जब पिता ने घर की रजिस्ट्री बेटे के नाम कर दी…

घर की रजिस्ट्री बेटे के नाम करते ही पिता को उसी दिन बाहर निकाल दिया गया — लेकिन सब कुछ उलट-पुलट हो गया जब पता चला कि यह “गरीब” समझा जाने वाला बूढ़ा आदमी ₹10,000 करोड़ के छिपे साम्राज्य का मालिक है

डॉन रघुवीर सिंह, जिन्हें मोहल्ले में सब “रघु काका” कहते थे, एक बेहद साधारण बूढ़े आदमी के रूप में जाने जाते थे। वह गाँव के पास बने एक पुराने पत्थर के घर में रहते थे। हमेशा सफ़ेद बनियान, पुरानी लुंगी और रबर की चप्पल—यही उनकी पहचान थी।
कोई नहीं जानता था कि इसी सादगी के पीछे वह “सिंह लैंड्स प्राइवेट लिमिटेड” के संस्थापक हैं—एशिया की सबसे बड़ी रियल एस्टेट कंपनियों में से एक।
दस साल पहले उन्होंने रिटायरमेंट ले लिया था और कंपनी की कमान अपने भरोसेमंद बोर्ड मेंबर्स को सौंपकर गुमनामी में जीने लगे थे।

रघुवीर का एक ही बेटा था—अर्जुन सिंह। जब रघुवीर ने अपनी असली पहचान नहीं छुपाई थी, तब अर्जुन ऐश-ओ-आराम में पला-बढ़ा। लेकिन शादी के बाद—अपनी पत्नी काव्या के साथ—वह लालची और आलसी बन गया। काव्या एक महत्वाकांक्षी महिला थी, जिसे ब्रांडेड कपड़े, महंगी ज्वेलरी और दिखावा बेहद पसंद था।

एक दिन अर्जुन और काव्या रघुवीर के पुराने घर पहुँचे। उनके हाथ में एक फाइल थी।

“पापा,” अर्जुन ने मीठी आवाज़ में कहा,
“आप कैसे हैं? अब आपकी उम्र हो गई है। इस घर को संभालना आपके लिए मुश्किल होगा। क्यों न आप घर की रजिस्ट्री मेरे नाम कर दें? मैं और काव्या इसे रेनोवेट करवा देंगे—पूरा मॉडर्न बना देंगे। और हम यहीं रहेंगे, आपकी देखभाल भी हो जाएगी।”

रघुवीर मुस्कुरा उठे। वह कब से अपने बेटे के साथ रहने का सपना देख रहे थे।
“सच में, बेटा? तुम लोग मेरा ख्याल रखोगे?”

“बिल्कुल, पापा!” काव्या ने बनावटी मुस्कान के साथ कहा।
“बस यहाँ साइन कर दीजिए। यह डीड ऑफ डोनेशन है।”

प्यार और भरोसे में रघुवीर ने पेन उठा लिया। काँपते हाथों से उन्होंने दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर कर दिए।
घर और ज़मीन की रजिस्ट्री—जो सार्वजनिक रूप से उनके नाम की आख़िरी संपत्ति थी—अब अर्जुन के नाम हो चुकी थी।

“थैंक यू, पापा,” अर्जुन ने जल्दी से फाइल उठाते हुए कहा।

रघुवीर को लगा कि बेटा उन्हें गले लगाएगा।
लेकिन तभी अर्जुन और काव्या के चेहरे का रंग बदल गया।

“हनी, हो गया,” काव्या ने कहा। “ड्राइवर को बुलाओ।”

“रुको… हम कहाँ जा रहे हैं?” रघुवीर ने हैरानी से पूछा।

अर्जुन ने बिना किसी भावना के पिता की ओर देखा।
“पापा, यह घर अब हम तीनों के लिए छोटा है। और हम यहाँ स्विमिंग पूल और होम थिएटर बनवाने वाले हैं। आप यहाँ रहेंगे तो रुकावट होगी।”

“क्या?” रघुवीर सन्न रह गए।
“लेकिन तुमने कहा था… तुम मेरी देखभाल करोगे।”

काव्या ज़ोर से हँस पड़ी।
“देखभाल? पापा, आप तो अब बोझ हैं। मुझे आपकी सेवा करने का शौक नहीं है। हमने आपके लिए ‘शांति वृद्ध आश्रम’ में जगह बुक कर दी है। सस्ता है। अभी छोड़ आते हैं।”

“अर्जुन! बेटा!” रघुवीर चीख पड़े।
“मैंने तुम्हें अच्छे संस्कार दिए! यह घर तुम्हें दे दिया! तुम ऐसा कैसे कर सकते हो?”

“यह बस एक घर है, पापा। ज़मीन भर,” अर्जुन ने ठंडे स्वर में कहा।
“आपके पास और कोई पैसा तो है नहीं। यहाँ फ्री में रह रहे थे। अच्छा है, अब आश्रम में छत तो मिलेगी।”

वे रघुवीर को जबरदस्ती बाहर घसीट लाए।
उनके पुराने कपड़ों से भरा एक काला प्लास्टिक बैग उनके सामने फेंक दिया गया।
उन्हें शहर के बाहर बने एक सस्ते, जेल जैसे वृद्ध आश्रम के गेट पर छोड़ दिया गया।

“इस घर में दोबारा लौटने की हिम्मत मत करना,” काव्या ने जाते-जाते कहा।

बारिश हो रही थी।
रघुवीर भीग चुके थे—शरीर से ज़्यादा आत्मा से।
घर खोने का दर्द नहीं था…
दर्द यह था कि उनका बेटा उन्हें कभी प्यार ही नहीं करता था।

रघुवीर ने अपनी लुंगी की जेब से एक छोटा सा मोबाइल निकाला—
एक एन्क्रिप्टेड सैटेलाइट फोन

उन्होंने अपने पर्सनल वकील और कंपनी के CEO को कॉल किया।

“वकील,” उनकी आवाज़ अब किसी कमज़ोर बूढ़े की नहीं, बल्कि एक सम्राट की थी,
प्रोटोकॉल ज़ीरो एक्टिवेट करो।
और मुझे तुरंत लेने आओ।”


एक महीना बाद…

अर्जुन और काव्या घर के रेनोवेशन की प्लानिंग में व्यस्त थे।
वे पुराने घर को गिराकर एक आलीशान बंगला बनाना चाहते थे।
लेकिन इसके लिए उन्हें पैसों की ज़रूरत थी।

“हनी, कंस्ट्रक्शन के लिए ₹50 करोड़ का लोन चाहिए,” काव्या ने कहा।

“डोंट वरी,” अर्जुन बोला।
“इस ज़मीन को गिरवी रख देंगे। प्राइम लोकेशन है। बैंक तुरंत अप्रूव करेगा।”

वे पहुँचे एपेक्स इम्पीरियल बैंक—देश का सबसे बड़ा और सबसे एक्सक्लूसिव बैंक।

ज़मीन के काग़ज़ देखकर उन्हें सीधे चेयरमैन ऑफ द बोर्ड से मिलने का समय मिल गया।

“गुड मॉर्निंग, मिस्टर अर्जुन, मैडम काव्या,” बैंक मैनेजर ने कहा।
“चेयरमैन आपको पेंटहाउस बोर्डरूम में इंतज़ार कर रहे हैं।”

लिफ्ट में चढ़ते ही काव्या फुसफुसाई,
“अर्जुन, सीधे चेयरमैन! हम तो अब VIP हो गए!”

बोर्डरूम में एक लंबी मेज़ थी।
अंत में एक आदमी कुर्सी पर बैठा था, पीठ खिड़की की ओर—
मुंबई की पूरी स्काईलाइन दिखाई दे रही थी।

“मिस्टर चेयरमैन,” अर्जुन ने कहा,
“हम लोन के लिए आए हैं। यह मेरे पिता की प्रॉपर्टी है।”

कुर्सी धीरे-धीरे घूमी।

वह आदमी एक महंगे इटालियन सूट में था।
कलाई में Patek Philippe की घड़ी।
पूरा व्यक्तित्व रौबदार।

लेकिन चेहरा…

“प-पापा?!” अर्जुन चिल्ला पड़ा।
“आप यहाँ क्या कर रहे हैं? और ये सूट? आप यहाँ कैसे आए?”

“गार्ड्स!” काव्या चीखी।
“इस बूढ़े को बाहर निकालो! यह धोखेबाज़ है!”

लेकिन गार्ड्स और बैंक के सभी अधिकारी
रघुवीर के सामने झुक गए।

“गुड मॉर्निंग, चेयरमैन रघुवीर सिंह,” सबने एक साथ कहा।

रघुवीर खड़े हुए और अर्जुन-काव्या की ओर बढ़े, जो अब काँप रहे थे।

“हैरान हो?” उन्होंने शांत स्वर में पूछा।
“तुम्हें लगा था कि जिसे तुमने बारिश में बाहर फेंक दिया, वह सच में गरीब था?”

उन्होंने एक फाइल खोली।

“मैं डॉन रघुवीर सिंह इम्पीरियल हूँ।
इस बैंक का मालिक।
सिंह लैंड्स, इम्पीरियल शिपिंग और एपेक्स एनर्जी का मालिक।
मेरी कुल संपत्ति—₹10,000 करोड़।”

काव्या बेहोश होते-होते बची।
अर्जुन घुटनों पर गिर पड़ा।

“पापा… आप इतने अमीर थे?”
“आपने बताया क्यों नहीं?”

“क्योंकि मैं देखना चाहता था,” रघुवीर ने कठोर स्वर में कहा,
“कि तुम मुझसे प्यार करते हो या मेरे पैसों से।
और मुझे जवाब मिल गया।”

“पापा, माफ कर दीजिए!” काव्या रोते हुए उनके पैरों से लिपट गई।
“हम मज़ाक कर रहे थे! चलिए हमारे साथ, बंगले में रहिए!”

“हाँ पापा!” अर्जुन गिड़गिड़ाया।
“सब कुछ पहले जैसा कर देते हैं!”

रघुवीर ने उनके हाथ झटक दिए।

“बहुत देर हो चुकी है,” उन्होंने ठंडे स्वर में कहा।
“जिस रात तुमने मुझे बारिश में फेंका…
उसी रात तुम्हारे पिता की मौत हो गई।”

उन्होंने बैंक मैनेजर की ओर देखा।
“लोन रिजेक्ट कर दीजिए।”

“यस, सर।”

“और अर्जुन,” रघुवीर ने कहा,
“डीड ऑफ डोनेशन की फाइन प्रिंट पढ़ी थी?”

अर्जुन ने काग़ज़ पढ़ा।
उसकी आँखें फैल गईं।

“अगर दान पाने वाला व्यक्ति कृतघ्नता या उपेक्षा करे,
तो दान स्वतः निरस्त हो जाएगा…”

“मतलब,” रघुवीर बोले,
“घर वापस मेरा है।
और क्योंकि बैंक भी मेरा है—
तुम दोनों पूरे भारत में ब्लैकलिस्ट हो।”

“गार्ड्स,” उन्होंने आदेश दिया,
“इन कचरों को बाहर निकालो। ये मेरी विंडो का व्यू खराब कर रहे हैं।”

अर्जुन और काव्या को घसीटकर बाहर निकाल दिया गया—
रोते, चिल्लाते, पछताते हुए।

रघुवीर वापस अपनी कुर्सी पर बैठे।
खिड़की से बाहर देखा।

दुख था…
लेकिन मन शांत था।

उन्होंने एक बेटा खो दिया,
लेकिन सच्चाई पा ली।

और अपनी ₹10,000 करोड़ की संपत्ति से
उन्होंने परित्यक्त बुज़ुर्गों के लिए भारत का सबसे बड़ा फाउंडेशन बनाया—
ताकि कोई भी बूढ़ा इंसान
अपने ही खून से वह दर्द फिर कभी न सहे।

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