सास ने सब कुछ बेटियों को दे दिया… पर असली विरासत छुपा दी — सिर्फ़ बहू अंजलि के लिए।

नोटरी की आवाज़ कमरे में गूँजती रही, पर मेरे कानों में जैसे शोर भर गया था।
बराबर बाँट…
मतलब आठ साल की सेवा, त्याग, टूटती हड्डियाँ, बिना शिकायत की रातें—सब शून्य।

Không có mô tả ảnh.

रिया ने हल्की-सी राहत की साँस ली। पद्मा ने अर्जुन की ओर देखकर औपचारिक मुस्कान फेंकी, जैसे कह रही हो—देखा, माँ आखिर माँ ही होती है।
अर्जुन ने मेरी ओर देखा, उसकी आँखों में अपराधबोध था, पर वह चुप रहा।

मैंने सिर झुका लिया। मन में एक अजीब-सी शांति और खालीपन साथ-साथ था। मैंने खुद से कहा—ठीक है अंजलि, तूने जो किया, दिल से किया। बदले में कुछ न मिला, तो भी तू हार नहीं गई।

नोटरी काग़ज़ समेट ही रहा था कि अचानक उसने गला साफ़ किया।

“एक बात और है,” उसने कहा।

कमरे में सबकी नज़रें उस पर टिक गईं।

“यह वसीयत का पहला भाग था,” उसने धीरे से कहा, “लेकिन सवित्री देवी ने एक सीलबंद पत्र भी छोड़ा है, जो… केवल बहू अंजलि चौधरी की उपस्थिति में पढ़ा जाना था।”

मेरा सिर झटके से ऊपर उठा।

“क्या?” रिया लगभग चिल्ला पड़ी, “ये कैसा मज़ाक है?”

पद्मा खड़ी हो गई, “बहू? वो भी सिर्फ इसके लिए?”

नोटरी ने शांति से कहा, “यह सवित्री देवी की अंतिम इच्छा थी।”

अर्जुन भी सन्न रह गया। उसने मेरी ओर देखा—इस बार हैरानी और उम्मीद दोनों थीं।

नोटरी ने एक मोटा, पुराना लिफ़ाफ़ा निकाला। उस पर सवित्री देवी की काँपती लिखावट में मेरा नाम था—
“अंजलि बहू के लिए।”

मेरे हाथ काँपने लगे। आठ सालों में पहली बार मुझे लगा, जैसे मेरी मेहनत को किसी ने देखा हो।

मैंने लिफ़ाफ़ा खोला।

अंदर एक पत्र था… और कुछ काग़ज़ात।

मैंने पढ़ना शुरू किया।

“मेरी प्यारी अंजलि,
अगर तू यह पत्र पढ़ रही है, तो मैं इस दुनिया में नहीं हूँ।
जब मेरी बेटियाँ यह पत्र सुनेंगी, तो शायद उन्हें बुरा लगे, पर सच कहना ज़रूरी है।

रिया और पद्मा मेरी कोख से जन्मी हैं, पर पिछले आठ सालों में उन्होंने सिर्फ फोन किए।
तू मेरी बहू होकर भी मेरी बेटी बन गई।

जब मैं चल नहीं सकती थी, तब तूने मुझे उठाया।
जब दर्द से कराहती थी, तब तूने अपनी नींद कुर्बान की।
जब मैं चिड़चिड़ी होती थी, तब तूने जवाब नहीं दिया।

मैं जानती थी, लोग कहेंगे—सब कुछ बेटियों और बेटे को दे दो।
मैंने वही किया, ताकि घर में झगड़ा न हो।

पर मेरी असली विरासत मैंने छुपा दी थी।

अंजलि, यह घर सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं है।
इसके पीछे वाला पुराना हिस्सा—जिसे सब बेकार समझते हैं—वह मेरे नाम की निजी संपत्ति है।
उस ज़मीन पर बने दस्तावेज़, और मेरे निजी बैंक लॉकर की चाबी… सब तेरे नाम है।

उस लॉकर में मेरी माँ की विरासत का सोना है, कुछ नक़द, और एक ट्रस्ट का काग़ज़—
जिससे तू अपने नाम से काम शुरू कर सकती है।

मैं चाहती हूँ कि तू कभी किसी की मोहताज न बने।
ना मेरी बेटियों की, ना मेरे बेटे की।

तूने सेवा नहीं की, तूने प्रेम किया।
और प्रेम का कर्ज़ मैं खाली हाथ नहीं चुकाना चाहती।

— तेरी सास
सवित्री देवी”**

कमरे में सन्नाटा छा गया।

रिया का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
“ये… ये धोखा है!” उसने चिल्लाकर कहा।

पद्मा ने तंज कसा, “अच्छा नाटक है, बहू। माँ को अपने वश में कर लिया था, है ना?”

अर्जुन कुछ बोलना चाहता था, पर शब्द नहीं निकले।

नोटरी ने दस्तावेज़ आगे बढ़ाए।
“ये सब कानूनी हैं,” उसने साफ़ कहा। “यह संपत्ति केवल अंजलि चौधरी की है।”

मेरी आँखों से आँसू बह रहे थे, पर इस बार दर्द के नहीं—सम्मान के थे।

मैंने पहली बार रीढ़ सीधी करके कहा,
“मैंने किसी को अपने वश में नहीं किया। मैंने सिर्फ एक बीमार औरत को माँ की तरह संभाला।”

रिया गुस्से में बाहर निकल गई। पद्मा उसके पीछे-पीछे।
हवेली में सिर्फ मैं और अर्जुन रह गए।

वह मेरे पास आया।
“अंजलि… मुझे नहीं पता था,” उसकी आवाज़ काँप रही थी।

मैंने शांति से कहा,
“अब पता है, अर्जुन। पर यह विरासत सिर्फ पैसों की नहीं है।”

कुछ महीनों बाद…

हवेली के पुराने हिस्से में एक छोटा-सा हस्तशिल्प केंद्र खुला—
“सवित्री क्राफ्ट्स।”

भोपाल की महिलाएँ वहाँ काम सीखने आने लगीं।
मेरी कढ़ाई, मेरी मेहनत—अब किसी की दया पर नहीं थी।

नीम के पेड़ के नीचे बैठकर मैं अक्सर आसमान की ओर देखती हूँ।
मुझे लगता है, सवित्री देवी मुस्कुरा रही हैं।

क्योंकि उन्होंने साबित कर दिया था—

असल विरासत खून के रिश्तों से नहीं,
बल्कि निस्वार्थ प्रेम से मिलती है।

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