बच्चों द्वारा छोड़े गए माता-पिता और ज़मीन के नीचे छिपा घर

मीरा शर्मा अपनी लाल सूटकेस का हैंडल इतनी ज़ोर से पकड़े हुए थी, मानो अगर उसने हाथ छोड़ा तो पूरी दुनिया बिखर जाएगी। उसके सामने, न्यायालय का अधिकारी उस घर के दरवाज़े पर मुहर लगा रहा था जहाँ उसने तैंतालीस साल गुज़ारे थे।
सीलिंग टेप की आवाज़ सूखे, अंतिम प्रहार जैसी थी। “कुर्की” शब्द कहीं बड़े अक्षरों में लिखा नहीं था, फिर भी वह हवा में मौजूद था—पड़ोसियों की दूर से झांकती खामोशी में, और उस शरद ऋतु की धूप में जो अब किसी को गर्म नहीं कर पा रही थी।

उसके बगल में रमेश शर्मा ने नीली सूटकेस कंधे पर जमाई और लार निगल ली। वह इकहत्तर वर्ष का था—एक पीठ जिसने जीवन भर टूटे इंजन, औज़ारों के बक्से और अनंत कार्य-दिन ढोए थे… और अब सबसे भारी बोझ उठा रही थी: बिना चाबी, बिना छत और बिना किसी इंतज़ार के घर छोड़ना।

—अब हम कहाँ जाएँगे, रमेश? —मीरा ने टूटती आवाज़ में पूछा, जैसे हर शब्द उसका थोड़ा-सा आत्मसम्मान छीन रहा हो।

रमेश ने कस्बे की पत्थरों से बनी सड़क को देखा—वे ही पत्थर जिन्हें मीरा ने अनगिनत बार दुकान जाते हुए बुहारा था, वही पत्थर जिन्होंने उनके बच्चों को बड़ा होते देखा था। वह कोई जवाब गढ़ना चाहता था, कोई दिशा, कोई भरोसा।
लेकिन उसे सिर्फ़ एक पुरानी थकान मिली।

—मुझे नहीं पता, मेरी जान… अब मुझे कुछ भी नहीं पता।

सबसे कठोर चीज़ बैंक या कर्ज़ नहीं था।
सबसे कठोर उनके बच्चे थे।

अर्जुन, जो अब नगर परिषद में अधिकारी था, झुँझलाकर बोला था:
—“आप लोग खुद ही देख लीजिए।”

बीच वाली बेटी कविता और भी ठंडी थी:
—“मैं आपकी गलतियों की ज़िम्मेदारी नहीं ले सकती।”

और सबसे छोटा, रोहन
उसने तो जवाब ही नहीं दिया।
न कॉल। न संदेश।
एक ऐसा सन्नाटा जो चीख से भी ज़्यादा दर्द देता है।

वे बिना दिशा के चलते रहे।
चौक की बेंचों पर बैठे, परिवारों को गुजरते देखा—दौड़ते बच्चे, रोटी की थैलियाँ उठाए दंपती, पोते-पोतियों का हाथ थामे दादा-दादी।
मीरा इन दृश्यों को किसी और की फ़िल्म की तरह देख रही थी, और फिर भी भीतर जल रही थी, क्योंकि वह जानती थी—वह भी वही माँ थी जो बच्चे के गिरने पर अस्पताल दौड़ती थी, जो बुखार न उतरने पर पूरी रात बिस्तर के पास बैठी रहती थी, जो कॉपियाँ खरीदने के लिए सिक्के गिनती थी, जो रात में बटन सीती थी ताकि उसके बच्चे स्कूल में “ढंग के” दिखें।

—याद है जब अर्जुन का हाथ टूट गया था? —उसने बुदबुदाकर कहा, रमेश की ओर देखे बिना—हम पूरी रात अस्पताल में थे।

रमेश ने नम आँखों से सिर हिलाया। उसे सब याद था—डिसइंफेक्टेंट की गंध, छोटी उँगलियों का उसके हाथ को जकड़ना, पिता का डर जो शांत शब्दों के पीछे छिपा रहता है।
उसे कविता का निमोनिया याद था, रोहन की डरावनी रातें, वह मेज़ जो हमेशा सजी रहती थी चाहे पैसे कम हों।
कभी मार नहीं थी। कभी तिरस्कार नहीं था।
सिर्फ़ मेहनत, धैर्य और स्नेह था।
और फिर भी, जब उन्हें सबसे ज़्यादा सहारे की ज़रूरत थी, उन्हें एक बंद दरवाज़ा मिला।

जब शाम ने इमारतों को नारंगी रंग में रंगना शुरू किया, वे कस्बे के बाहरी हिस्से में पहुँच चुके थे। घर कम हो गए थे और प्रकृति ने अपनी जगह वापस ले ली थी। मीरा के पैर काँप रहे थे। रमेश किसी छायादार कोने की तलाश में इधर-उधर देखने लगा।

—वहाँ… उस पहाड़ी पर —उसने कहा—चलो थोड़ा ऊपर चलते हैं। शायद आराम करने की जगह मिल जाए।

चढ़ाई निर्दयी थी—ढीले पत्थर, सूखी झाड़ियाँ, पैरों के नीचे बिखरती मिट्टी।
मीरा रमेश की बाँह पर टिकी थी, और रमेश अपने उस जिद्दी गर्व पर, जो नहीं चाहता था कि उसकी पत्नी उसे टूटते देखे।

लगभग चोटी पर पहुँचते ही मीरा रुक गई।
झाड़ियों और चट्टानों के बीच, जैसे पहाड़ी कोई रहस्य छिपा रही हो, एक आकृति दिखी जो इस दृश्य का हिस्सा नहीं थी—पत्थर का एक मेहराब, और उसके भीतर समय से काली पड़ी लकड़ी का दरवाज़ा

—रमेश… देखो। यह… यह कोई साधारण दरवाज़ा नहीं है।

रमेश ने चश्मा ठीक किया। उत्सुकता और संदेह के साथ आगे बढ़ा।
दरवाज़ा चट्टान में ऐसे जड़ा था जैसे बहुत पहले किसी ने तय किया हो कि यहाँ एक प्रवेश द्वार होना चाहिए।
वनस्पति उसे ढकने की कोशिश कर रही थी, लेकिन पूरी तरह नहीं।

मीरा को सिहरन हुई—ठंड से नहीं, बल्कि उस अजीब एहसास से कि वह यहाँ पहले भी आ चुकी है… जबकि वह जानती थी कि ऐसा नहीं हो सकता।

—क्या कोई यहाँ रहता होगा? —उसने फुसफुसाया।

रमेश ने धीरे से दस्तक दी।
आवाज़ अजीब तरह से गूँजी—जैसे दूसरी ओर जगह हो, हवा हो, कमरे हों।
कोई जवाब नहीं आया।
उसने धक्का दिया; बंद था।

फिर लगभग सहज रूप से उसने आसपास देखा और एक पत्थर पाया जो “जानबूझकर रखा हुआ” लग रहा था।
उसने उसे उठाया।
नीचे एक पुरानी, ज़ंग लगी चाबी थी।

मीरा ने रमेश की बाँह कसकर पकड़ ली।

—नहीं… रमेश, यह मुसीबत में पड़ना है।

रमेश ने चाबी को देखा, फिर मीरा को, उनके खाली हाथों को, सूटकेस को, और अँधेरा होते आसमान को।

—खुले आसमान के नीचे सोने से बुरी मुसीबत और क्या हो सकती है? —उसने शांत उदासी से कहा—सिर्फ़ एक रात। कल… कल मालिकों को ढूँढ लेंगे।

मीरा ने कुछ नहीं कहा।
उसकी खामोशी ही उसकी हार थी।

और जब रमेश ने ताले में चाबी घुमाई, दरवाज़े की गहरी चरमराहट जैसे यह घोषणा कर रही हो कि उस पुराने लकड़ी के पीछे सिर्फ़ शरण नहीं…
एक ऐसी सच्चाई इंतज़ार कर रही है जो सब कुछ बदल देगी।

दरवाज़े के भीतर से निकलती हवा ठंडी थी, उसमें नमी की गंध घुली हुई थी… लेकिन उसके साथ एक अजीब-सी मिठास भी थी—पुरानी लकड़ी और सूखे फलों जैसी।
वे धीरे-धीरे अंदर बढ़े, अँधेरे में हाथ टटोलते हुए।

रमेश ने अपनी जेब से वह छोटा-सा लाइटर निकाला, जिसे वह आदतन हमेशा साथ रखता था।
लौ काँपी… और रोशनी ने जो दिखाया, उसने दोनों की साँसें रोक दीं।

पत्थर तराश कर बनाई गई दीवारें।
अच्छी तरह सँभाला हुआ लकड़ी का फ़र्श।
और फिर—एक खुली जगह, जो किसी अस्थायी गुफा जैसी नहीं थी, बल्कि…

एक पूरा घर था।
पहाड़ी के भीतर बनाया गया एक पूरा घर।

मीरा की साँस अटक गई।
वहाँ पुराने लेकिन मज़बूत सोफ़े थे, एक मेज़, लकड़ी का चूल्हा, अलमारियाँ जिनमें काँच के जार भरे थे, और पीछे की ओर एक शयनकक्ष की परछाईं।
सब कुछ जरूरत से ज़्यादा सलीके से रखा गया था—किसी छोड़े हुए ठिकाने के लिए यह असंभव-सा लग रहा था।

और सबसे बेचैन कर देने वाली बात…

मेज़ सजी हुई थी।
दो प्लेटें।
दो कप।
काँटे-चम्मच ध्यान से लगाए गए।
जैसे कोई खाना बीच में छोड़ कर उठा हो… और किसी भी पल लौट सकता हो।

—यह… यह तो नामुमकिन है —मीरा ने फुसफुसाकर कहा।

रमेश को एक कोने में तेल का दीया मिला।
उसने उसे जलाया।
सुनहरी रोशनी फैली और ऐसे-ऐसे विवरण सामने आए कि दोनों की रूह सिहर उठी—
मुड़ी हुई रजाइयाँ, काट कर रखी हुई लकड़ी, भरी हुई राशन की अलमारी।

यह घर सिर्फ़ मौजूद नहीं था।
इसे प्यार से जिया गया था।

रसोई की मेज़ पर एक चिट्ठी रखी थी।
काग़ज़ पीला पड़ चुका था, लिखावट नाज़ुक और सधी हुई।
ऊपर लिखा था:

“मेरे प्यारे बच्चों के लिए।”

मीरा ने काँपते हाथों से वह पत्र उठाया।
वह धीमी आवाज़ में पढ़ने लगी, जैसे किसी सोए हुए इंसान से बात कर रही हो।

“मेरे प्यारे बच्चों,
अगर तुम यह पढ़ रहे हो, तो इसका मतलब है कि तुम आख़िरकार घर लौटने का रास्ता ढूँढ पाए हो…”

शब्द उसके गले में अटक गए।

पत्र एक स्त्री की कहानी कहता था—
सुलोचना वर्मा,
उसके पति अल्बर्ट वर्मा,
और उस घर की, जिसे उन्होंने पत्थर-पत्थर जोड़कर तब बनाया था, जब दुनिया निर्दयी हो गई थी।

पत्र में सर्दियों की लकड़ी का ज़िक्र था।
भरी हुई रसोई का।
बिस्तर के नीचे रखे एक संदूक का, जिसमें दस्तावेज़ और बचत थी।

और सबसे ज़्यादा—
इंतज़ार का।

दशकों तक किया गया इंतज़ार।
उन बच्चों के लौटने का, जो कभी वापस नहीं आए।

मीरा ने ऊपर देखा।
उसकी आँखों में आँसू थे।

—रमेश… यहाँ कोई और भी रहा है…
जो अपने बच्चों द्वारा छोड़ दिया गया था।

रमेश ने कुछ नहीं कहा।
उसने घर को ऐसे देखा, जैसे कोई मंदिर हो।
और जब मीरा ने पत्र का आख़िरी वाक्य पढ़ा, तो वह हवा में ठहर गया:

“इस जगह को अपनाने में अपराधबोध मत रखना।
इसे प्यार से बनाया गया था…
और इसे घर बने रहना चाहिए।”

उस रात, बेदखली के बाद पहली बार, उन्होंने गर्म खाना खाया।
रमेश ने चूल्हा जलाया और सब्ज़ियों का सूप गरम किया।
मीरा ने बर्तन धोए—और हैरानी की बात यह थी कि वहाँ पानी था,
पास के झरने से लाया गया।

दीये की रोशनी पत्थरों पर नाच रही थी।
डर धीरे-धीरे एक अजीब एहसास में बदल रहा था—
सुकून।

जैसे यह जगह…
उनका इंतज़ार ही कर रही थी।

लेकिन मीरा सो नहीं पाई।

अँधेरे में, “सुलोचना” नाम उसकी यादों को चुभ रहा था।
वह किसी सुलोचना को नहीं जानती थी…
और फिर भी, उस नाम में कुछ ऐसा था जो उसके दिल को छू रहा था।

—रमेश… —उसने धीरे से कहा—
मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैं यहाँ पहले भी रह चुकी हूँ।

रमेश कुछ देर चुप रहा।
फिर बहुत नर्म आवाज़ में बोला, जैसे कोई नाज़ुक चीज़ टूट जाने से डरता हो—

—मीरा…
तुम्हारे दत्तक माता-पिता ने…
क्या उन्होंने कभी तुम्हें तुम्हारे असली परिवार के बारे में कुछ बताया था?

यह सवाल उसके सीने में तीर की तरह लगा।

मीरा को बस इतना पता था कि उसे बचपन में गोद लिया गया था।
जब भी वह पूछती, जवाब बदल जाता।
“तुम्हारी जैविक माँ सक्षम नहीं थी”—
बस इतना ही।

—तुम ऐसा क्यों पूछ रहे हो? —उसने लगभग चिढ़कर कहा।

रमेश ने झिझकते हुए उत्तर दिया—

—क्योंकि यह घर…
ये चिट्ठियाँ…
और वह तस्वीर, जो तुम्हें मिली…
बहुत ज़्यादा संयोग हैं।

अगली सुबह, पहाड़ी की ढलान में बनी छोटी-सी खिड़की से धूप अंदर आई।
रोशनी नरम थी, जैसे किसी ने जानबूझकर घर को जगाया हो।

मीरा और रमेश ने तय किया कि वे घर को शांति से देखेंगे, बिना डर के, बिना जल्दबाज़ी के।
शयनकक्ष की अलमारी में उन्हें साफ़-सुथरे कपड़े मिले, तह किए हुए, जैसे कोई अब भी उनका ख़याल रखता हो।

और फिर, बिस्तर के नीचे…

मीरा ने साँस रोक ली।

वहाँ एक पुराना संदूक था, लोहे की कुंडी वाला।
उसने ढक्कन उठाया—और जैसे हवा ही गायब हो गई।

अंदर कोई सोना-चाँदी नहीं थी।
थे—काग़ज़ात।
फ़ाइलें।
तस्वीरें।
रिबन से बँधी चिट्ठियाँ।

रमेश ने एक फ़ोल्डर उठाया, जिस पर लिखा था:
“दस्तावेज़”

उसने पहला पन्ना पढ़ा… फिर दूसरा…
और अचानक, वह हिल भी नहीं पाया।

—मीरा… —उसकी आवाज़ काँप रही थी—
यह नाम देखो…

मीरा ने काग़ज़ लिया।
उसके हाथों ने उसका साथ नहीं दिया।

“मीरा देवी शर्मा”
जन्मतिथि… वही।
और माँ का नाम—

“सुलोचना वर्मा शर्मा”

मीरा के मुँह से कोई शब्द नहीं निकला।
सिर्फ़ एक टूटी हुई साँस।

—रमेश…
वह मैं हूँ।

उसके भीतर जैसे दशकों की चुप्पी एक साथ टूट गई।
सालों के सवाल।
सालों का दर्द।
और अचानक—एक सच्चाई।

उसकी माँ ने उसे छोड़ा नहीं था।
उसने उसे बचाया था।

संदूक में एक लंबी चिट्ठी थी—
शीर्षक था: “परिवार की कहानी”

रमेश ने उसे ज़ोर से पढ़ना शुरू किया, क्योंकि मीरा की आँखों से आँसू थम नहीं रहे थे।

सुलोचना ने लिखा था—
सूखा।
भूख।
काम का अभाव।
तीन छोटे बच्चों को दूध तक न दे पाने की पीड़ा।

उसने लिखा था कि कैसे समाज सेवक आए।
कैसे गोद देने का प्रस्ताव रखा गया।
और कैसे उसने सबसे कठिन निर्णय लिया—
बच्चों को छोड़ना, ताकि वे जी सकें।

लेकिन एक शर्त के साथ।

वह उसी शहर में रहेगी।
दूर से उन्हें देखेगी।
बिना सामने आए।
बिना हस्तक्षेप किए।

मीरा को याद आने लगा…
स्कूल के कार्यक्रमों में पीछे बैठी एक स्त्री।
मंदिर में बार-बार दिखने वाली मुस्कान।
एक “अनाम दानदाता” जिसने उसकी पढ़ाई में मदद की।

सब कुछ संयोग नहीं था।

चिट्ठी में एक और सच्चाई थी—
सुलोचना ने मीरा की हाल की ज़िंदगी देखी थी।
घर की कुर्की।
बच्चों की बेरुख़ी।

और उसने रास्ता छोड़ा था।
जानबूझकर।
ताकि मीरा, जब सबसे टूट चुकी हो,
घर लौट सके।

मीरा ने पहली बार गहरी साँस ली।

—मेरी माँ मुझसे प्यार करती थी…
हमेशा करती रही।

अगले दिनों में वे उस घर में ही रहे।
पत्र पढ़े।
तस्वीरें देखीं।
मीरा के भीतर कुछ सोया हुआ जागने लगा।

एक गुप्त कमरे में उन्हें तीन छोटे संदूक मिले।
नाम लिखे थे।

मीरा के संदूक में—
एक कपड़े की गुड़िया थी।

मीरा ने उसे उठाया।
बिना जाने क्यों, वह परिचित लगी।

फिर उन्हें एक डायरी मिली।

सुलोचना ने लिखा था—
मीरा को उसने शिशु अवस्था में नहीं,
ढाई साल की उम्र में दिया था।

इसीलिए यह घर जाना-पहचाना लगता था।
इसीलिए सपने।
इसीलिए अपनापन।

फिर भाई-बहन की बारी आई।

पते थे।
नंबर थे।

मीरा डरी हुई थी।
लेकिन उसने समझ लिया था—
परिवार कभी देर से आता है,
पर आता ज़रूर है।

पहली कॉल—

—हैलो?

—कृपया फोन मत काटिए।
मेरा नाम मीरा शर्मा है…
और आपकी जैविक माँ के बारे में बात करनी है।

खामोशी।

—आपको यह कैसे पता?

—क्योंकि वह मेरी भी माँ थीं।
हम भाई-बहन हैं।

उसका नाम अब एडवर्ड था।

वह आने को तैयार हुआ।

दूसरी कॉल कठिन थी।
राहुल (जिसे कभी रोहन कहा गया था) ने विश्वास नहीं किया।
मीरा ने काग़ज़ भेजे।
चुपचाप।

धीरे-धीरे…
वह भी आया।

जब तीनों भाई-बहन पहली बार उस घर में मिले,
तो शक असंभव हो गया।

और फिर—
एक और खोज।

एक कमरा, जिसमें हाल ही के निशान थे।
साफ़ कपड़े।
ताज़ा राशन।

—यहाँ कोई है…
हाल ही में —राहुल ने कहा।

उस रात, क़दमों की आवाज़ आई।
सुरंग से।

रमेश ने दीया उठाया।

एक छोटी, झुकी हुई आकृति प्रकट हुई।

—कौन है वहाँ? —काँपती आवाज़।

रोशनी चेहरे पर पड़ी।

सफ़ेद बाल।
शाल।
आँखें—दशकों का इंतज़ार।

मीरा की साँस रुक गई।

सुलोचना… —उसने फुसफुसाया।

थैला गिर पड़ा।

—अल्बर्ट…? —स्त्री ने कहा।

—नहीं, माँ… —एडवर्ड रो पड़ा—
मैं एडवर्ड हूँ।
आपका बेटा।

चारों का आलिंगन—
शब्दों से परे।

सुलोचना ने बताया—
ये चिट्ठियाँ विदाई थीं।
उसका पति अल्बर्ट जा चुका था।
वह अब भी इंतज़ार कर रही थी।

अंततः—
परिवार पूरा हुआ।

मीरा और रमेश वहीं रहे।
घर अब छुपा नहीं था—
घर था।

मीरा के बच्चे भी आए।
शर्म के साथ।
माफ़ी के साथ।

मीरा ने उन्हें गरिमा से अपनाया।

सुलोचना एक सर्द सुबह शांति से चली गई।
अपनों के बीच।

उसके अंतिम शब्द—

—अब…
मैं अल्बर्ट से मिल सकती हूँ।
हमारा काम… पूरा हुआ।

और मीरा समझ गई—

घर लौटना
हमेशा किसी पते पर लौटना नहीं होता।
कभी-कभी…
सच पर लौटना होता है।

और वह दरवाज़ा—
लकड़ी का, पुराना—
आज भी वहाँ है।

याद दिलाने के लिए कि—

सच्चा प्यार
खोए हुए वर्षों की गिनती नहीं करता।
वह उन चमत्कारों की गिनती करता है
जो अब भी मिल सकते हैं।

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