एक बेघर बच्चा सेरा नगर के बैंक पहुँचा… मैनेजर हँसा… जब तक उसने बैलेंस नहीं देख लिया…

नंगे पाँव वह स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की शाखा में दाख़िल हुआ, मध्य प्रदेश के सेरा नगर में। एक मिनट से भी कम समय में उसने पूरे बैंक की हँसी गले में अटका दी।

 

आर्यन सिर्फ़ 13 साल का था। उसके पास वही सब कुछ था जो उसकी पूरी दुनिया थी—एक घिसी हुई टोपी, ढीली टी-शर्ट, और एक मुड़ा-तुड़ा काग़ज़, जिस पर पेन से लिखा हुआ आधार नंबर था।
काँच के उस पार बैंक का हॉल किसी शोरूम की तरह चमक रहा था—एयर कंडीशनर की ठंडी हवा, महँगा परफ़्यूम, जल्दी में भागते लोग।

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उसे बस पाँच रुपये चाहिए थे—रोटी के लिए। शायद उस खाते में अब भी कुछ पैसे बचे हों, जिसे महीनों पहले बाबू नेस्टर लाल ने ज़बरदस्ती खुलवाया था:

—“इसे संभालकर रखना, बेटे। एक दिन यही तुम्हें बचाएगा।”

घूमते दरवाज़े पर खड़े गार्ड के चेहरे पर पहले ही एक टेढ़ी मुस्कान आ गई।

—“यह जगह भीख माँगने की नहीं है।”

आर्यन ने चुपचाप वह काग़ज़ आगे बढ़ाया।

—“मैं भीख नहीं माँग रहा। मैं अपना बैलेंस चेक करने आया हूँ।”

पीछे से किसी ने झुँझलाकर कहा,
—“अरे, इसे जाने दो।”

वह अंदर गया। ठंडी हवा उसकी नंगी त्वचा से टकराई, और हर नज़र जैसे चाकू बन गई।

जब उसका नंबर आया, वह काउंटर नंबर 4 पर पहुँचा। कैशियर ने काग़ज़ को बस उँगलियों से छुआ—मानो गंदगी अपने आप चिपक जाएगी।

—“मैं मैनेजर को बुला रही हूँ,” उसने कहा।
और उसने ऐसे कहा, जैसे मदद बुला रही हो।

मैनेजर विलास शर्मा पहुँचे—बिलकुल चमकता सूट, और उतनी ही चमकदार घमंड भरी मुस्कान। उन्होंने आर्यन को ऊपर से नीचे तक देखा और ज़ोर से हँस पड़े, ताकि पूरा बैंक सुन सके।

—“बैलेंस? ये कोई गुल्लक नहीं है!”

लाइन में हल्की-हल्की हँसी गूँज उठी।
आर्यन ने चमकती ज़मीन की ओर देखा। उसे याद आया बाबू नेस्टर की छोटी-सी वर्कशॉप, रेडियो की खरखराहट, और रबर की गंध।
उसे याद आया, कैसे बूढ़े ने आख़िरी रोटी तोड़ते हुए कहा था:

—“आधी तुम्हारी। तुम बड़े हो रहे हो।”

विलास शर्मा अब भी मुस्कराते हुए आधार नंबर टाइप करने लगे।
स्क्रीन लोड हुई।
और जैसे किसी ने अचानक तार खींच लिया हो—उनकी मुस्कान जम गई।
उन्होंने पलकें झपकाईं, फिर से क्लिक किया।
चेहरे का रंग उड़ने लगा।
बैंक में फुसफुसाहट भारी सन्नाटे में बदल गई।

—“यहाँ… यहाँ कुछ गड़बड़ है,” उन्होंने बुदबुदाया, अब मज़ाक करने की हिम्मत नहीं बची थी।
उन्होंने आर्यन की बाँह पकड़ी—
—“मेरे केबिन में आओ। अभी।”

अंदर उन्होंने मॉनिटर घुमाया। स्क्रीन पर एक लाइन साफ़ दिख रही थी:

उपलब्ध बैलेंस: ₹10,64,873.50

आर्यन को लगा जैसे पेट में कुछ गिर गया हो।

—“यह पैसा मेरा नहीं है।”

विलास शर्मा ने स्टेटमेंट खोला। महीनों के एक जैसे जमा—हर बार उसी तारीख़ को।
एक नाम बार-बार उभर रहा था, जैसे दस्तख़त:

नेस्टर लाल।

बच्चे ने होंठ काट लिया।

—“वह मर चुके हैं।”

विलास शर्मा ने सूखी साँस ली।

—“तो… उन्होंने यह सब तुम्हारे लिए छोड़ा है।”

 

और उसी पल मैनेजर का लहजा बदल गया।
निवेश, प्रतिशत, “मैं सब संभाल लूँगा”—बातों की बौछार शुरू हो गई।
आर्यन सुन रहा था, लेकिन देख रहा था उसके पीछे छुपा सच—जल्दबाज़ी, लालच, और इस पैसे को खोने का डर।

—“मुझे सिर्फ़ बीस रुपये निकालने हैं,” उसने दृढ़ता से कहा।

विलास शर्मा की साँस अटक गई।

—“बीस?”

—“आज बस खाना चाहिए। कल सोचूँगा।”

 

बाहर, जेब में नोट डालकर, आर्यन ने रोटी और जूस खरीदा।
बेकरी के पास एक और भूखा बच्चा उसे देख रहा था।
आर्यन ने बिना कुछ कहे रोटी तोड़ दी।
और पहली बार उसने समझा—विरासत धन नहीं होती।
विरासत रास्ता होती है।

वह सीने में उदासी और दिल में एक साधारण वादा लेकर सड़क पर लौटा—पढ़ाई करेगा, मदद माँगेगा, फिर से शुरुआत करेगा।
और उस बैंक हॉल में हँसने वाले लोग कभी नहीं भूल पाएँगे वह दिन, जब एक अदृश्य बच्चे ने उन्हें सिखाया कि गरिमा की क़ीमत क्या होती है—सिर्फ़ इंसानियत।

उस रात एक सरकारी शेल्टर ने उसे जगह दी।
आर्यन ने एक पुरानी कॉपी माँगी।
पहले पन्ने पर उसने बाबू नेस्टर लाल का नाम लिखा और कसम खाई—
कभी करुणा को घमंड से नहीं बदलेगा,
और कभी चुप्पी को शर्म से नहीं।

“अगर तुम मानते हो कि ईश्वर की प्रतिज्ञा से बड़ा कोई दर्द नहीं, तो कमेंट करो: ‘मैं मानता हूँ’।
और हमें बताओ—तुम किस शहर से देख रहे हो?”

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