घंटी ज़ोर-ज़ोर से बजने लगी। एक जाना-पहचाना चेहरा दिखा—अमित। वही “पचास लाख वाला” अमित, मगर आज वह थका-हारा, बिखरा हुआ लग रहा था। चमकदार जूते घिस चुके थे। हाथ में एक फ़ाइल थी, और वह झुका हुआ-सा गेट पर खड़ा था।

“नमस्ते, सर… मैं… मैं नौकरी के लिए आवेदन देने आया हूँ,” अमित ने नज़रें झुकाए कहा। “सुना है आपकी कंपनी में नए प्रोजेक्ट के लिए साइट सुपरवाइज़र चाहिए।”
काव्या को देखते ही अमित का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। फ़ाइल उसके हाथ से गिरते-गिरते बची। किस्मत का यह व्यंग्य साफ़ दिख रहा था।

राजीव ने ठंडे भाव से फ़ाइल ली, दो-तीन पन्ने पलटे और बोला,
“पचास लाख की नौकरी से अब साइट पर मज़दूरी?”
फिर काव्या की तरफ़ देखकर शांत लेकिन तेज़ आवाज़ में कहा,
“अमित, मुझे याद है—तुमने मेरी पत्नी से कहा था कि मैं तुम्हारे जूते उठाने लायक भी नहीं।”

अमित पसीने-पसीने हो गया।
“उस वक़्त… उस वक़्त मुझे पता नहीं था कि आपकी नज़र इतनी गहरी है। मेरी पुरानी कंपनी दिवालिया हो गई। कृपया मुझे एक मौक़ा दे दीजिए।”

काव्या के मन में अजीब-सी संतुष्टि के साथ हल्की-सी कसक भी थी—दुनिया की दिखावटी चमक कितनी अस्थायी होती है।

वह अपने पति की ओर देखती है—जिसे वह कभी बोझ समझती थी, वही आज उसके लिए मज़बूत सहारा बन चुका था। उसने समझ लिया कि राजीव ने मामा की उपेक्षा और तिरस्कार को चुपचाप सहा—लोगों की परख और उसकी हिफ़ाज़त के लिए। उसने कभी दौलत का दिखावा नहीं किया; उसने अपने चरित्र और काबिलियत से सब कुछ साबित किया।

“ठीक है,” राजीव बोला, “मैं तुम्हारा आवेदन रख लूँगा। लेकिन शुरुआत सबसे नीचे से—सीमेंट ढोने से।”
फिर वह काव्या की ओर मुड़ा, आवाज़ नरम हो गई।
“ये कार्ड रख लो। इसमें इतना है कि तुम पूरा बाज़ार खरीद सको—अब छोटे-छोटे नोट माँगने की ज़रूरत नहीं। बाज़ार से लौटकर सामान पैक करना, हम नए टाउनशिप के अपार्टमेंट में शिफ्ट होंगे।”

काव्या ने काले रंग का वह कार्ड हाथ में लिया। दिल तेज़ धड़क रहा था—पैसे की वजह से नहीं, बल्कि उस सम्मान और प्यार की वजह से जो राजीव ने उसे दिया था। उसने अमित को झुके क़दमों से बाहर जाते देखा, फिर राजीव को—जो फ़ोन पर काम संभाल रहा था। देर से मिला, लेकिन बेहद मीठा सुकून उसके भीतर फैल गया।

उधर मामा को जब पता चला कि राजीव “छुपा हुआ करोड़पति” है, तो वह तुरंत मिलने पहुँचा—हिस्सा माँगने के इरादे से। मगर राजीव ने साफ़ इनकार कर दिया और एक छोटा सा पत्र भिजवा दिया:
“काव्या से मेरी शादी कराने के लिए धन्यवाद। लेकिन आज से उसका आपके किसी भी हिसाब-किताब से कोई लेना-देना नहीं।”

इसके बाद काव्या और राजीव की ज़िंदगी सुकून और समृद्धि से भर गई। वे उसी टाउनशिप में अपना घर बसाने लगे, जिसे राजीव ने खुद डिज़ाइन किया था। काव्या अब पैसों की चिंता से मुक्त थी, फिर भी सादगी नहीं छोड़ी—हर छोटे-बड़े प्रोजेक्ट में पति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रही।

कहानी के अंत में लोग राजीव को “ग़रीब मज़दूर” नहीं, बल्कि “घर बसाने वाला इंसान” कहने लगे।
और काव्या—जब भी उस सुबह को याद करती है, जब वह आँगन में सदमे से बैठ गई थी—मुस्करा कर सोचती है:
कभी-कभी किस्मत हमें पुराने, धूल भरे रूप में परखती है, ताकि भीतर छुपा असली ख़ज़ाना सौंप सके।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *