लोगों ने उस पर बंजर ज़मीन खरीदने के लिए हँसी उड़ाई, लेकिन जो उसने ज़मीन के नीचे से निकाला, उसे देखकर सब चुप हो गए।

विधवा ने वह पुरानी ज़मीन खरीद ली जिसे कोई नहीं चाहता था…
लेकिन जब उसने मक्का बोने के लिए खुदाई की,
तो उसे एक ऐसा रहस्य मिला जिसने सब कुछ बदल दिया।

जब तारा बैलगाड़ी से उतरी और उसके नंगे पैरों के नीचे सूखी ज़मीन चरमराई,
उसी पल उसे समझ आ गया—अब पीछे लौटने का कोई रास्ता नहीं था।

उत्तर-पश्चिम भारत की कठोर धूप किसी को माफ़ नहीं करती थी।
वह जंग लगी टीन की छतों पर, काँटेदार कीकर के पेड़ों पर
और उन नालों पर जलती थी जो अब धूल की लकीरों में बदल चुके थे।

यह बीसवीं सदी की शुरुआत थी,
राजस्थान के एक सूखे इलाके में,
जहाँ पानी पैसे से ज़्यादा क़ीमती था
और ज़िंदगी घड़ों की गिनती में मापी जाती थी।

जिसके पास गहरा कुआँ होता,
उसे भगवान का आशीर्वाद माना जाता।
और जिनके पास नहीं होता—
वे मीलों दूर से पानी ढोते,
और उस बारिश के लिए प्रार्थना करते
जो इतनी देर से आती कि
उम्मीद भी सूखने लगती।

तारा की उम्र बत्तीस साल थी,
लेकिन उसकी आँखों में दर्द ने उसे कहीं ज़्यादा बड़ा बना दिया था।

कुछ ही महीनों पहले,
एक तेज़ बुख़ार ने उसके पति को
सिर्फ़ तीन दिनों में छीन लिया था—
बिना विदा, बिना कारण।

अचानक वह विधवा रह गई,
दो छोटी बेटियों के साथ
और कुछ ही रुपये—
जैसे तूफ़ान में जलती एक छोटी-सी लौ।

मायके लौटना
हमेशा की दया और तयशुदा किस्मत को स्वीकार करना था।
अकेले रहना
पूरी ज़िंदगी को एक विचार पर दाँव लगाना था—
जिसे लोग पागलपन कहते थे।

मैं कर सकती हूँ।

इसीलिए उसने वह ज़मीन खरीदी
जिसे कोई नहीं चाहता था।

वह बरसों से छोड़ी हुई ज़मीन थी—
नदी से दूर,
आधी गिरी हुई झोपड़ी के साथ,
और इतनी सख़्त मिट्टी कि
उस पर घास भी उगने से डरती थी।

“सस्ती है,”
गाँव के पटवारी ने कहा,
उस आवाज़ में जो सलाह और चेतावनी दोनों होती है।
“लेकिन यहाँ कोई भविष्य नहीं है।”

तारा चुप रही।
वह भविष्य खरीदने नहीं आई थी—
वह एक मौका खरीद रही थी।

घर किसी घर से ज़्यादा
एक याद जैसा था—
ढीली लकड़ियाँ,
लटकता हुआ दरवाज़ा,
छत में छेद
जिनसे हवा सीटी की तरह गुजरती,
जैसे उसे भी भूख लगी हो।

चार साल की सीमा
अपनी माँ का हाथ कसकर पकड़कर बोली—

“माँ… यहीं?”

तारा ने गला निगला
और उस मज़बूती से बोली
जो वह अभी खुद महसूस नहीं कर पा रही थी—

“हाँ बेटी।
हम इसे धीरे-धीरे खड़ा करेंगे।”

पहली रात
वे पुरानी चादरों पर सोईं,
खेतों की आवाज़ें सुनते हुए।

सबसे छोटी राधा
नींद में बेचैन थी।

तारा जागती रही,
अपनी बेटियों को देखते हुए,
और सोचती रही—
क्या एक औरत की ताक़त
पूरी ज़िंदगी को सँभालने के लिए काफ़ी होती है?

सुबह होते ही
उसने बच्ची को साड़ी के पल्लू से पीठ पर बाँधा,
सबसे सादा और सच्चा औज़ार उठाया—
कुदाल
और आँगन में निकल पड़ी।

उसने काम को प्रार्थना की तरह किया।
छेद भरे,
लकड़ियाँ ठोंकीं,
बरसों की उपेक्षा साफ़ की।

कुछ ही दिनों में
पड़ोसी आने लगे—
मदद के लिए नहीं,
बल्कि फ़ैसला सुनाने।

वे बाड़ पर टिककर खड़े होते,
बाँहें मोड़े,
वैसे ही देखते
जैसे किसी और की गलती को देखा जाता है।

सबसे पहले आई
पार्वती काकी,
धूप में झुलसी, सख़्त औरत।

“आप ही नई मालकिन हैं?”
उसने पूछा।

तारा ने काम रोके बिना
सिर हिलाया।

—अकेली… दो छोटे बच्चों के साथ… इस ज़मीन पर —उसने जीभ चटखाई—।
यहाँ कुछ भी नहीं उगता। पिछला मालिक भी हार मानकर चला गया था।
आप ज़्यादा दिन नहीं टिकेंगी।

ये शब्द पत्थरों की तरह भारी थे।
तारा ने गहरी साँस ली।

—मैं आसानी से हार नहीं मानती।

पार्वती काकी सूखी हँसी हँसकर चली गईं।

और तारा लगी रही।

हफ्तों तक वह सामुदायिक कुएँ से पानी ढोती रही,
जो पैदल लगभग आधे घंटे की दूरी पर था।
सीमा उसके साथ एक छोटी-सी डिबिया लेकर चलती,
मदद करने पर गर्व महसूस करती।
राधा तेज़ गर्मी में छाँव में सो जाती।

तारा ने दाल, मक्का और कद्दू बोए।
अपने आख़िरी रुपये बीजों पर खर्च कर दिए—
जैसे कोई उम्मीद ख़रीद रहा हो।
उसने पानी दिया और इंतज़ार किया।

लेकिन अंकुर कमज़ोर निकले
और जल्दी ही मर गए,
मानो ज़मीन उन्हें स्वीकार ही न कर रही हो।

गाँव में फुसफुसाहटें बढ़ने लगीं।

“बेचारी बच्चियाँ…”

“वो औरत बहुत ज़िद्दी है।”

तारा सब सुनती थी।
लेकिन जब भी वह अपनी बेटियों को खेलते देखती,
उसे याद आता कि वह यहाँ क्यों है—
क्योंकि वे यह मानकर बड़ी नहीं हो सकती थीं
कि दुनिया ही एक औरत की किस्मत तय करती है।

एक रात, थकी हुई देह के साथ,
तारा ने धीमी आवाज़ में प्रार्थना की—

—हे भगवान,
मुझे नहीं पता मैंने सही किया या नहीं,
लेकिन मेरी बेटियों को मेरी ज़रूरत है।
अगर इस ज़मीन में कोई आशीर्वाद छुपा है,
तो मुझे दिखा दीजिए।

अगले दिन उसने एक ऐसा फ़ैसला लिया
जो एक साथ हताश भी था और साहसी भी।

अगर ऊपर की मिट्टी कुछ नहीं दे रही,
तो वह और गहराई तक जाएगी।

उसने खेत के एक कोने को चुना
और एक बड़ा गड्ढा खोदना शुरू किया।
हर फावड़ा
मिट्टी से एक लड़ाई थी।

पड़ोसी हँसने लगे—

—अपनी क़ब्र खोद रही है।

तारा ने जवाब नहीं दिया।
वह बस खोदती रही।

एक सुबह, जब गड्ढा काफ़ी गहरा हो चुका था,
मिट्टी की आवाज़ बदल गई।
तारा ने कुदाल मारी
और नमी महसूस की।

उसने फिर खोदा।
और तब उसने कुछ अलग सुना।

पानी…

पहले धीरे-धीरे,
फिर ज़ोर से।
साफ़, ज़िंदा,
गहराई से ऊपर उठता हुआ।

तारा घुटनों के बल गिर पड़ी—
भीगी हुई,
हँसती और रोती हुई एक साथ।

—सीमा! पानी!
हमारे पास पानी है!

सीमा की आँखें फैल गईं—

—माँ, ये कहाँ से आया?

—भगवान से, बेटी।

उस रात तारा सो नहीं पाई।
वह बहते सोते को देखती रही
और उन औरतों के बारे में सोचती रही
जो घड़े लेकर मीलों चलती थीं,
उन बच्चों के बारे में
जिनकी प्यास बुझती नहीं थी।

और उसके मन में एक सवाल उठा,
जो सोने से भी भारी था—

क्या आशीर्वाद
छुपाकर रखने के लिए होते हैं
या बाँटने के लिए?

उसने बाँटने का फ़ैसला किया।

उसने नालियाँ खोदीं,
पानी को बहने दिया।
कुछ ही दिनों में
उसका बगीचा हरा होने लगा।
हफ्तों में
उसकी ज़मीन
मीलों तक
इकलौती ज़िंदा ज़मीन बन गई।

पड़ोसियों की नज़र बदल गई।

पार्वती काकी फिर लौटीं।

—पानी कहाँ से लाईं?

—गहराई तक खोदकर —तारा ने कहा।

—क्या आप इसे बेचेंगी?

तारा ने सिर हिलाया।

—मैं नहीं बेचती।
जिसे ज़रूरत हो,
वह आ सकता है।

ख़बर तेज़ी से फैली।
पूरा परिवार घड़े लेकर आने लगा।
जब तक वह पानी बहता रहा,
कोई प्यास से नहीं मरा।


पानी के साथ
सम्मान भी आया।

एक दिन अनिल आया—
खुरदरे हाथों वाला एक किसान।

—आपका धन्यवाद करने आया हूँ —उसने कहा—
मेरी फ़सल आपकी वजह से बच गई।

वह बीज लाया—
मज़बूत दाल, सूखा सहने वाला मक्का।
वह अगले दिन फिर आया,
और उसके बाद भी।

उसने घर ठीक करने में मदद की,
बेहतर तरीके से खेती सिखाई।
सीमा उसे बहुत पसंद करती थी।
राधा उसे देखकर मुस्कुराती।

तारा को दोबारा प्यार करने से डर लगता था,
लेकिन उसके सीने में
कुछ धीरे-धीरे भरने लगा।

महीने बीते।
गाँव फलने-फूलने लगा।

तभी ख़तरा आया।

स्थानीय ज़मींदार
ठाकुर देवेंद्र सिंह का एक दूत
ज़मीन ख़रीदने का प्रस्ताव लेकर आया।

—यह ज़मीन बिकाऊ नहीं है —तारा ने कहा।

कुछ दिन बाद
कानूनी नोटिस आया—
पिछले मालिक का एक कथित पुराना कर्ज़।
तीस दिन में ज़मीन खाली करने का आदेश।

डर लौट आया।

लेकिन इस बार
तारा अकेली नहीं थी।

पुजारी ने पत्र लिखे।
पटवारी ने साबित किया
कि काग़ज़ नक़ली हैं।
पचास से ज़्यादा परिवारों ने याचिका पर हस्ताक्षर किए।
अनिल एक युवा वकील ले आया।

अदालत में
तारा ने उस सच्चाई से बात की
जिसके पास छुपाने को कुछ नहीं होता—

—जब यह ज़मीन बेकार थी,
तब किसी को नहीं चाहिए थी।
मैंने इसे जोता।
मैंने इसे बाँटा।
और अब,
क्योंकि इसकी क़ीमत है,
इसे मुझसे छीनना चाहते हैं।

जज ने सुना।
काग़ज़ देखे।
फ़ैसला दिया।

ज़मीन
तारा की थी।

ठाकुर हारकर चला गया—
एक ऐसी चीज़ से पराजित होकर
जिसे वह समझ नहीं पाया:
एकजुट गाँव।

ज़िंदगी आगे बढ़ी।

सीमा ने बिना किसी सिखाए
अनिल को “पापा” कहना शुरू कर दिया।

एक दिन, बगीचे में,
अनिल घुटनों के बल बैठा,
एक सादा सा छल्ला हाथ में लिए—

—इसलिए नहीं कि तुम्हें मेरी ज़रूरत है —उसने कहा—
बल्कि इसलिए कि
मुझे तुम सबकी ज़रूरत है।

तारा ने हाँ कह दिया।

गाँव के मंदिर में उनकी शादी हुई—
खेतों के फूलों के साथ,
बच्चों की हँसी के बीच।

वह सिर्फ़ एक शादी नहीं थी;
वह इस बात का सबूत थी
कि उम्मीद
नुक़सान से ज़्यादा ताक़तवर होती है।

सालों के साथ ज़मीन फली-फूली।
उनका एक बेटा हुआ।
सोता बहता रहा।
रेगिस्तान
बाग़ बन गया।


और जब तारा,
बालों में सफ़ेदी लिए,
शाम को बैठकर
अपने पोते-पोतियों को पानी के पास खेलते देखती,
तो वह उस ज़मीन का असली रहस्य समझती—

वह सिर्फ़
मिट्टी के नीचे छुपा एक सोता नहीं था।

वह एक सबक था
उन सबके लिए
जो खोदने की हिम्मत करते हैं।

क्योंकि कभी-कभी
सबसे बड़ा ख़ज़ाना
सतह पर नहीं होता।

कभी-कभी
वह नीचे होता है—
किसी ऐसे इंसान का इंतज़ार करता हुआ
जिसके पास विश्वास,
ईमानदार मेहनत
और
खोदते रहने का साहस हो…

तब भी,
जब पूरी दुनिया हँस रही हो।

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