अयोध्या बस अड्डे की ठंडी, धूल भरी सुबह थी। लोगों की आवाज़ें, रिक्शों की खड़खड़ाहट, चाय की उबलती केतली की सीटी—इन सब शोर के बीच, एक दुबला-पतला बारह साल का लड़का स्टील के गिलासों से भरी टोकरी उठाए तेज़-तेज़ कदमों से दौड़ रहा था।
“पवन! ज़रा जल्दी कर रे, ग्राहक इंतज़ार कर रहे हैं,” ढाबे के मालिक हरिप्रसाद ने रसोई से आवाज़ लगाई।
“आया काका!” पवन ने हांफते हुए जवाब दिया, “ये आख़िरी गिलास रख दूं, फिर बर्तन धोने बैठ जाता हूं।”
पवन, जिसने खुद को इसी बस अड्डे का हिस्सा मान लिया था। मां-बाप की मौत एक सड़क दुर्घटना में हो गई थी। कुछ महीने चाचा के यहां रहा, पर चाची की खरी-खोटी, गालियां और मार ने उसे एक रात चुपचाप घर से भागने पर मजबूर कर दिया। अब बस अड्डा ही उसका घर था, और ढाबा उसकी रोज़ी-रोटी।
दोपहर का वक्त था। ढाबे के पीछे लगे हैंडपंप पर पवन झुककर बर्तन धो रहा था। हाथों पर साबुन की झाग, चेहरे पर पसीना, और आंखों में अजीब-सी थकान।
हरिप्रसाद बाहर आया,
“पवन, खाना खा ले पहले, फिर काम कर लेना।”
पवन ने मुस्कुराकर कहा, “काका, पहले बर्तन निपटा लूं, नहीं तो लोग फिर डांटेंगे। आप थाली रख दो, मैं यहीं खा लूंगा।”
हरिप्रसाद ने स्नेह से उसे देखा,

“बाबू, तू खुद को बहुत झोंक देता है काम में… कभी थकान नहीं लगती?”
“लगती है काका,” पवन ने थाली हाथ में लेते हुए कहा, “पर जब याद आता है कि अब मेरा कोई नहीं… तो लगता है बस काम ही मेरा अपना है।”
हरिप्रसाद शांत हो गया। पवन की बात उसके दिल में उतर गई, मगर वो जानता था कि इस बच्चे के घावों पर शब्दों से ज्यादा वक्त का मरहम काम करेगा।
बस अड्डे से थोड़ी दूर, सड़क के मोड़ पर एक पुराना-सा हनुमान मंदिर था। लाल-संतरी झंडे, घंटियों की हल्की-सी आवाज़, और हमेशा जलता हुआ एक दीपक। यह वही मंदिर था जहां पवन के पापा उसे हर मंगलवार को लाते थे।
मंगलवार की शाम, काम थोड़ी देर से खत्म हुआ। पवन ने जेब टटोली। इस हफ्ते हर दिन के पचास रुपये में से कुछ बचाकर उसने सौ रुपये अलग रखे थे।
वह खुद से बुदबुदाया,
“आज हनुमान जी को हलवा नहीं, पर गुड़-चना का प्रसाद तो ज़रूर खिलाना है।”
मंदिर के बाहर वाली दुकान से उसने थोड़ा गुड़, भुने चने और कुछ पूरियां खरीदीं। मंदिर के फर्श पर बैठकर हनुमान %ALS
