सबसे आखिर में आती मैं – एक बहू की चुप्पी से आत्मसम्मान तक की कहानी

सबसे आखिर में आती मैं – एक बहू की चुप्पी से आत्मसम्मान तक की कहानी.

हर घर में खाना बनता है, लेकिन हर किसी की थाली बराबर नहीं होती। यह कहानी है एक ऐसी बहू की, जो सबका ध्यान रखती रही, पर खुद हमेशा सबसे पीछे रह गई। बिना शिकायत किए, बिना आवाज़ उठाए उसने रिश्ते निभाए। लेकिन जब उसने खुद को महत्व देना सीखा, तब उसका नहीं—पूरा घर बदल गया। “सबसे आखिर में आती मैं” उन अनकही भावनाओं की कहानी है, जो अक्सर चुप रह जाती हैं।

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“माँ जी, आज तो मैंने काजू मटर पनीर की सब्ज़ी बनाई थी…” रसोई के एक कोने में खड़ी अनन्या की आवाज़ न तो कठोर थी, न ही शिकायत से भरी। उसमें बस एक हल्की-सी हैरानी और उम्मीद थी। सामने गैस पर कढ़ाही रखी थी, जिसमें से भाप उठ रही थी। सास शारदा देवी तवे पर रोटियाँ सेंक रही थीं। उन्होंने ऊपर देखे बिना ही जवाब दिया, “वो सब्ज़ी तो खत्म हो गई बहू। सबने खा ली।”

 

अनन्या कुछ पल चुप रही। फिर उसने धीरे से पूछा, “सबने… मतलब कौन-कौन माँ जी?”

शारदा देवी ने रोटी पलटते हुए कहा, “अरे हम लोग। मैं, तेरे ससुर जी, तेरा पति अमन, ननद काव्या और देवर निखिल। सबको बहुत पसंद आई थी। सबने दो-दो रोटियाँ खा लीं। तू देर से आई, तो अब क्या करूँ?”

अनन्या ने गहरी सांस ली और शांत स्वर में बोली, “मैं देर से इसलिए आई थी क्योंकि अमन का टिफिन बना रही थी। आपने ही तो कहा था कि ऑफिस के लिए ढंग की सब्ज़ी होनी चाहिए।”

रसोई में कुछ पल की खामोशी छा गई। बाहर हॉल से टीवी की आवाज़, हँसी-मज़ाक और काव्या की खिलखिलाहट आ रही थी। यह खामोशी भारी नहीं थी, लेकिन अनन्या के मन पर बोझ ज़रूर डाल रही थी।

यह घर गाज़ियाबाद के पास एक कस्बे में था—तीन मंज़िला मकान, बीच में छोटा-सा आँगन। हर सुबह यहाँ आवाज़ों से दिन की शुरुआत होती थी—काव्या की कॉलेज की जल्दी, निखिल का मोबाइल पर गाने सुनना, शारदा देवी की पूजा की घंटी और ससुर जी के अख़बार की सरसराहट। अमन एक निजी कंपनी में नौकरी करता था। समय का पाबंद, मेहनती, लेकिन घर की उलझनों से हमेशा दूर। जब भी अनन्या किसी बात का ज़िक्र करती, उसका जवाब एक-सा होता—“ऑफिस में बहुत टेंशन रहती है।”

शादी के शुरुआती कुछ हफ्तों तक अनन्या को लगता था कि वह बहुत भाग्यशाली है। सास उसकी तारीफ़ करती थीं, पति ध्यान रखता था, ननद उससे हँस-बोल लेती थी। लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, रसोई और ज़िम्मेदारियों का बोझ बढ़ता गया और अपनापन कहीं पीछे छूटता चला गया।

उस दिन रात को पूरा परिवार एक साथ खाने बैठा। शारदा देवी ने सबको रोटी, दाल, रायता और वही मटर पनीर परोसा। सब्ज़ी देखकर अनन्या का मन ठिठक गया—तो सब्ज़ी बची थी…

निखिल बोला, “भाभी, आज तो सब्ज़ी बहुत ज़बरदस्त बनी थी। मैंने तो दो बार खाई।”

अनन्या ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “अच्छा लगा सुनकर।”

तभी सास ने जोड़ दिया, “हाँ, बनाती तो ठीक है, लेकिन खाना थोड़ा कम बनाती है। घर बड़ा है, हाथ खुला रखना चाहिए।”

अनन्या ने बेहद संयम के साथ जवाब दिया, “माँ जी, आपने ही तो कहा था कि कम बनाना चाहिए, ताकि बर्बादी न हो।”

“अरे वो तो ऐसे ही कह दिया था,” शारदा देवी ने बात पलट दी, “अब हर बात पकड़ लिया करेगी क्या?” और फिर निखिल के इंटरव्यू की बात छेड़ दी।

अनन्या चुप हो गई। उसे समझ आ गया था कि उसकी बातों का यहाँ कोई महत्व नहीं।

अगली सुबह रविवार थी। घर में हलचल थी—कोई झाड़ू लगा रहा था, कोई कपड़े धो रहा था। अमन देर तक सो रहा था। अनन्या ने सोचा, आज उसके लिए ब्रेड पकौड़े बना दूँगी। जब वह रसोई में पहुँची तो देखा, शारदा देवी पहले से तवा गर्म कर रही थीं।

“माँ जी, मैं बना लूँ?”

“नहीं, आज रहने दे। तू रोज़ तो बनाती ही है।”

थोड़ी देर बाद रसोई से खुशबू आई, लेकिन वो पकौड़ों की नहीं, बेसन की कढ़ी की थी।

अनन्या ने संकोच से पूछा, “अमन को तो ब्रेड पकौड़े पसंद हैं…”

“काव्या ने कढ़ी माँगी है,” सास ने कहा, “सबको वही मिलेगा।”

अमन किचन में आया, आँखें मलते हुए बोला, “वाह, कढ़ी! ठीक है।”

अनन्या ने उसके लिए परोसा और खुद भी खाने बैठ गई। हर निवाले के साथ उसके मन में एक ही सवाल चुभता रहा—इस घर में मेरा हिस्सा हमेशा सबसे बाद में क्यों आता है?

शाम को पड़ोस में पूजा थी। सास-ससुर और काव्या वहाँ चले गए। निखिल दोस्तों के साथ बाहर था। घर में सिर्फ अनन्या और अमन थे।

अमन बोला, “चलो आज बाहर से मँगवा लेते हैं। तुम्हें भी आराम मिल जाएगा।”

अनन्या मुस्कुराई, “क्या मँगवाएँ?”

“मटर पनीर।”

अनन्या की मुस्कान ठहर गई। “जिस दिन मैंने बनाया था, उस दिन मैं खुद नहीं खा पाई थी।”

अमन थोड़ा असहज हो गया, “अरे… अगली बार पहले तुम खा लेना।”

अनन्या ने सिर झुका लिया, लेकिन इस बार उसकी मुस्कान में कमज़ोरी नहीं, एक निर्णय था।

अगली सुबह उसने तय कर लिया—अब वह खुद को सबसे आखिर में नहीं रखेगी।

उस दिन रसोई से अलग-सी खुशबू आ रही थी। शारदा देवी ने पूछा, “आज क्या बना रही हो?”

अनन्या ने आत्मविश्वास से कहा, “नाश्ते में उपमा, फ्रूट सलाद… और अमन के लिए अलग से आलू पराठे।”

सास ने भौंहें चढ़ाईं, “इतना झंझट क्यों?”

“सबका ध्यान रखना ज़रूरी है,” अनन्या ने शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा।

जब अमन ऑफिस जाने लगा, अनन्या ने टिफिन देते हुए कहा, “आज पहले तुम नहीं, मैं खाऊँगी।”

अमन हँस पड़ा, “आज तो तेरी आवाज़ में दम है।”

अनन्या ने मन ही मन कहा—अब दम रखना ही होगा, वरना मैं इस घर में हमेशा आख़िरी ही रह जाऊँगी।

दोपहर का समय था। शारदा देवी की किटी पार्टी थी और घर में अलग ही चहल-पहल थी। ड्राइंग रूम में सजावट चल रही थी—टेबल पर सलीके से सजे स्नैक्स, कुर्सियों की कतार, ट्रे में रखे चाय के कप। अनन्या अकेले सब कुछ संभाल रही थी। कभी परदे ठीक कर रही थी, कभी फूलदान सजा रही थी, तो कभी रसोई से चाय लेकर बाहर आ जाती थी। थोड़ी ही देर में किटी की सहेलियाँ आ गईं—सुमन आंटी, वीना जी और मीनाक्षी दीदी। सब बैठकर हँसी-मज़ाक करने लगीं।

सुमन आंटी ने चारों ओर नज़र घुमाकर कहा, “अरे शारदा, तुम्हारी बहू तो बड़ी समझदार लगती है। इतनी जल्दी सब कुछ संभाल लिया।”

शारदा देवी ने हल्के से मुस्कुराकर कहा, “हाँ, सीख रही है… धीरे-धीरे।”

अनन्या चाय लेकर आई और बड़े आदर से बोली, “माँ जी, आपने जो सजावट सिखाई थी, उसी तरह करने की कोशिश की है।”

शारदा देवी ने पहली बार बिना किसी टिप्पणी के सिर हिलाया, “अच्छा किया।”

किटी पार्टी हँसी-मज़ाक में खत्म हो गई, लेकिन जाते-जाते वीना जी ने जो कहा, वह शारदा देवी के मन में देर तक गूंजता रहा। “शारदा, तेरी बहू बड़ी खुशमिज़ाज है। घर में अब अलग ही रौनक आ गई है।”

शारदा देवी हँसते हुए बोलीं, “हाँ… अब वो थोड़ी खुलने लगी है।”

शाम को जब पूरा परिवार साथ बैठा था, पापा जी ने अख़बार रखते हुए कहा, “कल मोहल्ले में दिवाली की मीटिंग है। इस बार हमारे घर की लाइटिंग की ज़िम्मेदारी अनन्या को दे देते हैं। ये अच्छे से कर लेगी।”

शारदा देवी कुछ कहने ही वाली थीं, लेकिन पापा जी ने बात आगे बढ़ा दी, “अब घर की छोटी-बड़ी बातों में बहू की राय भी ज़रूरी है।”

यह पहली बार था जब किसी ने खुले तौर पर अनन्या पर भरोसा जताया था।

अनन्या ने मुस्कुराकर कहा, “धन्यवाद पापा जी, मैं पूरी कोशिश करूँगी।”

निखिल बोला, “भाभी, लाइटिंग मैं संभाल लूँगा।”

काव्या ने उत्साह से कहा, “और मैं रंगोली बनाऊँगी।”

पूरा घर जैसे एक टीम बन गया था। शारदा देवी चुप थीं, लेकिन उनके भीतर कहीं न कहीं संतोष ने जगह बना ली थी।

अगली सुबह से ही तैयारियाँ शुरू हो गईं। अनन्या बाज़ार से रंग-बिरंगी लाइटें और फूल लेकर आई। काव्या और निखिल उसके साथ थे। शारदा देवी ने पूजा की तैयारी संभाली। शाम होते-होते पूरा घर रोशनी से नहा उठा।

पड़ोस की एक आंटी ने आकर कहा, “वाह शारदा जी, आपका घर तो सबसे सुंदर लग रहा है।”

शारदा देवी ने गर्व से कहा, “हाँ, हमारी बहू ने सब संभाला है।”

यह कहते समय उनके चेहरे पर पहली बार एक सच्ची मुस्कान थी—जिसमें न तंज था, न तुलना।

दिवाली की शाम सबने मिलकर खाना खाया। आज फिर मटर पनीर बना था, लेकिन इस बार कहानी अलग थी। अनन्या ने पहले सबकी प्लेट में परोसा और फिर खुद भी बैठ गई।

पापा जी बोले, “बहू, आज तो कमाल कर दिया।”

काव्या हँसते हुए बोली, “भाभी, तुम्हारे हाथों में कुछ अलग ही बात है।”

निखिल ने मुस्कुराकर कहा, “क्योंकि इसमें मन लगा होता है।”

शारदा देवी कुछ देर चुप रहीं, फिर बोलीं, “अच्छा है कि तू सबका ध्यान रखती है। मैं सोचती थी तू कम बोलती है, पर अब समझ में आया—तू सही वक्त पर बोलती है।”

अनन्या मुस्कुराई, “माँ जी, घर में आवाज़ ज़रूरी होती है… बस वो मीठी होनी चाहिए।”

अमन ने धीरे से कहा, “और अब मैं वो आवाज़ सुनूँगा भी।”

पूरा घर हँसी से गूंज उठा।

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नवंबर की ठंडी हवा खिड़कियों से अंदर झाँकने लगी थी। रसोई में चाय की भाप उठ रही थी। अनन्या रोटियाँ बेल रही थी। घर में अब पहले जैसी खामोशी नहीं थी, बल्कि एक जीवंत हलचल थी। काव्या अपनी शादी की तस्वीरें देख रही थी—अगले महीने उसकी शादी तय हो चुकी थी। निखिल ने नौकरी का इंटरव्यू क्लियर कर लिया था। अमन अब पहले से ज़्यादा घर से जुड़ने लगा था।

शादी की तैयारियों में अनन्या सबसे आगे थी—साड़ियाँ प्रेस करवाना, मेहमानों की लिस्ट बनाना, मिठाई का ऑर्डर देना। एक दोपहर जब सब बाज़ार गए थे, घर में सिर्फ अनन्या और शारदा देवी थीं।

शारदा देवी ने धीमे स्वर में कहा, “बहू, तूने सब कुछ बहुत अच्छे से संभाल लिया। मुझे डर लग रहा था कि ये बड़े काम कैसे होंगे।”

अनन्या ने मुस्कुराकर कहा, “माँ जी, जब घर अपना हो तो काम बोझ नहीं लगते।”

कुछ पल की चुप्पी के बाद शारदा देवी की आवाज़ भर आई, “शायद मैं तुझ पर कभी-कभी ज़्यादा सख्त हो जाती थी।”

अनन्या ने सहज भाव से कहा, “थोड़ी सख्ती ज़रूरी भी होती है माँ जी, तभी घर चलता है।”

शारदा देवी की आँखें नम हो गईं, “आज पहली बार लगा कि तू सिर्फ बहू नहीं… बेटी भी है।”

अनन्या ने उनका हाथ थाम लिया, “बेटियाँ माँ से कभी रूठती नहीं।”

शादी से दो हफ्ते पहले पापा जी की तबीयत अचानक बिगड़ गई। घर में अफरा-तफरी मच गई। शारदा देवी घबराकर डॉक्टर को फोन कर रही थीं। अमन ऑफिस से दौड़ता हुआ आया। अनन्या ने बिना घबराए सब संभाल लिया—दवाइयाँ, डॉक्टर, रात भर उनकी देखभाल।

पापा जी ने कमजोर आवाज़ में कहा, “बहू, तू तो हमारे लिए लक्ष्मी बनकर आई है।”

अनन्या ने नम आँखों से कहा, “आप जल्दी ठीक हो जाइए, बस यही चाहिए।”

डॉक्टर ने मुस्कुराकर कहा, “अब चिंता की बात नहीं है।”

शादी के दिन घर रोशनी, मेहमानों और खुशियों से भर गया। अनन्या लाल साड़ी में सजी थी—माथे पर बिंदी, बालों में गजरा और चेहरे पर आत्मविश्वास। हर कोई कह रहा था, “शारदा जी, आपकी बहू तो कमाल है।”

शारदा देवी गर्व से कहतीं, “हाँ, हमारी अनन्या है ही ऐसी।”

विदाई के समय शारदा देवी और अनन्या—दोनों की आँखों में आँसू थे।

समय बीतता गया। एक साल बाद घर की दीवारों के रंग भी बदले और रिश्तों के भी। निखिल की नौकरी लग गई। काव्या की गोद में नन्हा बच्चा था। पापा जी रोज़ पार्क जाते थे। और शारदा देवी अब हर फैसले में अनन्या से सलाह लेती थीं।

एक दिन सुमन आंटी ने कहा, “शारदा, तेरी बहू तो सबकी पसंद बन गई है।”

शारदा देवी ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “क्योंकि उसने सिर्फ खाना नहीं… रिश्ते भी पकाए हैं।”

अनन्या की आँखों में हल्की नमी थी, लेकिन होठों पर संतोष भरी मुस्कान—क्योंकि अब उसे सिर्फ खाना नहीं, अपना पूरा हिस्सा भी मिलने लगा था।

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