तलाक के केस में जब अमीर पिता ने माँ को ‘अक्षम’ साबित करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया, तब 10 साल की बेटी ने अपने बैग से वो चीज़ निकाली जिसने जज के होश उड़ा दिए और बाप को जेल पहुँचा दिया!
दिल्ली की सुबह कोहरे की चादर में लिपटी थी। लक्ष्मी नगर की तंग गलियां अभी पूरी तरह जाग नहीं पाई थीं, बस कुछ बाइक और रिक्शा की आवाज़ें आ रही थीं। मैं, माया, भारी मन से लक्ष्मी नगर जिला अदालत (District Court) की सीढ़ियां चढ़ रही थी। मेरे हाथ में तलाक के वो कागजात थे जो मेरे पूर्व पति, आर्यन, ने दो महीने पहले दाखिल किए थे। हम कभी पति-पत्नी थे, हमने एक खुशहाल परिवार का सपना देखा था, लेकिन आज वह वहां खड़ा होकर आत्मविश्वास से मुस्कुरा रहा था, जैसे पूरी दुनिया उसकी मुट्ठी में हो।

मेरी दस साल की बेटी, दीया, ने मेरा हाथ कसकर पकड़ रखा था। उसकी मासूम आँखों में एक ऐसी हिम्मत थी जिसने मुझे हैरान कर दिया। वह इस तलाक और लड़ाई के बारे में सब जानती थी, लेकिन मैंने कभी नहीं सोचा था कि आज वह इस अदालत में सबसे बड़ी गवाह बनकर उभरेगी।
आर्यन अपने वकीलों के साथ बैठा था, उसके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान थी। वह दीया की कस्टडी (Custody) जीतना चाहता था, जबकि उसने कभी उसकी परवाह नहीं की थी। मैंने दीया के लिए अपनी रातों की नींद और चैन सब कुर्बान कर दिया था, और आर्यन अब सिर्फ अपनी संपत्ति और रसूख के दम पर उसे छीनना चाहता था।
जैसे ही जज साहब ने कमरे में प्रवेश किया, सन्नाटा छा गया। जज एक बुजुर्ग व्यक्ति थे, जिनकी आँखों में सालों का अनुभव और कड़ाई थी। उन्होंने कार्यवाही शुरू की: — “श्रीमती माया और श्री आर्यन के बीच तलाक और बच्ची की कस्टडी का मामला शुरू किया जाए।”
आर्यन तुरंत खड़ा हुआ और आत्मविश्वास से बोलने लगा। उसने अपनी ऊँची नौकरी, आलीशान घर और सुख-सुविधाओं का बखान किया। वह मुझे एक “अक्षम माँ” साबित करने पर तुला था। मैं चुपचाप सुनती रही, उसकी बातें काँटों की तरह चुभ रही थीं। लेकिन मुझे पता था कि सच वो नहीं है जो वह कह रहा है, बल्कि सच वो है जो दीया ने अपनी आँखों से देखा है।
जब जज ने मुझसे पूछा, तो मैंने बस इतना कहा: — “हुज़ूर, मैं बस इतना चाहती हूँ कि मेरी बेटी एक ऐसे माहौल में रहे जहाँ उसे प्यार और सुरक्षा मिले।”
अब दीया की बारी थी। वह खड़ी हुई, उसकी आवाज़ छोटी थी पर स्थिर: — “हुज़ूर… क्या मैं आपको कुछ दिखा सकती हूँ जो मेरी माँ को भी नहीं पता?”
पूरा कोर्ट रूम शांत हो गया। आर्यन के चेहरे पर घबराहट की एक लकीर खिंच गई। जज ने सिर हिलाया, “हाँ बेटा, दिखाओ।”
दीया ने अपने स्कूल बैग से एक छोटा फोन निकाला और एक वीडियो चलाया। जैसे ही वीडियो शुरू हुआ, कोर्ट में मौजूद हर शख्स की साँसें थम गईं। वीडियो में आर्यन नशे की हालत में दीया के कमरे में उसे डांट रहा था, धमका रहा था और यहाँ तक कि उसने हाथ भी उठाया था। वीडियो में दीया की सिसकियाँ गूँज रही थीं: “पापा, प्लीज… मुझे मत मारो…”
वीडियो चलता रहा—उसमें कैद था कि कैसे आर्यन दीया को घर में अकेला छोड़ देता था, उससे उसकी उम्र से ज़्यादा काम करवाता था और उसे डराकर रखता था कि वह अपनी माँ को कुछ न बताए।
आर्यन का चेहरा सफेद पड़ गया। वह चिल्लाया, “यह झूठ है! यह वीडियो नकली है!” लेकिन सच सबके सामने था। जज की आँखें गुस्से से लाल हो गईं। उन्होंने आर्यन की ओर देखा और कड़क आवाज़ में पूछा: — “मिस्टर आर्यन, क्या आपके पास इस क्रूरता का कोई स्पष्टीकरण है?”
आर्यन के पास कोई शब्द नहीं थे। उसकी सारी होशियारी धरी की धरी रह गई। दीया आकर मेरे पास बैठ गई। मैंने अपनी आँखों के आँसू पोंछे। मेरी छोटी सी बच्ची ने वो कर दिखाया था जो बड़े-बड़े नहीं कर पाते।
जज साहब खड़े हुए और अपना फैसला सुनाया: — “इन पुख्ता सबूतों के आधार पर और बच्ची की भलाई को ध्यान में रखते हुए, यह अदालत दीया की पूरी कस्टडी माँ (माया) को देती है। श्री आर्यन को बाल उत्पीड़न (Child Abuse) के तहत दोषी माना जाता है और उनसे मिलने के अधिकार भी छीने जाते हैं।”
कोर्ट रूम में सन्नाटा टूट गया। मैंने दीया को गले से लगा लिया और फूट-फूटकर रोने लगी। उसने धीरे से मेरे कान में कहा: — “माँ, मुझे पापा से बहुत डर लगता था… लेकिन अब हम सुरक्षित हैं ना?”
मैंने उसके माथे को चूमा, “हाँ बेटा, अब तुम हमेशा मेरे पास सुरक्षित रहोगी।”
जब हम अदालत से बाहर निकले, तो दिल्ली की धूप खिली हुई थी। लक्ष्मी नगर की सड़कें अब भी वैसी ही थीं, लेकिन मेरे लिए सब कुछ बदल चुका था। हमने एक बहुत बड़े तूफान का सामना किया था और जीत हमारी हुई थी।
आने वाले दिनों में आर्यन को अपनी गलतियों की सजा भुगतनी पड़ी। दीया अपनी सामान्य ज़िंदगी में लौट आई—स्कूल जाना, दोस्तों के साथ खेलना—लेकिन उसके दिल में वह साहस हमेशा के लिए बस गया। मुझे गर्व था कि मेरी दस साल की बेटी इतनी निडर थी।
रात में जब मैं उसे सोते हुए देखती हूँ, तो मेरा दिल शुक्रगुज़ार होता है। उस दिन सत्य की जीत हुई थी। दीया ने साबित कर दिया था कि अगर एक बच्चा भी हिम्मत जुटा ले, तो वह अपनी किस्मत बदल सकता है।
