डोना रोज़ा ने आख़िरी भुट्टों के दानों को सावधानी से छीलकर निकाला, मोटे रेशों से बाँधा और काग़ज़ में लपेट दिया, ठीक वैसे ही जैसे वह तब से करती आ रही थी जब मिगेल छोटा था। ये सबसे अच्छे भुट्टे थे—मोटे, नरम, बराबर दानों वाले, सुबह सूरज निकलने से पहले ही तोड़े गए। उसने उन्हें एक पुरानी, रंग उड़ी हुई बाज़ार की थैली में सजा दिया। यही उसकी थोड़ी-सी खेती थी, जिसे ज़रूरत पड़ने पर वह गाँव में बेचकर ज़िंदा रहती थी।

एक पल के लिए वह उन्हें देखती रह गई, जैसे वे कोई जीवित स्मृति हों—खेतों की मिट्टी की खुशबू, चूल्हे का धुआँ, और मुँह में भुट्टा भरे भागते बच्चे की हँसी।
“कल ज़रूर भेज दूँगी,” उसने बुदबुदाया, हालाँकि वह जानती थी कि अब वह खाने से ज़्यादा उम्मीद भेज रही थी।
घर छोटा था—सीमेंट की दीवारें, बिना रंग की, और एक खिड़की जिसमें दरार थी, जहाँ से पहाड़ों की ठंडी हवा अंदर घुस आती थी। उसी खिड़की के पास लकड़ी की एक शेल्फ़ पर काँच का जार रखा था, जिसमें डोना रोज़ा सालों से सिक्के जमा करती आ रही थी। ज़्यादा नहीं थे, लेकिन वही उसका चुपचाप दुनिया से कहना था—
“मैं कर सकती हूँ।”
उसने जार खोला, सिक्के मेज़ पर उँडेल दिए और धीरे-धीरे गिनने लगी, जैसे कोई दिल की धड़कनें गिन रहा हो।
काफ़ी नहीं थे।
“अभी भी कम हैं… अगर मिगेल को ज़रूरत पड़े तो,” उसने खुद से कहा और सिक्कों को फिर एक-एक कर वापस डाल दिया। वह आवाज़ उसे हमेशा तसल्ली देती थी।
उस रात वह ठीक से सो नहीं पाई। बाहर खेत बिल्कुल चुप था। न झींगुर, न मेंढक। बस वह अजीब सन्नाटा, जैसा तेज़ ओलों की बारिश के बाद रह जाता है—जैसे धरती भी बोलना भूल गई हो।
अगली सुबह वह बस पकड़कर शहर की ओर निकली। छह घंटे का सफ़र—अंतहीन मोड़, सड़क किनारे फल की ठेलियाँ, फीके पड़े विज्ञापन, लोकगीतों की आवाज़ जो इंजन के शोर में घुल जाती थी, और थकान जो हड्डियों तक चिपक जाती थी। उसने थैली को सीने से लगाए रखा, जैसे उसमें सिर्फ़ भुट्टे नहीं, कुछ और भी हो।
वह शहर पहुँची—पीठ झुकी हुई, खेतों में बिताई अनगिनत सुबहों के बोझ से, और दिल ज़िद्दी, बेटे की बाँहों में मिलने वाले एक आलिंगन की उम्मीद से चिपका हुआ।
मिगेल उसे इमारत के बाहर मिला, एक चौड़ी सड़क के पास, जहाँ गाड़ियाँ ऐसे दौड़ रही थीं मानो उन्हें जीने की जल्दी हो। उसकी कमीज़ करीने से इस्त्री की हुई थी, महँगी घड़ी, चमकते जूते। हर चीज़ से शहर और दूरी की गंध आ रही थी।
“ऊपर नहीं चलें?” उसने अपार्टमेंट की खिड़कियों की ओर देखते हुए पूछा।
मिगेल ने गला साफ़ किया।
“यहीं ठीक है, माँ। लोरेना व्यस्त है… और आज ससुर जी आने वाले हैं।”
डोना रोज़ा ने सूखी लार निगली। वह कहना चाहती थी—“मैं बोझ नहीं हूँ,”
लेकिन शब्द गले में ऐसे अटक गए जैसे ठीक से न चबाई गई रोटी। उसकी जगह उसने थैली खोली और गर्व से भुट्टे दिखाए।
“तेरे लिए लाई हूँ… अच्छे वाले। जैसे तुझे पसंद थे।”
मिगेल ने बस एक नज़र डाली। उन्हें हाथ तक नहीं लगाया। अपनी घड़ी देखी। उसने कभी नहीं पूछा कि वे कहाँ से आए, या उन्हें उगाने में माँ को क्या कीमत चुकानी पड़ी।
उसने उसे ओलों की बारिश के बारे में बताया—नष्ट हुई फ़सल, बढ़ता कर्ज़, सूखी ज़मीन। वह धीरे बोली, जैसे नाकामी सुन लेगी तो हँस पड़ेगी।
मिगेल ने जेब से कुछ नोट निकाले, जैसे कोई ज़ख़्म पर पट्टी रखता है।
“माँ, आप हमेशा संभल जाती हो। खेत आपका काम है। वहाँ आप बेहतर रह लेती हो।”
डोना रोज़ा उसे देखती रह गई, समझ नहीं पाई।
“अगर मैं कुछ दिन रुक जाऊँ? बस… जब तक कुछ सोच लूँ। ऐसे लौटने से डर लगता है, मिगेल।”
मिगेल एक क़दम पीछे हटा। अचानक नहीं—लेकिन साफ़ था।
“नहीं माँ… सच में। ससुर आ रहे हैं। और लोरेना… तुम जानती हो।”
वह इशारा रोज़ा के सीने में चुभ गया। बात मना करने की नहीं थी—बात गंध की थी। उसके हाथों से मिट्टी, लकड़ी और मेहनत से जी गई ज़िंदगी की महक आती थी। और यहाँ… वही एक समस्या थी।
मिगेल ने कार का दरवाज़ा खोला।
“बाद में फ़ोन करता हूँ,” उसने जल्दी से कहा, बिना गले लगाए।
कार चली गई।
डोना रोज़ा फुटपाथ पर अकेली खड़ी रह गई—हाथ में नोट, और कंधे से लटकी भुट्टों की थैली, जैसे कोई अतिरिक्त बोझ। शहर उसे बहुत बड़ा और बहुत ठंडा लगा। वह बस अड्डे की ओर चल पड़ी, जैसे कोई बिना मंज़िल के चलता है।
प्लेटफ़ॉर्म पर, रूमाल ढूँढते हुए, उसके हाथ से एक पीला-सा लिफ़ाफ़ा गिर पड़ा। उसने खोला नहीं। अब और काग़ज़ों का सामना करने की ताक़त नहीं थी। ड्राइवर ने शीशे से देखा।
“सब ठीक है, अम्मा?”
डोना रोज़ा ने बिना बोले सिर हिला दिया।
जब शहर की रोशनियाँ पीछे छूट गईं, उसने थैली खोली। भुट्टे वैसे ही थे। मिगेल ने उन्हें छुआ तक नहीं था। बगल की सीट पर बैठी औरत ने भूखी नज़र से देखा।
“भुट्टे हैं?”
“हाँ,” रोज़ा ने बिना किसी भाव के कहा।
“ले लो। वरना खराब हो जाएँगे।”
औरत ने उन्हें ऐसे लिया जैसे कोई खज़ाना मिला हो। उसने रोज़ा को दया से देखा—
और वह नज़र भी उतनी ही चुभने वाली थी…
डोना रोज़ा ने खिड़की की ओर देखा और बाहर के दृश्य को अपने भीतर उतरने दिया—पहाड़ियाँ, परछाइयाँ, उड़ती धूल।
वह तड़के गाँव पहुँची। बस अड्डा बंद था। खाली थैली हाथ में लिए वह कच्चे रास्ते पर चलती गई, अपने ही कदमों की चरमराहट सुनती हुई। घर में घुसते ही उसने थैली मेज़ पर रख दी और वहीं खड़ी रह गई—बिल्कुल स्थिर।
“जब मिगेल को ज़रूरत पड़े,” उसने फिर फुसफुसाया,
और पहली बार वह वाक्य उसे कड़वा लगा।
रसोई की खामोशी में उसे एक और दिन याद आया—वह जवान थी, साप्ताहिक हाट में खड़ी, तीन बकरियाँ रस्सी से बँधी हुई। एक आदमी ने उसके हाथ में नोटों की एक गड्डी रख दी। डोना रोज़ा ने पैसे गिने, सीधे स्कूल गई और मिगेल की फ़ीस जमा कर दी। लड़का नई किताबों और बैग के साथ दौड़ता हुआ बाहर निकला, ऐसे मुस्कुराता जैसे ज़िंदगी बहुत आसान हो।
“धन्यवाद, माँ।”
उसके हाथों से बकरी की गंध आ रही थी।
और उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा।
क्योंकि वह गंध… प्यार थी।
वह वर्तमान में लौटी और अपने हाथों को देखा—मिट्टी से काले पड़े नाख़ून, फटी हुई त्वचा, उभरी नसें। उसने जेब से ज़मीन के काग़ज़ निकाले। काग़ज़ मुड़े हुए थे, पीले पड़ चुके। उसने उन्हें ध्यान से नहीं देखा; बस खिड़की की दरार ढकने के लिए लगा दिया। फिर बिना खाना खाए लेट गई।
अगली सुबह ज़मीन सूखी थी, दरारों से भरी हुई। डोना रोज़ा झुकी, एक मुट्ठी धूल उठाई और उँगलियों के बीच से गिरने दी।
“अब मैं क्या करूँ?”
उसने हवा से पूछा।
कोई जवाब नहीं आया।
वह गाँव की दुकान पहुँची—कर्मेलो की किराने की।
“नमस्ते, कर्मेलो जी।”
“नमस्ते, रोज़ा।”
“थोड़े से दाल और थोड़ा सा चावल चाहिए… जैसे ही हो पाए, पैसे दे दूँगी।”
कर्मेलो ने सिर हिलाया।
“रोज़ा, तुम तीन महीने से उधार में हो।”
“मुझे पता है… लेकिन ओलों की मार—”
“अब और उधार नहीं दे सकता।”
शर्म उसके चेहरे तक चढ़ आई।
“मैं काम कर लूँगी। गोदाम साफ़ कर दूँगी। जो कहो।”
कर्मेलो ने गहरी साँस ली।
“ठीक है। गोदाम साफ़ करो—एक किलो दाल मिल जाएगी।”
झाड़ू लगाते हुए उसने डोना एस्पेरांज़ा को बुदबुदाते सुना—
“अजीब है… शहर में इतना अच्छा चल रहा है बेटे का, और माँ को ऐसे छोड़ दिया।”
डोना रोज़ा ने सिर नहीं उठाया।
उसने सीख लिया था—रोना कर्ज़ नहीं चुकाता।
उसी दिन एक चमचमाती गाड़ी उसके खेत के सामने आकर रुकी।
उधर शहर में मिगेल अपनी ही सूखे से जूझ रहा था—घाटे के आँकड़े, ससुर के फ़ोन, महँगे झूठ।
फिर एक दिन उसने ख़बरों में अपनी माँ को देखा—लिथियम के लिए करोड़ों का समझौता साइन करते हुए।
ज़मीन उसके पैरों के नीचे से खिसक गई।
उसने झूठ बोला था कि उसकी माँ मर चुकी है।
और अब… वह पहले से कहीं ज़्यादा ज़िंदा थी।
मिगेल ने सब खो दिया—नौकरी, शादी, और अपना घमंड।
वह वापस खेत लौटा।
“माँ…”
डोना रोज़ा ने बिना जल्दबाज़ी उसे देखा।
“मिगेल।”
“मैं माफ़ी माँगने आया हूँ।”
“मैं तुम्हें बहुत पहले माफ़ कर चुकी हूँ,” उसने कहा।
“लेकिन माफ़ कर देना हमेशा दरवाज़ा फिर से खोल देना नहीं होता।”
मिगेल समझ गया—बहुत देर से।
डोना रोज़ा अपनी ज़मीन पर ही रही—सम्मान के साथ, शांति में।
और अगर इस कहानी ने कुछ छोड़ा, तो बस यही—
इंसान फ़सल खो सकता है,
पैसा खो सकता है,
यहाँ तक कि अपने लोग भी…
लेकिन कभी अपनी इज़्ज़त नहीं खोनी चाहिए।
क्योंकि इज़्ज़त न खरीदी जाती है,
न विरासत में मिलती है।
इज़्ज़त कमाई जाती है,
उसकी रक्षा की जाती है,
और उसे सम्मान दिया जाता है—
भले ही कोई तुम्हें
हाथ में भुट्टों की थैली लिए
इंतज़ार में छोड़ दे।